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भीष्म का वचन रख, अर्जुन के बचा लिए प्राणः एक लीला में दोनों काम कर गए श्रीभगवान

भीष्म का वचन रख, अर्जुन के बचा लिए प्राणः एक लीला में दोनों काम कर गए श्रीभगवान


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महाभारत के युद्ध में दुर्योधन ने भीष्म पितामह पर बार-बार यह आक्षेप लगाना शुरू किया कि वह पांडवों का पक्ष ले रहे हैं और जिस सेना के सेनानायक हैं उसके प्रति निष्ठावान नहीं है.

इन आरोपों से आहत भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा की कि अगले दिन के युद्ध में वह पांडवों को या तो मार डालेंगे या युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध समाप्त कर देंगे.

परशुराम शिष्य भीष्म पितामह युद्ध का निर्णय करने में समर्थ थे. भगवान श्रीकृष्ण को इस प्रतीज्ञा की भनक लगी तो भगवान धर्म संकट में आ गए. एक ओर भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा थी दो दूसरी ओर अतिप्रिय अर्जुन के प्राण संकट में थे.

भगवान को नीद नहीं आ रही थी. वह बेचैनी में टहल रहे थे. आधी से ज्यादा रात बीत गई. भगवान ने सोचा प्रतिज्ञा तो अर्जुन ने भी सुनी होगी अर्जुन को भी नीद नही आ रही होगी. जाकर देखता हूं.

भगवान जैसे ही अर्जुन के शिविर में गए तो देखा अर्जुन तो खराटे मार-मार कर सो रहे है. भगवान ने कहा- अर्जुन कल पितामह ने तुम्हारे वध का प्रण लिया है फिर भी तुम चैन की नीद सो रहे हो?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अर्जुन बोले- जब मुझे बचाने वाला बेचैन है, तो फिर मै चैन से क्यों न सोऊं. भगवान समझ गए अब मुझे ही कुछ करना होगा. भगवान द्रोपदी के पास गए.

उन्होंने द्रोपदी से कहा- तुमने भीष्म का प्रण सुना होगा. यदि पूरा हुआ तो तुम विधवा हो जाओगी. द्रोपदी हंसने लगी. बोली- मैं विधवा हो जाउंगी ये चिंता मैं क्यों करूं?

भगवान बोले – द्रोपदी तुम मेरे साथ चलो. ब्रह्म मुहूर्त में द्रोपदी को लेकर भगवान पितामह के शिविर में की ओर चले. द्रोपदी की चप्पल आवाज कर रही थी.

भगवान बोले- द्रोपदी चप्पल उतार लो, आवाज कर रही है. हम विपक्षियों के शिविर में जा रहे हैं. द्रोपदी ने चप्पल उतार लीऔर भगवान ने द्रोपदी के चप्पल अपने पीताम्बर में बांध ली.

प्रभु ने द्रोपदी को खूब सिखाया कि पितामह को क्या करना है. द्रोपदी घूंघट डालकर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जाती है और पितामह के चरण स्पर्श करती हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तो पितामह के मुख से आशीर्वाद निकलता है पुत्री अखंड सौभाग्यवती भव. अब पितामह जैसा अखंड ब्रह्मचारी आशीर्वाद दे वह कैसे फलीभूत न होता!

इस आशीर्वाद के साथ ही भगवान धर्मसंकट से निकल गए. अब वह पितामह के इस वचन और अर्जुन के प्राण दोनों की रक्षा का भार ले सकते थे. प्रसन्न मन वह विश्राम करने लगे.

जब पितामह को पता चला कि जिस स्त्री को उन्होंने आशीर्वाद दिया वह तो द्रोपदी है. भीष्म समझ गए कि यह माया किसकी हो सकती है. वह मुस्कराने लगे.

उन्होंने द्रोपदी से पूछा- पुत्री, केशव कहां है? द्रोपदी बोलीं- बाहर हैं. आपके सैनिक ने अंदर नहीं आने दिया. भीष्म झटपट बाहर गए और देखा सामने एक पेड़ के नीचे द्रोपदी की चप्पल सिरहाने रखकर प्रभु आराम से सो रहे थे.

भीष्म पितामह भगवान के चरणों में गिर पड़े और बोले- प्रभु जिस भक्त की चप्पल आपने अपने सिरहाने रख ली, उस भक्त का संसार में ऐसा कौन है जो कुछ बिगाड़ सकता हो!हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भगवान तो हर समय भक्त के लिए तैयार रहते है. भगवान अर्जुन से कहते हैं- मुझसे कोई सम्बन्ध जोड़ लो. अर्जुन ने कहा- केशव आपसे सम्बन्ध तो जोड़ लूं, पर सम्बन्ध का अर्थ है दोनों ओर से एक सा बंधन. भय है केशव कि मैं न निभा पाया तो?

भगवान बोले- अर्जुन ! तु जोड़ तो सही तुम नहीं निभा पाओगे तो कोई बात नहीं मैं तो निभाऊंगा ही. और भगवान ऐसा करते भी है. सुदामा से मित्रता की और निभाई भी. अर्जुन से सम्बन्ध बनाया अर्जुन से ज्यादा निभाया.

द्रोपदी ने भगवान के हाथ से रक्त निकलता देखा, तो अपने आंचल को फाड़कर भगवान की अंगुली से बांध दिया. उस समय भगवान बोले- तुम्हारे इस चीर के हर धागे का मोल में चुकाऊंगा और भगवान ने भरी सभा में ऐसा किया भी था.

कहने का अभिप्राय हम कैसे भी हैं, भगवान हमेशा हमें निभा लेगे. हम निभा पाएं या न निभा पाएं. जैसे एक किसान गौ को खूटे से बांध देता है तो वह बंध जाती है.

जैसे हवा हमें दिखायी नहीं देती पर हमें उसके होने का अनुभव होता रहता है. इसी तरह भगवान हमें दिखायी नहीं देते परन्तु जब हम उनसे कोई सम्बन्ध जोड़ लेते हैं उनके निकट आ जाते है तो फिर हमें अनुभव होने लगता है.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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