गणेशजी ने तुलसी को दिया शाप मेरी पूजा में नहीं होगा तुम्हारा प्रयोग- क्यों गणेशजी की पूजा में वर्जित हैं तुलसी

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राशिफल में हमने आपको गणपति पूजा की सलाह दी और गणेशजी को तुलसी के स्थान पर दूर्वा चढ़ाने को कहा. कई लोगों ने बार-बार यह बताने का अनुरोध कर रहे हैं कि गणपति को आखिर तुलसी क्यों नहीं चढ़ानी चाहिए.
क्यों गणेशजी को तुलसी नहीं चढ़ाते और दूर्वा ही चढ़ाते हैं, यह प्रसंग पहले भी बता चुके हैं. आज गणेशजी का दिन है. आपके विशेष अनुरोध पर कथा दोहरा रहे हैं.
गणेशजी बचपन में बड़े नटखट थे. उनकी शरारत से माता पार्वती कई बार बहुत परेशानी हो जाती थीं. गणेशजी ने एक बिल्ली देखी. उसके साथ खेलते-खेलते अचानक हवा में घुमाकर उछाल दिया.
बिल्ली धरती पर गिरकर घायल हो गई. गणेशजी उसकी ओर दौड़े तो वह अचानक गायब हो गई. गणेशजी को भूख लगी थी. वह माता से भोजन मांगने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.माता ने कहा थोड़ी देर बाद आना. अभी मेरे शरीर में धूल लगी है. जोर से गिरने के कारण शरीर में दर्द भी हो रहा है. वह अभी औषधि लगाकर विश्राम कर रही हैं.
गणेशजी ने दर्द का कारण पूछा तो पार्वती देवी ने कहा- पुत्र जिस बिल्ली को तुमने घूमाकर फेंका, वह मैं ही थी. संसार के सभी जीव मेरे अंश है. इसलिए किसी को कष्ट न दिया करो.
गणेशजी को बड़ा दुख हुआ कि उनके कारण माता को कष्ट हुआ. अब माता ने यह बात तो पुत्र को दया भाव सिखाने के लिए जानबूझकर कह दी थी लेकिन गणेशजी ने अपने तरह से इसकी व्याख्या करके एक अन्य समस्या पैदा कर दी.
गजानन इस बात को मन में गांठ बांध कर बैठ गए कि संसार के सभी जीव मेरी माता के अंश है. इस कारण उन्हें विवाह नहीं करना चाहिए. उन्होंने ब्रह्चारी रहने का तय कर लिया और तप में लीन हो गए.
वह गंगा तट पर तप कर रहे थे. इसी बीच असुर कुल में जन्मी तेजस्विनी वृंदा जिन्हें तुलसी कहा जाता है, अपने लिए योग्य वर की तलाश में निकलीं थीं.
सारे संसार में वृंदा के योग्य कोई वर नहीं मिला. घूमते-घूमते वह गंगातट पर पहुंची. वहां उन्होंने तपस्या में लीन गणेशजी को देखा और उन पर मोहित हो गईं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तुलसी गणेशजी को रिझाने के लिए तरह-तरह के प्रयास करने लगीं. गणेशजी तुलसी के कार्यकलापों को आश्चर्य से देख रहे थे. वह समझ नहीं पा रहे था कि स्त्री ऐसा क्यों कर रही है.
आखिरकार गणपति तुलसी के पास गए और पूछा- देवी आप कौन हैं? यहां आने का प्रयोजन क्या है? आप तरह-तरह के स्वांग क्यों रच रही हैं, इससे मुझे खलल होती है?
तुलसी ने बताया कि वह गणेशजी पर मोहित हो चुकी हैं और उनसे विवाह करना चाहती हैं. गणेशजी ने तुलसी को समझाया कि किसी ब्रह्म योगी का ध्यान भंग करना अशुभ होता है.
गणपति हंसकर बोले-काममोहित होकर मेरे तप में विध्न डालकर घोर अपराध किया है. मैं ब्रह्मचारी हूं. मुझ पर आपके ये प्रयास व्यर्थ हैं. अपने रूप-मोह में किसी और को बांधने का प्रयत्न कीजिए.
इस अपमान से तुलसी क्रोध से तिलमिलाने लगीं. उन्हें लगा कि गणेश उनके जैसी तेजस्विनी और रूपवती स्त्री का उपहास करने के लिए बहाने बना रहे हैं.
तुलसी ने गणेशजी को श्राप दे दिया- विवाह का प्रस्ताव ठुकराने के लिए आपने ब्रह्मचारी होने की कहानी गढ़ी और मेरा अपमान किया. यदि मैं नारायण की भक्त हूं तो मेरा शाप है कि आपके एक नहीं दो-दो विवाह होंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तुलसी ने गणेशजी को बिना कारण शाप दिया था. नारायण की भक्त होने के बावजूद तुलसी को अपने रूप का इतना मान है. इस बात से गणेशजी को बड़ा गुस्सा आया.
उन्होंने भी तुलसी को पलटकर शाप दिया- तुम्हें अपने रूप-गुण पर बड़ा मान है. विवाह के लिए इतनी लालायित हो. तुम्हारा विवाह असुर से होगा. सुंदर शरीर समाप्त हो जाएगा और तुम वृक्ष बन जाओगी.
असुर से विवाह और वृक्ष बन जाने का शाप सुनकर तुलसी रोने लगीं. उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. वह गणेशजी के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगीं.
गणपति का क्रोध शांत हुआ. उन्होंने कहा- मेरा शाप खाली तो नहीं जा सकता लेकिन इस शाप को वरदान के रूप में बदलने का इंतजाम कर देता हूं.
गणेशजी ने कहा- तुम नारायण भक्त हो. वृक्ष रूप में तुम भगवान नारायण को अत्यंत प्रिय हो जाओगी और पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा होगी.
नारायण के आशीर्वाद से तुम्हें हर पूजा संस्कार में सम्मान जनक स्थान मिलेगा. तुम पूजा जाओगी लेकिन मेरे पूजन में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा. तुलसी के शाप का प्रभाव यह हुआ कि गणेश की दो पत्नियाँ ऋद्धि और सिद्धि हुईं.
गणेशजी के शाप और वरदान का प्रभाव यह हुआ कि तुलसी का विवाह असुरराज जलधंर से हुआ और वह तुलसी का पौधा बनीं. उनके प्रिय ठाकुरजी शालिग्राम रूप में उनके साथ पड़े रहे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम् मंडली
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