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देवताओं से दुःखी श्रीलक्ष्मी क्षीर सागर में समाई, विष्णु ने बताई युक्ति तो लक्ष्मी फिर वापस आईं

देवताओं से दुःखी श्रीलक्ष्मी क्षीर सागर में समाई, विष्णु ने बताई युक्ति तो लक्ष्मी फिर वापस आईं

vishnulakshmi
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राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा– भगवन! तीनों लोकों में लक्ष्मी ही सबसे दुर्लभ हैं पर हैं वह चंचला तो फिर किस व्रत, होम, तप, जप, नमस्कार आदि किस कर्म के करने से स्थिर लक्ष्मी प्राप्त होती है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले– महाराज! प्राचीन काल में भृगु मुनि ने अपनी पुत्री ख्याति का विष्णु के साथ विवाह कर दिया. यही लक्ष्मी बनीं. लक्ष्मी भी श्रीविष्णु को वर के रूप में प्राप्त कर स्वयं को कृतार्थ मानकर सम्पूर्ण जगत को आनन्दित करने लगी.

यह श्रीलक्ष्मी की ही कृपा थी कि सभी में कुशलक्षेम, आनंद, मंगल और ऐश्वर्य तथा खान-पान की उत्तम उपलब्धता थी. संसार के सभी उपद्रव शांत हो गये.

ब्राह्मण हवन करने लगे. देवगण भी हवन करने से मिलने वाले भोजन को सुगमता से प्राप्त करने लगे और राजा प्रसन्नतापूर्वक चारों वर्णों की रक्षा करने लगे.

दैत्यगणों को लगा कि देवताओं सहित धरती पर भी सब बड़े आनंद से हैं तो उन विघ्न संतोषी दैत्यों को बड़ा कष्ट हुआ. उन्होंने पता किया तो पता चला हर प्रकार की सुख, संतुष्टि, समृद्धि और शुभ शांति का कारण एकमात्र श्रीलक्ष्मी हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.देवताओं ने सभी समस्याओं का एक हल श्रीलक्ष्मी में ढूंढ लिया है. इस प्रकार देवगणों को आनंद में मग्न देखकर विरोचन आदि दैत्यगण लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए तपस्या एवं यज्ञ करने लगे.

दैत्य बड़े बलशाली और प्रभावशाली थे. वे देवताओं से बस इसलिये परास्त हो जाते थे क्योंकि वे न केवल धर्म के रास्ते पर नहीं रहते थे, कदाचारी और कुबुद्धि थे.

अब जबकि दैत्य भी सदाचारी और धार्मिक हो गए तो फिर दैत्यों के तेज और बल का कोई ठिकाना ही नहीं रहा. फिर तो दैत्यों के पराक्रम से सारा संसार आक्रान्त हो गया.

बिन कुछ विशेष प्रयास किए सुख सुविधा और संकटहीन, समृद्धशाली जीवन बिताने के कारण कुछ समय बाद देवताओं को लक्ष्मी का मद हो गया. वे अहंकार में ऐसे कार्य करने लगे जो देवत्व के अनुरूप नहीं थे.

देवताओं और उनके उपासकों को वैभव सहजता से प्राप्त हो गया तो वे साफ-सफाई, पवित्रता, सत्यता आदि सभी उत्तम आचार नष्ट होने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसी बीच दुर्वासा मुनि देवराज स्वर्गलोक की ओर चले जा रहे थे. वैभव के घमंड में चूर इंद्र अपने ही मद में थे. विनयशीलता लोप हो चुकी थी. अपमान में भरे इंद्र ने दुर्वासा का अपमान कर दिया.

दुर्वासा के कोप का तो ठिकाना ही न रहा. वह जानते थे कि लक्ष्मी की कृपा के कारण इंद्र को इतना मद हो गया है. दुर्वासा ने शाप दिया कि जिस वैभव पर आपको इतना घमंड है उसे पूरी तरह खो देंगे.

देवताओं को सत्य आदि शील तथा पवित्रता से रहित होने के बाद भी जो लक्ष्मी अभी तक किसी तरह उनके पास टिकी हुईं थी. दुर्वासा के श्राप के बाद वह अचानक ही लोप हो गईं.

लक्ष्मी दैत्यों के पास चली गई थी और देवगण श्रीविहीन हो गए. देवता तो क्या सारे संसार में सब कुछ बंजर हो गया सारा वैभव, सुख सुविधा, कारोबार, शुभ लाभ सब समाप्त. अकाल, दुर्भिक्ष और पड़ने लगे.

इस घटना से देवतागण तो बहुत ही कष्ट में आ गए. उन्हें बिन प्रयास के सुख सुविधा की आदत जो पड़ गयी थी. उधर अभाव के चलते हवन पूजन और दूसरे कार्यों में भी अभाव झलकने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उधर दैत्यों को भी लक्ष्मी क्या मिली उन्हें भी उनकी प्राप्ति होते ही बहुत गर्व हो गया. दैत्यगण आपस में एक दूसरे से कहने लगे- मैं ही देवता हूं. मैं ही यज्ञ हूं. मैं ही ब्राह्मण हूं. सम्पूर्ण जगत मेरा ही स्वरूप है. ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, चन्द्र, आदि सब मैं ही हूं.

लक्ष्मीजी ने देखा कि दैत्य तो देवताओं से भी अहंकार के मामले में आगे है यही नहीं इस प्रकार अतिशय अहंकारमति में दैत्य बहुत अधिक अनैतिक काम करने लगे.

दैत्यों की भी यह दशा देखकर व्याकुल हो वह भृगुकन्या भगवती श्रीलक्ष्मी क्षीर सागर में समा गईं. क्षीर सागर में लक्ष्मी के प्रवेश करने से तीनों लोक श्रीविहीन होकर एक दम से निस्तेज से हो गए.

देवराज इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति से पूछा– महाराज! कोई ऐसा व्रत बताए जिसका अनुष्ठान करने से लक्ष्मी को प्रसन्न किया जा सके. लक्ष्मीजी एक बार प्रसन्न को जायें तो फिर हम उनको पुन: अपने वहां स्थिर भाव से रहने की प्रार्थना कर सकते हैं.

देवगुरु बृहस्पति बोले– देवेन्द्र! मैं इस सम्बन्ध में आपको अत्यंत गोपनीय श्रीपंचमी-व्रत का विधान बतलाता हूँ. इसके करने से आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी देवी प्रसन्न होंगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विधि विधान से श्रीपंचमी का व्रत करता है. वह अपने इक्कीस कुलों के साथ लक्ष्मी लोक में निवास करता हैं. जो सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को करती है, वह सौभाग्य, रूप, सन्तान और धन से सम्पन्न हो जाती हैं तथा पति को अत्यंत प्रिय होती है.

ऐसा कहकर देवगुरु बृहस्पति ने देवराज इंद्र को श्रीपंचमी-व्रत की विधि पूरे विधान को समझाकर बतलाया. इंद्र ने भी श्रीपंचमी-व्रत का पूरे विधि-विधान का विधिवत आचरण करते हुए पूर्ण पारण किया.

इंद्र को व्रत करते देखकर सभी देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, विद्याधर, नाग, ब्राह्मण, ऋषिगण तथा राजागण तो क्या सामान्य जन भी यह व्रत करने लगे.

कुछ काल के बाद व्रत समाप्त कर सबने जब एक बार फिर गुरु बृहस्पति से पूछ लक्ष्मीजी मैंने पूर्ण विधि विधान से किया है अवश्य प्रसन्न होंगी क्योंकि हमें उत्तम बल और तेज की प्राप्ति का अनुभव हो रहा है. अब आगे क्या करना होगा.

गुरु वृहस्पति ने कहा- आप सब भगवान श्री विष्णु के पास जाए. लक्ष्मीजी क्षीर सागर में विघटित हो गयी हैं वे उसमें उसी तरह मिल गयीं हैं जैसे दधि में माखन.

सब भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि विघटित हो जाने की दशा में उनको फिर से प्राप्त करने का मात्र एक ही उपाय है. क्षीर सागर का मंथन. परंतु इस कार्य में दैत्यों को भी साथ लेना होगा.

सबका विचार बना कि समुद्र को मथकर लक्ष्मी और अमुत को ग्रहण करना चाहिये. दैत्य भी लक्ष्मी के जाने से बहुत दुःखी थी वे भी इस बात पर सहमत हो गये.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.देवताओं और असुरों ने मंदारपर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया. मथानी समुद्र की तलहटी में डूब ही न जाए इसलिए भगवान विष्णु कछुआ बन उसके नीचे लगे.

देवताओं ने सांप की पूंछ पकड़ी और दैत्यों ने मुंह अब देवता और असुर मिलकर क्षीर सागर में समुद्र-मंथन करने लगे. वर्षों के मंथन के उपरांत सर्वप्रथम शीतल किरणों वाले अति उज्ज्वल चन्द्रमा प्रकट हुए, फिर देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ.

लक्ष्मी के कृपाकटाक्ष को पाकर सभी देवता और दैत्य परम आनंदित हो गए. भगवती लक्ष्मी ने इनका वरण किया. इंद्र ने राजस-भाव से व्रत किया था, इसलिए उन्होंने त्रिभुवन का राज्य प्राप्त किया.

दैत्यों ने तामस-भाव से व्रत किया था, इसलिए ऐश्वर्य पाकर भी वे ऐश्वर्यहीन हो गए. महाराज! इस प्रकार इस व्रत के प्रभाव से श्रीविहीन सम्पूर्ण जगत फिर से श्रीयुक्त हो गया.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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