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बाणासुर ने रक्षा के लिए की शिवजी से गुहार, श्रीकृष्ण से आ भिड़े भोलेनाथ, सुनकर भक्त की पुकारः भाग-2

बाणासुर ने रक्षा के लिए की शिवजी से गुहार, श्रीकृष्ण से आ भिड़े भोलेनाथ, सुनकर भक्त की पुकारः भाग-2

ShivKrishna
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पिछली कथा से आगे…दूसरा भाग
राजा बलि के सौ पुत्रों में से बाणासुर सबसे प्रतापी था. एक बार उसने कुमार कार्तिकेय को देखा. वह बालक थे. कार्तिकेय को देखकर उसके मन में दैवयोग से शिव-पार्वती का पुत्र बनने की इच्छा जागी.

शिव-पार्वती के संतान के रूप में जन्म पाने के लिए वह घोर तप करने लगा. वह प्रतिदिन महाकाल, त्रिपुरारी, अर्धनारीश्वर, ईशान, त्रिलोचन और नीलकंठ आदि नौ प्रकार के एक करोड़ पार्थिव शिवलिंग प्रतिदिन बनाता और पूजन के बाद उन्हें नर्मदा में प्रवाहित कर देता.

तप से प्रसन्न महादेव और पार्वती ने दर्शन दिए. माता ने उसे इसी जन्म में पुत्र रूप में स्वीकार लिया. भगवान भोलेऩाथ ने उससे वरदान मांगने को कहा. तो बाणासुर ने उनसे मांगा कि उसकी हजार भुजाएं हो जाएं जिससे कोई उसे पराजित न कर सके.

महादेव उससे बहुत प्रसन्न थे. उन्होंने उससे कहा कि तुम एक और वरदान मांग लो. उसने मांगा कि शिवजी अपने परिवार समेत उसके राज्य में वास करें और उसकी पहरेदारी करें. महादेव वचनबद्ध थे.

स्वयं शिव द्वारा रक्षित बाणासुर परम शक्तिशाली होकर सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज करने लगा. उससे देवता तक भयभीत रहने लगे. बाणासुर अजेय हो चुका था. इसलिए कोई उससे युद्ध करने का साहस नहीं करता था.

अभिमान से बुद्धि नष्ट हो ही जाती है. वही बाणासुर के साथ हुआ. लंबे समय तक युद्ध से दूर रहे बाणासुर को एक दिन युद्ध करने की बड़ी तीव्र इच्छा हुई. उसने दिक्पालों को चुनौती दी किंतु सबने पहले ही पराजय मान ली.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
बाणासुर शिवजी के पास गया और बोला कि मुझे युद्ध करने की तीव्र इच्छा हो रही है किंतु कोई युद्ध करने का साहस नहीं कर पा रहा. आप मेरी इच्छा पूरी करें और मुझसे युद्ध करें.

महादेव समझ गए कि बाणासुर की मति मारी गई है और उसे उसका दंड मिलने का समय आ गया है. शिवजी ने उससे कहा कि वह उनका शिष्य है और पार्वती उसे पुत्र मानती हैं इसलिए वह उससे युद्ध नहीं करना चाहते.

शिवजी ने बाणासुर से कहा- तुम्हारी इच्छा जल्द पूरी होगी. तुम विचलित मत हो तुम्हें. पराजित करने वाले श्रीकृष्ण आ चुके हैं और तुम्हारा शीघ्र ही युद्ध होगा.

यह सुनकर बाणासुर भयभीत हो गया. उसने शिवजी की पुनः तपस्या आरंभ की और अपनी हजारों भुजाओं से कई सौ मृदंग बजाकर महादेव की स्तुति आरंभ की. शिवजी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
बाणासुर ने उनसे फिर एक वरदान मांगा- हे प्रभु जब कृष्ण से मेरा युद्ध होगा उस युद्ध में आप मेरे पक्ष से युद्ध करेंगे और मेरे प्राणों की रक्षा का दायित्व आपका रहेगा. युद्ध कब होगा मैं नहीं जानता इसलिए आप मेरे किले के पहरेदार बने रहें.

बाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया है. नारदजी ने यह खबर जाकर श्रीकृष्ण को दे दी. बलराम, प्रद्युम्न, सात्यिकी, गद, साम्ब आदि वीरों के साथ भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर पर चढ़ाई कर दी.

आक्रमण का सामना करने वाणासुर भी अपनी सेना लेकर आ गया. बलरामजी बाणासुर के प्रधानमंत्री और चित्रलेखा के पिता कुम्भाण्ड तथा कूपकर्ण राक्षसों से भिड़ गए. भगवान श्रीकृष्ण बाणासुर पर प्रहार करने लगे. घनघोर संग्राम होने लगा.

बलराम ने कुम्भाण्ड और कूपकर्ण को मार डाला. बाणासुर बुरी तरह घायल हो चुका था. श्रीकृष्ण उसके वध को तत्पर हुए तो उसे भगवान शंकर को रक्षा के लिए पुकारा. वचनबद्ध महादेव ने रुद्रगणों की सेना बाणासुर की सहायता के लिए भेज दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
शिवगणों की सेना ने श्रीकृष्ण पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया लेकिन श्रीकृष्ण और श्रीबलराम के सामने वह टिक नहीं पाए. शिवगणों को परस्त कर श्रीकृष्ण फिर बाणासुर पर टूट पड़े.

बाणासुर ने फिर से भोलेनाथ को प्राणरक्षा का वचन याद दिलाकर पुकारा. अंत में भक्त की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव रणभूमि में आए. रुद्र को देख श्रीकृष्ण ने उनकी स्तुति की और युद्ध भूमि से वापस चले जाने का अनुरोध किया.

भोलेनाथ ने श्रीकृष्ण से कहा कि वह उसकी रक्षा के लिए वचनबद्ध हैं इसलिए श्रीकृष्ण युद्ध से चले जाएं अन्यथा उन्हें उनका सामना करना पड़ेगा. श्रीकृष्ण ने भी बाणासुर की करतूत बताई और पीछे हटने को तैयार नहीं हुए.

विवश होकर भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठाया. त्रिशूल के तेज से ही श्रीकृष्ण की सारी सेना भाग निकली केवल श्रीकृष्ण ही उनके सामने टिके रहे. अब तो दोनों में भयंकर युद्ध होने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
जब श्रीकृष्ण ने समझा कि भगवन शंकर के रहते वह अनिरुद्ध को नहीं बचा पाएंगे तो उन्होंने भगवन शंकर की स्तुति की और स्मरम कराया- हे देवेश्वर, आपने स्वयं ही बाणासुर को कहा था की उसे मैं परस्त करूँगा. मैं तो आपका वरदान पूरा कर रहा हूं.

परंतु हे महादेव, जब तक आप युद्धभूमि में हैं मैं आपका वरदान पूरा नहीं कर पाउंगा. आपका वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता इसलिए हे प्रभु अब आप जो उचित समझें वही करें.

श्रीकृष्ण की बात सुनकर भगवन शिव प्रसन्न हो गए. उन्होंने कहा- हे प्रभु मैं वचनबद्ध हूं. युद्धक्षेत्र छोड़कर नहीं हट सकता किंतु मैं आपको ऐसा उपाय बताता हूं जिससे मैं युद्धभूमि में रहते हुए भी निष्क्रिय हो सकता हूं.

महादेव ने श्रीकृष्ण को ऐसा कौन सा उपाय बताया जिसके प्रयोग से श्रीकृष्ण ने उन्हें निष्क्रिय कर बाणासुर को हराया. क्या श्रीकृष्ण ने महादेव का वचन तोड़कर बाणासुर का वध किया? प्रसंग लंबा है. यह कथा कल आगे बढ़ाउंगा.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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