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इंद्र के समकक्ष प्रजापालक राजा जनश्रुति से क्यों ज्यादा पुण्यात्मा थे बैलगाड़ी चलाने वाले रैक्वः उपनिषद की कथा

इंद्र के समकक्ष प्रजापालक राजा जनश्रुति से क्यों ज्यादा पुण्यात्मा थे बैलगाड़ी चलाने वाले रैक्वः उपनिषद की कथा

lord shiv
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राजा जनश्रुति बड़े उदार हृदय तथा दानी थे. प्रजाहित के जितने भी कार्य संभव हों या उन्होंने करा रखे थे. कहते हैं राजा ने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि बिना श्रम किए भी कोई अच्छा जीवन बिता सकता था.

प्रजाहित में किए जनश्रुति के कार्यों की सर्वत्र प्रशंसा होती थी. इससे राजा को यह अभिमान भी हो गया कि वह सर्वोत्कृष्ट राजा है. देवराज इंद्र से भी ज्यादा योग्य.

एक दिन कुछ हंस दूर से उड़ते हुए आए और रात व्यतीत करने के लिए राजा के महल की छत पर बैठ गए. हंस आपस में वार्तालाप करने लगे. जनश्रुति पक्षियों की भाषा समझता था. वह हंसों की बात सुनने लगा.

एक हंस व्यंग्य से बोला, जनश्रुति ने इतने पुण्य कार्य किए हैं कि उसका तेज़ चारों ओर बिजली के समान फैल गया है. कहीं उससे छू मत जाना नहीं तो तुम सब भस्म हो जाओगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दूसरे हंस ने उत्तर दिया- इसी राज्य में ब्रह्मज्ञानी रैक्व रहता है. उसके सामने राजा के सभी परोपकार के कार्य तुच्छ हैं. उसने परब्रह्म को जान लिया है. इस राज्य के राजा और प्रजा जो पुण्य कार्य करते हैं, उन सबका फल रैक्व को ही प्राप्त होता है.

पहला हंस बोला- ऐसा क्या ज्ञान है जो राजा भी नहीं जानता. वह तो समझता है कि उससे बढ़कर कोई दानी ज्ञानी है ही नहीं. दूसरे हंस ने उत्तर दिया- जिस तत्व को ज्ञानी रैक्व जानते हैं, यदि उसे कोई अन्य भी जान ले तो उसे भी उन्हीं की भांति दूसरों के पुण्य फल प्राप्त होंगे.

राजा ने हंसों की बात सुनी तो रैक्व के विषय में जानने के लिए व्यग्र हो उठा. प्रातः मन्त्रियों को रैक्व नाम के महात्मा ढूंढने का आदेश दिया. राजा के सिपाही खोजने निकले.

रैक्व बैलगाड़ी चलाकर आजीविका जुटाते थे. सिपाही जब पहुंचे तो रैक्व एकान्त में बैठे अपना शरीर खुजा रहे थे. राजा को पता चला तो सैकड़ों गायों, सुवर्ण तथा अन्य सामाग्रियों से भरा एक रथ को लेकर रैक्व के पास पहुंचा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उनको प्रणाम करके कहा- यह भेंट स्वीकार करें और मुझे अपने आराध्य देव के बारे में बताए. रैक्व ने तिरस्कारपूर्वक राजा से कहा- अरे मूर्ख मुझे इन सबका क्या काम! तू ही इन्हें अपने पास रख और यहां से भाग. मेरी शांति भंग मत कर.

राजा वापस चल दिया और रैक्व को प्रसन्न करने के तरीके सोचने लगा. उसे तो रैक्व का ब्रह्मज्ञान हर हाल में चाहिए था ताकि सबके पुण्य उसे प्राप्त हों. उसने अपनी सबसे प्रिय वस्तु रैक्व को के चरणों में अर्पित करके प्रसन्न करने की सोची.

राजा को सबसे अधिक स्नेह अपनी युवा पुत्री से था. इस बार राजा एक हज़ार गाएं, सामग्री से भरा रथ, सुवर्ण के आभूषण तथा अपनी कन्या को लेकर महाज्ञानी रैक्व के पास पहुंच गया.

उसने रैक्व को सभी वस्तुओं समेत अपनी कन्या देकर कहा कि आप इससे विवाह कर रिशृतेदार हों और मुझे ब्रह्मज्ञान प्रदान करें. महात्मा रैक्व समझ गए कि राजा की जिज्ञासा सत्ची है लेकिन सांसारिक वस्तुओं के प्रति राजा के प्रेम से वह दुखी थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रैक्व ने समझाया- क्या तुम इन सांसारिक वस्तुओं से ब्रह्मज्ञान ख़रीद सकते हो? अरे मूर्ख यह सब तुच्छ हैं. ईश्वरीय ज्ञान के समक्ष इनकी कोई महत्ता नहीं है. ये सब नाशवान हैं. इनका मोह त्यागो तभी ज्ञान प्राप्त कर सकते हो.

राजा की आंख खुल गई. वह चुपचाप हाथ-जोड़ कर अपने अभिमान को त्यागकर, महात्मा रैक्व के सामने पृथ्वी पर ही बैठ गया. रैक्व को भरोसा हो गया कि इसका अभिमान समाप्त हो गया है.

महात्मा रैक्व ने जनश्रुति को ज्ञान का उपदेश दिया. जिसे प्राप्त कर राजा का जीवन धन्य हो गया. जनश्रुति महान ज्ञानी महात्मा के नाम से प्रसिद्ध हुए.

(श्वेताश्वरोपनिषद की कथा)

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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