मां दुर्गा की कृपा से असाध्य रोग भी हुए दूर: नवरात्र कथा
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक गांव में भगवती दुर्गा का परम भक्त ब्राह्मण रहता था. गांव का नाम था पीठत और देवीभक्त ब्राह्मण का नाम था अनाथ. वह हर दिन बड़े विधि विधान से जगदंबा देवी की पूजा करता था.
अनाथ की सुमति नामक एक बेटी थी, जो रोज़ पिता की पूजा की तैयारी में हाथ बंटाती और पूजा में शामिल भी होती थी. एक दिन अपनी सहेलियों से खेलने लगी और समय का भान न होने से पूजा में टाइम से पहुंच नहीं पाई.
पिता अनाथ को पूजा में परेशानी हुई तो वह बहुत नाराज हुआ. अनाथ ने उसे डांटते कहा, सुमति तूने आज भगवती का पूजन नहीं किया, देखना मैं किसी दरिद्र और कुष्ठ रोगी से तेरा ब्याह कर दूंगा.सुमति को पिताजी के कोसने पर बहुत दुःख हुआ, और उसने कहा, पिताजी, नादानी में मुझे समय का ध्यान नहीं रहा मैं इसके लिये आपसे क्षमा मांगती हूं. मुझे लगता है कि मां जगदंबा भी मेरी इस भूल को माफ कर देंगी.
पर अनाथ का गुस्सा शांत न हुआ. वह बोला कि मां जगदंबा की पूजा मेरे लिये जीवन और सब बातों से बढ कर है. मैं उसमें किसी भी तरह की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकता. अब मैंने अगर ऐसा कह दिया तो देखना मैं तेरा विवाह किसी निर्धन कुष्ठ रोगी से ही करुंगा.
इस पर सुमति ने अनाथ से कहा आपकी कन्या होने के नाते मैं हर तरह से आपके अधीन हूँ. आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा. आप उसको नहीं बदल सकते.
यह सुन कर अनाथ का क्रोध और बढ़ गया, उसने पक्का इरादा कर लिया कि वह अपनी कर के मानेगा. कुछ बरस बाद उसने ढूंढ कर सुमति का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया .दरिद्र शादी कर के अपनी पत्नी को लेकर जाता भी कहाँ इसलिये सुमति और उसके पति ने विदायी के बाद वह रात जंगल में बड़े दुःख तकलीफ से गुजारी. उसकी तकलीफ देख मां अंबे वहां प्रकट हो गयीं.
असल में अनाथ के साथ सुमति ने भी मां जगदंबे की बहुत दिनों तक मन लगा कर पूजा की थी इसलिये उसके उसकी ऐसी दशा देख भगवती प्रकट हुई थी. मां अंबे ने उससे कहा, कि हे दीन ब्राह्मणी, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो मांग ले.
सुमति के यह पूछने पर कि मां मुझ दीन हीन पर ऐसी कृपा कैसे? इस पर देवी मां ने बताया की मैं ही आदि शक्ति माँ हूँ, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूँ. इस जन्म में तुम ने अपने किशोरावस्था के दौरान सच्चे दिल से जो मेरी पूजा की और साथ ही तेरे पिछले जन्म के कर्म भी बहुत अच्छे थे , इसलिये मैंने तुझे दर्शन दिये.पिछले जन्म में तू एक केवट की पतिव्रता पत्नी थी, . एक दिन तेरे पति ने चोरी की और सिपाहियों ने तुम दोनों को जेलखाने में बंद कर दिया. सिपाहियों ने वहां उन्होंने तुम दोनों को खाने को भी न दिया.
उन दिनों नवरात्र के दिन थे. अगले कुछ दिनों तक भी उन्होंने जल के अलाव कुछ भी न दिया इस तरह से तुम दोनों का नौ दिन का व्रत हो गया. उस व्रत के प्रभाव से मैं तुम्हें तुम्हें मुंहमांगा वर दे रही हूं, मांगो.
सुमति ने देवी मां से कहा, मां दुर्गा आप मेरे पति को पूरी तरह ठीक कर दें . देवी ने उससे कहा तू अपने एक दिन के व्रत का प्रभाव अपने पति को दे दे. सुमति ने कहा ठीक है और अपने पति को अपने एक दिन के नवरात्र व्रत का प्रभाव दे दिया.
बस एक दिन के ही प्रभाव से उसका पति तुरंत ही चंगा हो गया . सुमति और उसके पति ने मिलकर जगदंबे मां की खूब स्तुति की तो अंतरधान होने से पहले मां ने उसे व्रत विधि बतायी और शीघ्र ही पुत्रवती होने का वर भी दे दिया.
सुमति के स्वस्थ पति ने स्वस्थ पति ने मेहनत कर धन कमाया और समय आने पर सुमति को एक सुंदर सा बेटा हुआ जिसका नाम उसने उदालय रखा.
स्रोत: लोकश्रुत
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
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