भागवत कथाः श्रीकृष्ण-बलराम द्वारा वत्सासुर का उद्धार
वृन्दावन में स्वयं भगवान ने अवतार लिया तो धरती ने वृंदावन का भरपूर शृंगार किया.

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वृन्दावन में स्वयं भगवान ने अवतार लिया तो धरती ने वृंदावन का भरपूर शृंगार किया. प्रकृति का वैभव अलौकिक लगता था. सभी देवों ने अवतार लेकर वृंदावन के शृंगार में रौनक लगा दी.
किसी देवता ने पेड़-पौधे का रूप लिया तो किसी ने पशु का तो कोई पक्षी बना. बालकृष्ण जब गाएं चराने निकलते तो सभी देवता झूमक-झूमकर उनका स्वागत करते. तरह-तरह के पक्षी मधुर स्वरों से वातावरण को गुंजित कर रहे थे.
एक ओर गोवर्धन पर्वत, दूसरी ओर यमुना बह रह थी. बालकृष्ण प्रातः ग्वाल-बालों के साथ गायों को चराने वन में निकल जाते और आपस में तरह-तरह के खेल खेलते.
रोज की तरह ग्वाल-बालों के साथ श्रीकृष्ण गायें चराने निकले. दोपहर होने वाली थी. भगवान श्रीकृष्ण कदंब के वृक्ष के नीचे ग्वाल-बालों के साथ खेल रहे थे. चारों ओर सन्नाटा था. सहसा कन्हैया की दृष्टि उनके झुंड के बछ्ड़ों की ओर गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन बछ्ड़ों के बीच में उन्हें एक बछ्ड़े को देखकर शक हुआ. उन्होंने तुरंत पहचान लिया. दरअसल, वह कोई बछ्ड़ा नहीं था बल्कि कंस का भेजा राक्षस था जिसने बछ्ड़े का रूप धारण किया और श्रीकृष्ण के पशुओं में जा मिला.
पूतना, तृणावर्त आदि सहयोगियों के मारे जाने से हतास कंस ने सभी मित्रों को बुलाकर आदेश दिया कि वे गोकुल जाएं और उसके शत्रु का संहार करें. वत्सासुर ने कंस को निर्भय रहने का भरोसा दिया और गोकुल पहुंचा था.
वह प्रभु को हानि पहुंचाने के उचित अवसर की प्रतीक्षा में था. उसने गाय के बछ्ड़े का रूप धारण किया था, इसीलिए उसे वत्सासुर कहा गया. असुर प्रभु को हानि पहुंचाने की ताक में था और प्रभु उसके उद्धार का मुहूर्त तय कर रहे थे.
जो प्रभु संपूर्ण भूमंडल का पालन करते हैं उनसे वत्सासुर कैसे छिपा सकता था? श्रीकृष्ण ने बलरामजी को संकेतों में बता दिया कि उनके पशुधन के बीच यह राक्षस छुपा है. दोनों भाई धीरे-धीरे बढ़े और वत्सासुर के पास पहुंचे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बलरामजी ने उसकी पूंछ पकड़ी और हवा में एक बार घुमाकर उसे उछाल दिया. वह पेड़ से टकराया और दर्द से कराहने लगा. उसने श्रीकृष्ण को सींग से घायल करना चाहा.
प्रभु ने उसके पेट में इतने से प्रहार किया कि उसकी जिह्वा निकल आई. पीड़ा से कराहता वह अपने असली रूप में प्रकट हो गया और धरती पर गिरकर छटपटाने लगा. प्रभु ने जल्द ही उसे जीवन से मुक्ति देकर उद्धार कर दिया.
सभी ग्वाल-बाल उस भयानक राक्षस को देखकर डर गए लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हौसला दिया और बताया कि असुर का अंत हो चुका है. ग्वाल बाल हर्ष से नाचने लगे और प्रभु को कंधे पर उठा लिया.
संध्याकाल में लौटकर सबने श्रीकृष्ण के शौर्य की कथा सुनाई. सारे वृंदावन में उनकी प्रशंसा होने लगी. नंदबाबा अपने पुत्र की वीरता की चर्चा से प्रसन्न हो रहे थे लेकिन माता यशोदा के मन में वात्सल्य उमड़ा और अपने पुत्र के लिए चिंतित होने लगीं.
प्रभु माता के वात्सल्य में आनंद विभोर होने लगे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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