भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है?
भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है? जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी की कहानी क्या है? ठाकुर जी को खिचड़ी का भोग क्यों लगने लगा? जगन्नाथ जी की खिचड़ी कैसे बनती है? करमाबाई कौन थीं?
भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है? इसकी एक बेहद लोकप्रिय और हृदय को छू लेने वाली कथा है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—’हरि अनंत हरि कथा अनंता’। भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी प्रसाद चढ़ाने से जुड़ी इस दिव्य और लोकप्रिय कथा का रस लें।
श्रीकृष्ण की परम उपासक माता करमाबाई जी भगवान को बाल भाव से भजती थीं। वह जगन्नाथ पुरी के पास ही कुटिया बनाकर रहती थीं। बालरूप ठाकुरजी से वह रोज ऐसे बातें करती थीं जैसे बिहारीजी उनके अपने पुत्र हों और उनके घर में ही साक्षात वास करते हैं। भगवान भी उनके इस निश्छल और निस्वार्थ प्रेम के वश में थे।
जब ठाकुर जी को लगी भूख और करमाबाई ने बनाई खिचड़ी

एक दिन माता करमाबाई की इच्छा हुई कि बिहारीजी को फल-मेवे की जगह अपने हाथ से कुछ सादा और पौष्टिक बनाकर खिलाएं। उन्होंने प्रभु से अपनी यह इच्छा साफ़-साफ़ बता दी। भगवान तो भक्तों के भाव के भूखे हैं और उनके लिए सर्वथा प्रस्तुत रहते हैं। गोपाल मुस्कुराते हुए बोले— “माता! जो भी बनाया हो वही खिला दो, आज बड़ी भूख लगी है।”
कर्माबाई जी ने उस समय साधारण सी खिचड़ी बनाई थी। उन्होंने तुरंत ठाकुरजी को गरम-गरम खिचड़ी प्रसाद के रूप में परोस दी। भगवान ने अपने भक्त का यह खिचड़ी प्रसाद बड़े चाव से खाया। कर्माबाई जी ममता के वश में होकर प्रभु को पंखा झलने लगीं कि कहीं गरम खिचड़ी से ठाकुरजी का कोमल मुंह न जल जाए।
संसार को अपने मुख में समाने वाले ब्रह्मांड के नायक को एक भक्त माता की तरह पंखा कर रही थी। भगवान भक्त की इस अनन्य भावना में पूरी तरह विभोर हो गए। भक्तवत्सल भगवान ने तृप्त होकर कहा— “माता! मुझे तो यह खिचड़ी भोग बहुत अच्छा लगा। मेरे लिए आप रोज सुबह उठकर खिचड़ी प्रसाद ही पकाया करो। मैं तो अब यही खिचड़ी भोग खाऊंगा।”
अब कर्माबाई जी रोज सुबह उठतीं और बिना किसी बाहरी आडंबर के सबसे पहले प्रभु के लिए खिचड़ी प्रसाद बनातीं। बाल रूप बिहारीजी भी सुबह-सबेरे दौड़े चले आते और आते ही मचलते हुए कहते— “माता, जल्दी से मेरा प्रिय खिचड़ी भोग लाओ।” प्रतिदिन का यही दिव्य क्रम बन गया। भगवान सुबह-सुबह आते, प्रेम का भोग लगाते और फिर चले जाते।
एक बार एक कर्मकांडी साधु कर्माबाई जी की कुटिया पर आया। उसने माता को सुबह-सुबह बिना स्नान-ध्यान किए, सबसे पहले रसोई में खिचड़ी बनाते देखा। साधु ने नियम-धरम की दुहाई देते हुए नाराज होकर कहा— “माता! शास्त्र कहते हैं कि सर्वप्रथम नहा-धोकर पूजा-पाठ करनी चाहिए, शुद्ध होना चाहिए। लेकिन आपको तो सुबह होते ही पेट की चिंता सताने लगती है?”
कर्माबाई जी ने सरलता से जवाब दिया— “महाराज, क्या करूं? संसार जिस भगवान की पूजा-अर्चना में लगा रहता है, वही सुबह-सुबह मेरे घर भूखे आ जाते हैं। उनके लिए ही तो यह खिचड़ी प्रसाद बनाती हूँ।”
साधु ने सोचा कि शायद कर्माबाई की बुद्धि फिर गई है, भला भगवान इसके बनाए खिचड़ी प्रसाद के लिए भूखे क्यों रहने लगे? उसने कहा— “तुम भगवान को अशुद्ध अन्न खिलाकर पाप कर रही हो। सुबह स्नान के बाद पहले रसोई की सफाई करो, फिर पूरी शुद्धता से भगवान के लिए भोग बनाओ।”
जब रूठ गया खिचड़ी का असली भाव और स्वाद

अगले दिन कर्माबाई जी ने साधु की बात मान ली। साधु-संत की बात थी, उसकी अवहेलना वह कैसे करतीं। जैसे ही सुबह हुई, भगवान हमेशा की तरह दौड़ते हुए आए और बोले— “माँ, मैं आ गया, जल्दी से खिचड़ी भोग लाओ।” कर्माबाई जी ने कुटिया के अंदर से ही कहा— “प्रभु! अभी मैं स्नान कर रही हूँ, थोड़ा रुको!”
थोड़ी देर बाद भगवान ने फिर व्याकुल होकर आवाज लगाई— “जल्दी कर मां! मेरे मंदिर के पट खुल जाएंगे, मुझे वहां भी जाना है।” वह फिर बोलीं— “प्रभु, अभी मैं रसोई की सफाई कर रही हूँ, उसके बाद ही भोग बनाऊंगी।” भगवान ने सोचा कि आज मेरी माँ को क्या हो गया है? ऐसा प्रेम तो पहले कभी नहीं बदला था।
जब खिचड़ी बनी, तो माता के हाथ से मिला वह प्रसाद भगवान ने झटपट और बहुत जल्दी-जल्दी में खाया। पर आज ठाकुर जी को उस खिचड़ी भोग में ‘भाव और प्रेम’ का वह पुराना स्वाद नहीं आया। जल्दी-जल्दी में भगवान बिना पानी पिए ही मंदिर की तरफ भागे। बाहर जाते समय उन्होंने उस साधु को देखा, तो वे तुरंत समझ गए कि ज़रूर इसी ने मेरी माँ को कोई उल्टी पट्टी पढ़ाई है।
जगन्नाथ मंदिर के पुजारी का आश्चर्य
वहाँ मंदिर में, ठाकुरजी के मुख्य पुजारी ने जैसे ही सुबह के पट खोले तो वह दंग रह गए। उन्होंने देखा कि भगवान जगन्नाथ के दिव्य मुख पर खिचड़ी लगी हुई थी। पुजारी जी हाथ जोड़कर बोले— “प्रभु! यह चमत्कार कैसे? आपके मुख पर यह खिचड़ी कैसे लग गई?”
भगवान ने उदास होकर कहा— “पुजारी जी! आप तुरंत उस संत के पास जाओ जो करमाबाई की कुटिया पर रुका है, और उसे समझाओ कि उसने मेरी माँ को कैसी पट्टी पढ़ा दी है। उसने मेरे प्रेम के बीच में नियम-कानून खड़े कर दिए।” पुजारी ने संत के पास जाकर भगवान की यह बात कही।
संत यह सुनते ही घबरा गए और तुरंत कर्माबाई जी के पास जाकर रोने लगे। उन्होंने कहा— “माता! ये नियम-धरम तो हम जैसे साधारण संतों के लिए हैं। आप तो प्रभु की माता हैं, आप जैसे पहले प्रेम से बनाती थीं, वैसे ही बनाएं।”
इसके बाद ठाकुर जी फिर से चाव से खिचड़ी प्रसाद खाते रहे। जगन्नाथ जी को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है- क्योंकि भगवान ने करमाबाई की खिचड़ी में जो प्रेमभाव पाया वह संसार में कहीं और न था।
जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है? परंपरा कैसे शुरू हुई?
भगवान अपनी बनाई हुई और भक्त के साथ तय की गई व्यवस्था को कभी बदलते नहीं हैं। सो, एक दिन कर्माबाई जी का समय पूरा हुआ और उनके प्राण छूटे। उस दिन भगवान जगन्नाथ बहुत रोए। जब सुबह पुजारी ने मंदिर के पट खोले तो देखा कि विग्रह की आँखों से आँसू बह रहे थे।
पुजारी ने व्याकुल होकर रोने का कारण पूछा तो भगवान बोले— “पुजारी जी! आज मेरी माँ इस नश्वर लोक को छोड़कर मेरे परम धाम को विदा हो गई है। अब मुझे सुबह-सुबह उठकर ऐसी ममता से भरी खिचड़ी बनाकर कौन खिलाएगा?”
पुजारी का हृदय भी भर आया। उन्होंने प्रभु को ढांढस बंधाते हुए कहा— “प्रभु! आपको आपकी माता की कमी कभी महसूस नहीं होने दी जाएगी। आज से इस मंदिर में सबसे पहले रोज सुबह आपको इसी खिचड़ी का मुख्य भोग लगेगा।” इस तरह, माता करमाबाई के जाने के बाद आज भी पुरी के जगन्नाथ मंदिर में सुबह का सबसे पहला भोग ‘खिचड़ी प्रसाद’ के रूप में ही लगता है।
भगत के वश में हैं भगवान-सदना जी की विभोर करने वाली कथा
जगन्नाथ पुरी में कैसे बनती है यह दिव्य खिचड़ी?
अभी तक आपने जान लिया कि भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी को महाप्रसाद कहते हैं। इस खिचड़ी महाप्रसाद को बनाने की विधि अपने आप में अनोखी और अलौकिक है:
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सप्त घड़ा पद्धति: रसोई में एक के ऊपर एक मिट्टी के सात बर्तन (घड़े) रखे जाते हैं।
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अद्भुत चमत्कार: सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जो बर्तन सबसे ऊपर होता है, उसकी खिचड़ी सबसे पहले पकती है। इसके बाद क्रमशः नीचे के बर्तनों की खिचड़ी पकती है।
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लकड़ी के चूल्हे और गंगा-यमुना कुआँ: महाप्रसाद को पकाने के लिए केवल सूखी लकड़ी के चूल्हों का उपयोग किया जाता है। पानी के लिए मंदिर परिसर में स्थित ‘गंगा’ और ‘यमुना’ नाम के दो विशेष कुओं के जल का ही प्रयोग होता है।
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सात्विकता का नियम: इस खिचड़ी को बनाने में केवल देसी घी, चावल, मूंग दाल और चुनिंदा मसालों का उपयोग होता है। इसमें आलू, टमाटर, फूलगोभी जैसी विदेशी सब्जियां या प्याज-लहसुन का उपयोग पूरी तरह वर्जित है।
भगवान जगन्नाथ को चढ़ने वाले खिचड़ी महाप्रसाद से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य
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कभी कम नहीं पड़ता प्रसाद: मंदिर में हर दिन चाहे कितने ही लाख श्रद्धालु आ जाएं, यह महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता और न ही कभी व्यर्थ (बर्बाद) होता है। मंदिर के कपाट बंद होते ही प्रसाद भी अपने आप समाप्त हो जाता है।
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दिव्य सुगंध: जब यह खिचड़ी मंदिर की रसोई में पकती है, तो इसकी सुगंध पूरे मंदिर परिसर में फैल जाती है, जो श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।
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विमला देवी का भोग: जगन्नाथ जी को भोग लगाने के बाद इस खिचड़ी को मां विमला के सम्मुख रखा जाता है, जिसके बाद ही यह ‘महाप्रसाद’ का रूप लेती है।
भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है, आशा है यह भाव समझ में आया होगा। दिल को भाया होगा।
निष्कर्ष: भक्ति का असली रस
भगवान कृष्ण जिनके लिए चलाते थे चक्कीः जनाबाई
ये केवल किंवदंतियां या कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि भक्तों की भगवान के प्रति अनन्य आस्था और बदले में भगवान का भक्तों के प्रति कई गुना ज्यादा स्नेह को प्रमाणित करने वाले सजीव उदाहरण हैं। यदि आप इन प्रसंगों में केवल तर्क ढूँढेंगे तो कुछ हाथ नहीं आएगा, लेकिन अगर भक्ति का रस चखने की कोशिश करेंगे तो असीम आनंद की अनुभूति होगी। भगवान जगन्नाथ को प्रणाम करते हुए खिचड़ी प्रसाद चढ़ने की यह कथा भक्तिभाव से पढ़ें और दूसरों सुनाकर पुण्य अर्जित करें।
ईश्वर की शक्ति और भक्त के प्रेम के आगे संसार की हर तर्कशीलता नतमस्तक होती है।
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संकलनः राजन प्रकाश
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