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ईश्वर कैसे मिलेंगे? क्या है ईश्वर की प्राप्ति का विधान है?

ईश्वर कैसे मिलेंगे? क्या है ईश्वर की प्राप्ति का विधान है?

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एक था मजदूर। मजदूर तो था, साथ-ही-साथ किसी संत महात्मा का प्यारा भी था। सत्संग का प्रेमी था। उसने शपथ खाई थी! मैं उसी का बोझ उठाऊँगा, उसी की मजदूरी करूँगा, जो सत्संग सुने अथवा मुझे सुनाये.

प्रारम्भ में ही यह शर्त रख देता था। जो सहमत होता, उसका काम करता। एक बार कोई सेठ आया तो इस मजदूर ने उसका सामान उठाया और सेठ के साथ वह चलने लगा।

जल्दी-जल्दी में शर्त की बात करना भूल गया। आधा रास्ता कट गया तो बात याद आ गई। उसने सामान रख दिया और सेठ से बोला- “सेठ जी ! मेरा नियम है कि मैं उन्हीं का सामान उठाऊँगा, जो कथा सुनावें या सुनें। अतः आप मुझे सुनाओ या सुनो।

सेठ को जरा जल्दी थी। वह बोला- “तुम ही सुनाओ।” मजदूर के वेश में छुपे हुए संत की वाणी से कथा निकली। मार्ग तय होता गया। सेठ के घर पहुंचे तो सेठ ने मजदूरी के पैसे दे दिये।

मजदूर ने पूछा- “क्यों सेठजी ! सत्संग याद रहा?” “हमने तो कुछ सुना नहीं। हमको तो जल्दी थी और आधे रास्ते में दूसरा कहाँ ढूँढने जाऊँ? इसलिए शर्त मान ली और ऐसे ही ‘हाँ… हूँ…..’ करता आया। हमको तो काम से मतलब था, कथा से नहीं।”

भक्त मजदूर ने सोचा कि कैसा अभागा है ! मुफ्त में सत्संग मिल रहा था और सुना नहीं ! यह पापी मनुष्य की पहचान है।
“तुलसी पूर्व के पाप से हरिचर्चा नहीं सुहाय। जैसे ज्वर के जोर से भूख विदा हो जाय।।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे. अचानक उसने सेठ की ओर देखा और गहरी साँस लेकर कहा- “सेठ! कल शाम को सात बजे आप सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाओगे। अगर साढ़े सात बजे तक जीवित रहें तो मेरा सिर कटवा देना।”

जिस ओज से उसने यह बात कही, सुनकर सेठ काँपने लगा। भक्त के पैर पकड़ लिए। भक्त ने कहा- “सेठ! जब आप यमपुरी में जाएँगे तब आपके पास और पुण्य का लेखा जोखा होगा, हिसाब देखा जाएगा। आपके जीवन में पाप ज्यादा हैं, पुण्य कम हैं।

अभी रास्ते में जो सत्संग सुना, थोड़ा बहुत उसका पुण्य भी होगा। आपसे पूछा जायेगा कि कौन सा फल पहले भोगना है? पाप का या पुण्य का ? तो यमराज के आगे स्वीकार कर लेना कि पाप का फल भोगने को तैयार हूँ पर पुण्य का फल भोगना नहीं है, देखना है। पुण्य का फल भोगने की इच्छा मत रखना।

मरकर सेठ पहुँचे यमपुरी में। चित्रगुप्तजी ने हिसाब पेश किया। यमराज के पूछने पर सेठ ने कहा- “मैं पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता और पाप का फल भोगने से इन्कार नहीं करता। कृपा करके बताइये कि सत्संग के पुण्य का फल क्या होता है? मैं वह देखना चाहता हूँ।”

पुण्य का फल देखने की तो कोई व्यवस्था यमपुरी में नहीं थी। पाप-पुण्य के फल भुगताए जाते हैं, दिखाये नहीं जाते। यमराज को कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा मामला तो यमपुरी में पहली बार आया था।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.यमराज उसे ले गये इन्द्र के पास। इन्द्र ने कहा- “पुण्य का फल तो भुगतवाया जाता है, दिखाया नहीं जाता।” सेठ बोलाः “नहीं सत्संग के पुण्य का फल मैं भोगना नहीं चाहता, सिर्फ देखना चाहता हूँ।”

इन्द्र भी उलझन में पड़ गये। चित्रगुप्त, यमराज और इन्द्र तीनों सेठ को ले गये भगवान आदि नारायण के समक्ष। इन्द्र ने पूरा वर्णन किया। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे। तीनों से बोले- “ठीक है. जाओ, अपना-अपना काम सँभालो।”

सेठ को सामने खड़ा रहने दिया। सेठ बोला- “प्रभो ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं है, अपितु देखना है।” प्रभु बोले- “चित्रगुप्त, यमराज और इन्द्र जैसे देव आदरसहित तुझे यहाँ ले आये और तू मुझे साक्षात देख रहा है, इससे अधिक और क्या देखना है?”

“एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध। तुलसी सत्संग साध की, हरे कोटि अपराध।।” जो चार कदम चलकर श्रीरामजी के सत्संग में जाता है, तो यमराज की भी ताकत नहीं उसे हाथ लगाने की।

सत्संग-श्रवण की महिमा इतनी महान है. सत्संग सुनने से पाप-ताप कम हो जाते हैं। पाप करने की रूचि भी कम हो जाती है। बल बढ़ता है दुर्बलताएँ दूर होने लगती हैं।

तुलसीदास जी को जब पत्नी ने ताना मरा, तब उनका वैराग्य जग आया। वे भगवान से प्रार्थना करने लगे- “हे प्रभो ! मैं तेरा भक्त बनने का अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि मैं कुटिल हूँ, कामी हूँ, खल हूँ. मैं तेरे भक्त का सेवक ही बन जाऊं।

सेवक भी न बन पाऊँ तो भक्त के घर की गाय ही बना देना स्वामी ! तेरे सेवक तक मेरा दूध पहुँचेगा तब भी मेरा कल्याण हो जाएगा। गाय बनने की योग्यता भी नहीं हो तो तेरे भक्त के घर का घोड़ा बनूँ।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तेरी चर्चा होगी, वहाँ आने-जाने में मेरा उपयोग होगा तब भी मैं धन्य हो जाऊँगा। घोड़ा बनने की भी पुण्याई नहीं तो मुझे उसके घर का कुत्ता ही बना देना नाथ ! उसके हाथ का रूखा-सूखा टुकड़ा भी मिल जायेगा तो मैं पवित्र हो जाऊँगा और तेरी भक्ति भी हो जाएगी।”

तुलसीदासजी ने सच्चे हृदय से भगवान से प्रार्थना की। भगवान से नाता जुड़ गया। अन्तर्मुखता बढ़ी तो भगवान ने उनको तुलसीदास से भक्त कवि संत तुलसीदास बना दिया।

“तुलसी तुलसी क्या करो, तुलसी बन की घास। कृपा भयी रघुनाथ की, तो हो गये तुलसीदास।।”

भगवान को अपना मानना और अपने को भगवान का मानना यही वह भाव है जो व्रत, तप, तीर्थाटन करने से जो लाभ होता है, उससे कई गुना ज्यादा लाभ देता है. ईश्वर आपका है और आप ईश्वर के हैं, यह दृढ़ भावना रखिए।

जीवन में इस बात को चरितार्थ कर लीजिए, बेड़ा पार हो जायेगा। परमात्मा सर्वत्र है, सुलभ हैं, लेकिन ऐसे परमात्मा का अनुभव करानेवाले महात्मा दुर्लभ हैं। ऐसे महात्मा का संग मिल जाय तो जीवन में रंग आ जाये।

संकलनः विवेक शुक्ला
संपादनः राजन प्रकाश

(यह भक्तिकथा विवेक शुक्लाजी ने इंदौर से भेजी. विवेकजी स्वव्यवसायी हैं और धार्मिक चर्चाओं में गहरी रूचि लेते हैं. इनकी भेजी कथाएं प्रभु शरणम् में प्रकाशित होती रहती हैं.)

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