भागवत कथाः कुबेरपुत्रों नलकूबर और मणिग्रीव का उद्धार

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माता यशोदा कन्हैया को दूध पिला रही थीं. तभी उन्हें ध्यान आया कि चूल्हे पर रखा दूध उबलकर गिर रहा है. उन्होंने कान्हा को झटपट सीने से हटाया और दूध बचाने को चौके की ओर भागी.
जिस प्रभु को बालरूप में अपने आंगन में देखने के लिए इतना तप किया, ब्रह्माजी से वरदान लिया उसके ममता सुख को छोड़कर दूध की चिंता हुई! जिस सुख को देवता तरसते हैं उसे छोड़ दूध बचाने भागीं. माता माया में ऐसी फंस गई हैं!
कन्हैया ने पास में पड़ा बाट उठाया और मटकी को दे मारा. मटकी फूट गई और सारा दही मिट्टी में मिल गया. थोड़ा दूध बचाने गई थीं और हांडी भरके दही गंवा दिया. माता तो क्रोध करेगी यह सोचकर कान्हा कमरे में छिप गए.
वानरों ने देखा तो आ गए उनके पीछे. प्रभु ने पूर्व अवतार में वानरों का सहयोग लिया था. ओखली पर चढ़े और मक्खन निकालकर वानरों को बांटने लगे. माता खोजती हुई पहुंच गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु को ध्यान आया नलकूबर और मणिग्रीव उद्धार के लिए उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. प्रभु ने माया रची. यशोदा ने ओखली पर चढ़के बंदरों को माखन बांटते देखा तो क्रोधित हो गईं. उन्होंने रस्सी उठाई और कान्हा को ओखली में बांधने लगीं.
प्रभु को बांध ले ऐसी रस्सी कहां! रस्सी छोटी पड गई. माता एक में एक रस्सी जोड़ती जातीं पर रस्सी थोड़ी छोटी ही पड़े. माता को बोध हुआ कि प्रभु को कैसे बांधेगी और उनका भाव बदलने लगा. प्रभु ने सम्मोहित करके वह भाव निकाल दिया.
माता ने उन्हें आखिर ओखली में बांध ही दिया तो प्रभु चले कुबेर के पुत्रों का उद्धार करने जो अर्जुन के वृक्ष बनकर द्वार पर खड़े थे. ऊखल घसीटते हुए दोनों वृक्षों के बीच अड़ाकर खींचा. इससे दोनों अर्जुन वृक्ष भयंकर आवाज से जड़ से उखड़ गए.
वहां पर नलकूबर और मणिग्रीव प्रकट हुए. उन्होंने भगवान की स्तुति की और अपने लोक को चले गए. वृक्षों के गिरने से नंदबाबा घबरा गए और उसके बाद कभी भी नटखट बाल-गोपाल को ऊखल से नहीं बांधा गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुबेरजी के दो पुत्र थे-नलकूबर और मणिग्रीव. उन्हें धन का बड़ा घमंड था. एक बार अपनी स्त्रियों के साथ मदिरा पीकर वह नदी में स्नान कर रहे थे. तभी वहां नारदजी पहुंचे.
नारदजी को देखकर स्त्रियों ने तो तुरंत कपड़े पहन लिए लेकिन कुबेरपुत्र नंग-धडंग खड़े हंसते रहे. नारदजी ने उन्हें शाप दे दिया- तुम लोग वृक्षों की भांति खड़े रहे. जाओ गोकुल में जाकर वृक्ष बनो.
स्त्रियां विलाप करने लगीं तो नारदजी ने कहा- शाप वापस नहीं हो सकता लेकिन जब भगवान श्रीकृष्ण द्वापर में अवतार लेंगे तब वे ही तुम्हारा उद्धार करेंगे. दोनों जुडवां अर्जुन वृक्ष बने और नंदभवन के द्वार पर प्रतीक्षा करते रहे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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