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जानिए क्या है मंत्र और औषधि से भी ज़्यादा प्रभावशाली वस्तु जिससे होता है संकट समाधान

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सनातन धर्म के इतिहास में कुल सात मनु हुए हैं. मनुओं ने सनातन धर्म को समय-समय पर व्यवस्थित किया. वेदों के ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया. मानव जाति, देश और समाज को सभ्य बनाया, विकसित किया और तकनीक दी. यह कथा दूसरे मनु स्वारोचिष के जन्म की है

वरुणा नदी के किनारे अरुणास्पद नगर में एक ब्राह्मण रहता था. उसके मन में पूरी धरती पैदल घूमने की बड़ी इच्छा थी. एक दिन उसके घर एक आदमी आया. वह बड़ा सिद्ध था. ब्राह्मण ने उसकी खूब आवभगत की.

बातचीत में उसने बताया कि मंत्रों की ताकत और जड़ी बूटियों के प्रभाव को एक साथ इस्तेमाल किया जाये तो बहुत बड़ा चमत्कार हो सकता है. उसने इस तरह के कई चमत्कारों,देशों, नगरों, स्थानों और दुर्लभ तीर्थों का बखान किया.

यह सब सुनकर अचरज में भरकर ब्राह्मण बोला- क्या मंत्र और जड़ी बूटी से तैयार कोई ऐसा भी उपाय है जो दुनिया घूमने की मेरी चाहत पूरी कर सके. आदमी बोला क्यों नहीं, उसी की शक्ति से तो मैं हजारों योजन चल कर यहां आया हूं.

औषधि और मंत्र के जानकार उस सिद्ध ने ब्राह्मण को एक लेप दिया. उसने बताया कि इसे पैरो में लेप कर जिस दिशा में चाहोगे, घड़ी भर में हजारों योजन पैदल ही पहुंच जाओगे.

ब्राह्मण ने उस लेप की परीक्षा लेने के लिए पैरों में लगाया और पैदल ही हिमालय पहुंच गया. हिमालय पर सिद्ध, गंधर्व, किन्नर, और तपस्वी दिखे. हर ओर बहुत सुंदर नजारा था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उसे आनंद आ गया. घूमते में यह ध्यान ही नहीं रहा कि वहां बर्फ थी. उस पर चलते रहने से उसके पैरों का सारा लेप ही घुल गया. जब ब्राह्मण को थकान लगी और चाल ढीली पड़ी तो उसे इस बात का अहसास हुआ.

उसे घर लौटने की चिंता सताने लगी. परंतु लेप तो अब घुल गया था. अब वह इतनी दूर वापस कैसे जायेगा. संध्या, पूजन,हवन का क्या होगा? यही सोचता वह ब्राह्मण हिमालय पर चक्कर लगाने लगा.

ऐसे में वरुथिनी नाम की अप्सरा ने उसे देख लिया और पहली हे नजर में उस पर मर मिटी. ब्राह्मण ने वरूथिनी से पूछा- तू कौन है और यहां क्या कर रही है? यहीं की हो तो मुझे यहां से निकलने का कोई रास्ता और उपाय बताओ ताकि मैं घऱ जा सकूं.

जवाब में वरुथनी बोली कि घर जाकर क्या करोगे? मेरा नाम वरूथिनी है. मैं आपको देखते ही आप से प्रेम करने लगी हूं. मेरे साथ रहेंगे तो हर तरह के सुख दूंगी. इस रमणीक क्षेत्र में युवावस्था लंबे समय तक बनी रहती है. देवभूमि में रहकर कुछ दिन विषय भोग का आनंद लीजिए फिर घर भी चले जाइयेगा.

ब्राह्मण ने कहा- मैं ऐसा नहीं कर सकता. मेरे गुरुओं ने कहा है कि पराई स्त्री को छूना भी मत. मैं तो तुझ पर निगाह भी न डालूंगा. वरूथिनी ने कहा कि वह उनके बिना मर जाएगी. पर ब्राह्मणदेव न माने और हाथ में जल ले मंत्र पढने लगे.

ब्राह्मण ने कहा- हे अग्निदेव अगर मैंने दूसरे के धन और पराई स्त्री की इच्छा कभी न की हो और मेरा गृहस्थ व्रत सच्चा है तो मैं सूरज डूबने के पहले ही घर पहुंच जाऊं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अचानक ही उनके शरीर से रोशनी फूटी, वे देह से निकली आग की लपटों में घिर गये. अपने सदाचार के बल पर अगले ही क्षण वे अपने घर पर थे. वरुथिनी निराश खड़ी रह गयी.

कलि नाम का एक गंधर्व जो वरूथिनी से एकतरफा प्रेम करता था, पर वरूथिनी घास न डालती थी, उसने वरूथिनी को उदास देख अपनी योग माया से जान लिया की वरूथिनी का यह हाल किसी ब्राह्मण के कारण है.

कलि ने वरूथिनी को हासिल करने के लिये ब्राह्मण का भेष धरकर उसके पास पहुंच गया. वरूथिनी ने उसे देखकर ब्राह्मण देव, कृपा करो कहते हुये फिर लिपट गयी. गांधर्व ने ब्राह्मण बन उसके साथ रहना शुरू किया तो वरूथिनी को एक बेटा पैदा हुआ.

सूर्य के समान तेजस्वी यह बालक ‘स्वरोचिष’ नाम से प्रसिद्ध हुआ. स्वरोचिष आयुर्वेद के भारी जानकार और धनुष चलाने में माहिर थे. स्वरोचिष ने विद्याधर इंदीवर की कन्या मनोरमा के शादी की. मनोरमा की दो सुंदर सखियां कलावती और विभावरी शाप के चलते कुष्ठ और क्षय से पीड़ित थीं.

स्वरोचिष ने उन्हें अपनी चमत्कारिक औषधि से रोगमुक्त कर दिया तो उन दोनों के पिताओं ने उनको स्वरोचिष को ही सौंप दिया. साथ में पद्मिपनी विद्या और भूतप्राणियों की बोली बोलने तथा समझने की शक्ति प्रदान की.

दोनों से स्वरोचिष को तीन बेटे हुए. एक बार स्वरोचिष वन विहार करने गए, एक हिरनी ने कहा कि वे उसे गले लगे. आलिंगन करते ही हिरनी अप्सरा बन कर बोली- देवताओं ने मुझे आपकी स्त्री बनाया है आप मुझसे एक ऐसा पुत्र पैदा करें जो समूची धरती का स्वामी हो. स्वरोचिष ने उसकी बात मान उससे एक दिव्य पुत्र पैदा किया.

स्वरोचिष का पुत्र होने से उसका नाम स्वारोचिष मनु नाम रखा गया. इनका समय ही स्वारोचिष मन्वन्तर कहलाता है, जो दूसरा मन्वन्तर है. स्वारोचिष मनु के कुल नौ पुत्र थे, इन्हीं में से किम्पुरुष आदि पुत्र उन दिनों समस्त संसार के राजा बने थे.
स्रोत: मार्कंडेय पुराण

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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