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शिवभक्त बाणासुर की पुत्री उषा, श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध के प्रेम का परिणाम, महादेव और श्रीकृष्ण में छिड़ गया भीषण संग्रामः भाग-1

शिवभक्त बाणासुर की पुत्री उषा, श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध के प्रेम का परिणाम, महादेव और श्रीकृष्ण में छिड़ गया भीषण संग्रामः भाग-1

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भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के रूप-गुण की बड़ी चर्चा थी. अनिरूद्ध में अपने दादा के बड़े गुण आए थे. प्रभु ने रुक्मिणी का हरणकर प्रेम विवाह किया था और रुक्मिणीजी के भाई रुक्मी के साथ युद्ध करना पड़ा था.

शिवजी का महान भक्त था राक्षसराज बाणासुर. बाणासुर ने शिवजी को घोर तप करके मोह लिया और जो चाहता वह वरदान ले लेता था. (बाणासुर के तप और महादेव को प्रसन्न करने की था अगली पोस्ट में सुनाउंगा. अभी अनिरूद्ध की कथा को आगे बढ़ाता हूं)

बाणासुर की कन्या उषा परम रूपवती थी. अनिरूद्द भी कामदेव समान सुंदर थे. उषा ने अनिरूद्ध के रूप-बल की चर्चा सुनी थी. उसने अनिरुद्ध को कभी देखा तो नहीं था लेकिन मन ही मन में उनकी एक छवि बना ली थी.

एक दिन उषा ने सपने में अनिरूद्ध को देखा. उसे अनिरूद्ध से गहरा प्रेम हो गया और उनसे विवाह की ठान ली. सुबह उसने सपने की बात अपनी सहेली चित्रलेखा को बताई. चित्रलेखा कई मायावी शक्तियों में निपुण थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उषा ने अनिरूद्ध का जैसा वर्णन किया बिलकुल वैसा चित्र चित्रलेखा ने तैयार किया. उषा ने चित्र को देखते ही स्वप्न में आए पुरूष को पहचान लिया और सखी से कहा कि अगर उसकी शादी इनसे न हुई तो वह अपने प्राण त्याग देगी.

इस विवाह में एक बड़ी समस्या यह थी कि उषा के पिता बाणासुर और श्रीकृष्ण में पुरानी शत्रुता थी. जाहिर था कि उषा अपनी बात पिता से कह भी नहीं सकती थी.

चित्रलेखा ने उषा से कहा- उषा अनिरूद्ध का विवाह छल-बल के प्रयोग से ही हो सकता है. उषा इसके लिए हिचक रही थीं. चित्रलेखा ने श्रीकृष्ण और रूक्मिणी के विवाह की कथा सुनाकर उन्हें छल-बल के प्रयोग के लिए मना लिया.

चित्रलेखा अपनी माया से द्वारका पहुंची. अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग करके उसने सोते हुए अनिरूद्ध को बिस्तर समेत उड़ा लिया और लाकर उषा के महल में रख दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
अनिरुद्ध की नींद खुली तो उन्होंने खुद को अंजान जगह में पाया. उषा ने उन्हें सारी बात कह सुनाई. अनिरुद्ध भी उषा के प्रेम और रूप-गुण पर मुग्ध हो गए.

उधर द्वारका में अनिरूद्ध की खोज शुरू हुई. श्रीकृष्ण द्वारका में नहीं थे इसलिए प्रद्युमन और अन्य लोगों ने अपने स्तर से खोजबीन की.

चित्रलेखा ने सोचा कि इससे पहले कि श्रीकृष्ण को अपने पोते के गायब होने की खबर मिले उन्हें गुप्त स्थान पर छुपा देना चाहिए. उसने माया से एक गुफा बनाई और उषा-अनिरूद्ध का गंधर्व विवाह कराकर वहां छुपा दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
चित्रलेखा ने चार महीने तक दोनों को छुपाकर रखा. बाणासुर के दूतों ने अनिरूद्ध को खोज निकाला. बाणासुर सेवकों के साथ अनिरूद्ध को पकड़ने आया. अनिरूद्ध ने मुद्रर से भयंकर युद्ध किया और बाणासुर के सैनिकों को मार गिराया.

अनिरूद्ध को हावी होता देख बाणासुर ने नागपाश फेंका और उसे बंदी बना लिया. श्रीकृष्ण और बलराम ने नारायणी सेना समेत आए बाणासुर पर चढ़ाई की. महादेव की कृपा से प्राप्त एक हजारों भुजाओं से बाणासुर ने घोर संग्राम आरंभ किया.

परंतु वह श्रीकृष्ण के सामने टिक नहीं पाया. हाकर निश्चित देखकर बाणासुर ने शिवजी को पुकारा. बाणासुर ने शिवजी से छलपूर्वक वचन ले लिया था कि वह एक संग्राम में उन्हें पुकारेगा तो वह पूरी सेना के साथ सहायता को आएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
शिवजी के सामने धर्मसंकट उत्पन्न हो गया. वह अपने वरदान से पीछे नहीं हट सकते थे लेकिन श्रीहरि से युद्ध भी नहीं करना चाहते थे.

इस युद्ध का क्या परिणाम हुआ. बाणासुर को शिवजी ने ऐसा वचन क्यों दिया था जिसके कारण वह धर्मसंकट में पड़ गए. कथा लंबी है. इसलिए इसे कई भाग में सुनाएंगे. शेषभाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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