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जिसका किया ध्यान वैसा ही हो गया इंसान

जिसका किया ध्यान वैसा ही हो गया इंसान

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एक बार भगवान राम को उनके गुरू महर्षि वशिष्ठ ने ध्यान की महिमा बताते हुये कहा- राम, ध्यान ऐसी अनूठी चीज है कि यदि कोई सच्चे मन से किसी का ध्यान करे और वह ध्यान पूर्णता को प्राप्त हो जाए तो वह व्यक्ति उसी का रूप ले लेता है जिसका वह ध्यान कर रहा होता है.

महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को ध्यान के बारे में एक कथा सुनायी. प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते करते थक गये थे. हालांकि अभी सृष्टि का काम पूरा हो गया हो ऐसा नहीं था. बहुत काम बाकी था सो ब्रह्माजी ने एक पहर नींद ले लेने की सोची.

ब्रह्मा सो गये. महाप्रलय की रात्रि का वह चौथा चरण था जब उनकी निद्रा टूटी. परमेश्वर को याद किया और एक बार फिर पूरे उत्साह से सृष्टि रचना की इच्छा से वह शय्या से उठ खड़े हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भवन से बाहर आये तो उन्हें ऐसी बहुत सी चीजें दिखाई दे रही थीं जिसे उन्होंने बनाया ही नहीं थी. उन्हें लगा कि अब बनाने को क्या बाकी रह गया. सृष्टि रचना का शेष कार्य तो मेरे रचने से पहले ही पूरा हो ही चुका है. जो चीजें बनाने की सोच रखी थी वह किसी और ने कैसे रच दी!

यह सब देखकर अचकचाये और अचरज से भरकर ब्रह्माजी ने सूर्य भगवान से पूछा- यह कैसा अचरज है, संसार को रचने की, सृष्टि निर्माण की क्षमता तो केवल मुझे ही मिली है, फिर मेरे शयन काल में किसने कर दी ये रचनाएं.

यह सृष्टि किसने रचकर तैयार कर दी? सूर्य बोले- ब्रह्माजी यह तो आपने सिर्फ पूर्व दिशा की ओर ही दृष्टि डाली है, आपने अभी पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ईशान आदि शेष नौ दिशाओं और आकाश तथा पाताल को तो देखा ही नहीं.

प्रजापति ने दशों दिशाओं की ओर घूमकर देखा तो उन्हें सभी जगह एक से एक बढ कर नयी चीजें दिखी, उनका शक और गहरा हो गया कि ज़रूर कोई चक्कर है. ब्रह्मा ने सूर्य से कहा- सूर्यनारायण! अब और अधिक पहेली मत बुझाइये.

आपसे तो कुछ भी छिपा नहीं. आप निरंतर अपने रथ पर चलते ही रहते हैं, कृपया अब तो बता दीजिये कि यह सब सृष्टियाँ रचीं किसने? मुझ जैसी क्षमता किसी में आईं तो आखिर किसके वरदान से और कैसे आई?

सूर्य भगवान ने तब ब्रहमा जी को बताया- हे प्रजापति! आपने जो पहले जो सृष्टि रची थी उसमें इन्दु नामक एक ब्राह्मण भी था. जब उसके के बहुत समय तक कोई सन्तान न हुई, तो वह बहुत दुखी हुआ और उसने भगवान् शिव की घोर पूजा की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शिवजी प्रसन्न होकर बोले- तू एक संतान पाने के लिए इतनी कठिन तपस्या कर रहा है, मैं तुझे दस बेटों का वरदान देता हूं. यह कह कर भगवान शिव अंतर्धान हो गए.

समय पाकर इन्दु के दस पुत्र पैदा हुए. उनकी शिक्षा-दीक्षा बस पूरी ही हुई थी कि एक दिन ब्राह्मण इन्दु की मौत हो गई. पुत्रों ने सोचा कोई ऐसा काम करना चाहिए, जिससे हमारे पिता की कीर्ति अमर हो जाये.

सबने सोचा कि आज तक बस प्रजापति ने ही सृष्टि रची है, किसी मनुष्य ने सृष्टि नहीं रची. सो हम दसों को दस ब्रह्म बनकर अपने पिता की याद में दस सृष्टियों की रचना करनी चाहिए. यह कर सकें तो पिता का नाम अमर हो जायेगा.

ऐसा निर्णय करने के बाद वे दसो आपका ही ध्यान करने लगे. आपका ध्यान करते-करते उनका ध्यान पूर्णता को प्राप्त हो गया. उनका संकल्प निष्ठ हो गया तो उनमें भी आप जैसी शक्ति आ गयी. आगे क्या हुआ वह आप देख ही रहे हैं.

इतनी कथा सुनाने के बाद महर्षि वशिष्ठ ने कहा- हे राम! मन्त्र के साथ ध्यान का यही विज्ञान है. मनुष्य पूरे मनोयोग के साथ एकनिष्ठ होकर जिसका भी ध्यान करता है, वह उसकी ही तरह शक्ति संपन्न हो जाता है. इसीलिए आपने कई शिवस्वरूप सुने होंगे.
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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