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महाभारत के साक्षी बर्बरीकजी के शीश द्वारा श्रीकृष्ण का अभिनंदन (चौथा व अंतिम भाग)

महाभारत के साक्षी बर्बरीकजी के शीश द्वारा श्रीकृष्ण का अभिनंदन (चौथा व अंतिम भाग)

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महाभारत युद्ध की समाप्ति पर भीमसेन को अभिमान हो गया कि युद्ध केवल उनके पराक्रम से जीता गया है. जबकि धनुर्धारी अर्जुन को लगता था कि महाभारत में पांडवों की जीत उनके पराक्रम से संभव हुई है. विवाद बढ़ता देख अर्जुन ने एक रास्ता सुझाया. उन्होंने कहा कि युद्ध के साक्षी वीर बर्बरीक के शीश से पूछा जाए कि उन्होंने इस युद्ध में किसका पराक्रम देखा?

पांडव वीर श्रीकृष्ण के साथ वीर बर्बरीक के शीश के पास गए. उनके सामने अपनी शंका रखी. बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मुझे इस युद्ध में केवल और केवल एक योद्धा नजर आए जो सबके बदले युद्ध कर रहे थे. वह थे भगवान श्रीकृष्ण. कुरुक्षेत्र में सर्वत्र नारायण का सुदर्शन चक्र ही चलता रहा. यह युद्ध उनकी नीति के कारण ही जीता गया.

बर्बरीक द्वारा ऐसा कहते ही समस्त नभ मंडल उद्भाषित हो उठा. देवगणों ने आकाश से देवस्वरुप शीश पर पुष्पवर्षा की. भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः वीर बर्बरीक के शीश को प्रणाम करते हुए कहा- “हे बर्बरीक आप कलि काल में सर्वत्र पूजित होकर अपने भक्तो के अभीष्ट कार्य पूर्ण करेंगे. आपको इस क्षेत्र का त्याग नहीं करना चाहिए. आप युद्धभूमि में हम सबसे हुए अपराधों के लिए हमें क्षमा कीजिए.”हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

हर्षोल्लास से भरी पाण्डव सेना ने पवित्र तीर्थो के जल से शीश को पुनः सिंचित किया और अपनी विजय ध्वजाएं शीश के समीप लहराईं. इस दिन सभी ने महाभारत का विजयपर्व धूमधाम से मनाया. कालान्तर में वीर बर्बरीक का का शीश शालिग्राम शिला रूप में परिणत हुआ. देवत्व को प्राप्त वह शीश राजस्थान के सीकर जिले के खाटू ग्राम में बहुत ही चमत्कारिक रूप से प्रकट हुआ. वहाँ के राजा ने मंदिर में उसकी स्थापना की.

उस युग के बर्बरीक आज के युग के श्रीश्याम बाबा ही हैं. आज भी श्रीश्याम बाबा के प्रेमी दूर-दूर से आकर श्याम ध्वजाएं श्रीश्यामदेव जी को अर्पण करते हैं. कलयुग के समस्त प्राणी श्री श्यामदेवजी के दर्शन मात्र से सुखी हो जाते हैं. उनके कष्टों का नाश होता है.
!! जय जय मोरवीनंदन, जय जय बाबा श्याम !! !! हारे के सहारे की जय!!

(स्कन्दपुराण के माहेश्वर खंड अंतर्गत द्वितीय उपखंड “कौमारिका खंड” की कथा)
संकलनः महावीर प्रसाद सर्राफ “टीकम”

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प्रभु शरणम्

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