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श्री सत्यनारायण व्रत कथा और पूजा – संपूर्ण विधि, सामग्री, नियम और महात्म्य

श्री सत्यनारायण व्रत कथा और पूजा – संपूर्ण विधि, सामग्री, नियम और महात्म्य

श्री सत्यनारायण व्रत कथा और पूजा – संपूर्ण विधि, सामग्री, नियम और महात्म्य

परिचय – सत्यनारायण भगवान और यह व्रत

शास्त्रों में कहा गया है कि संसार में केवल नारायण ही सत्य हैं, बाकी सब माया और नाशवान है। उसी सत्य स्वरूप विष्णु भगवान की पूजा जब हम विशेष संकल्प के साथ करते हैं, तो उसे श्री सत्यनारायण व्रत कहा जाता है।

सत्यनारायण व्रत कथा की संपूर्ण विधि, संपूर्ण कथा
सत्यनारायण व्रत कथा की संपूर्ण विधि

मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा व विश्वास से सत्यनारायण व्रत–पूजन और कथा–श्रवण करता है, उसके घर में सुख–शांति, समृद्धि, संतान–सौभाग्य तथा कार्य–सिद्धि का आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत कठिन तपस्या नहीं, बल्कि सरल भक्ति, सत्य और संकल्प की साधना है।

धार्मिक और प्रेरक कथाओं, भक्ति–सामग्री और आरतियों के लिए आप प्रभु शरणम् से जुड़े रह सकते हैं।


सत्यनारायण व्रत के नियम

श्री सत्यनारायण व्रत कथा कब करें?

  • परंपरा से यह व्रत पूर्णिमा के दिन किया जाता है।

  • कई परिवार इसे:

    • संक्रांति,

    • एकादशी,

    • श्रावण मास,

    • अधिक मास,

    • गृह–प्रवेश, विवाह, संतान–प्राप्ति, परीक्षा/नौकरी की सफलता, नए व्यापार, विशेष मनोकामना पूर्ण होने पर भी करते हैं।

  • सुबह या सायं गोधूलि बेला में, स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर, शुभ मुहूर्त में पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है।

मुहूर्त देखने की सुविधा हो तो अच्छा है, न हो तो भी शुभ भाव से किसी भी सुविधाजनक समय में व्रत–पूजा की जा सकती है।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा कौन कर सकता है?

  • स्त्री–पुरुष, युवा–वृद्ध, विवाहित–अविवाहित – कोई भी श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजन कर सकता है।

  • पति–पत्नी मिलकर करें तो विशेष फलदायक माना जाता है।

  • शरीर से अशक्त या वृद्ध लोग भी संकल्प लेकर, बैठकर या मन ही मन पूजा–कथा में जुड़ सकते हैं।

मुख्य बात है – शुद्धता, श्रद्धा और सत्यनिष्ठा


श्री सत्यनारायण व्रत कथा की पूजा सामग्री– पूरी सूची

आप चाहें तो श्री सत्यनारायण व्रत कथा की पूजा सामग्री की यह सूची पर्याप्त है। फिर भी यदि आप किसी वेदपाठी ब्राह्मण से पूजा करा रहे हैं तो हो सकता है वे एकाध अन्य चीजें भी जोड़ें।

एक बात स्पष्ट कर दें कि श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजा में स्थान के हिसाब से परिपार्टी में बदलाव देखा जाता है। श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजा की मुख्य सामग्री सूची इस प्रकार है:

  • चौकी, उस पर बिछाने के लिए साफ पीला या लाल वस्त्र

  • भगवान विष्णु/सत्यनारायण की मूर्ति या सुंदर चित्र

  • तांबे/पीतल/मिट्टी का कलश

  • साफ जल, गंगाजल

  • आम के पत्ते (या उपलब्ध पवित्र पत्ते), नारियल

  • रोली, हल्दी, कुमकुम, चंदन, अक्षत (चावल)

  • फूल, माला, तुलसीदल (जहाँ मान्य हो)

  • धूपबत्ती, घी/तेल का दीपक, कपूर, घण्टी

  • पंचामृत – दूध, दही, घी, शहद, शक्कर

  • नैवेद्य – सामान्यतः गेहूँ–सूजी का हलवा/शिरा या आटे–गुड़ का प्रसाद

  • पंच फल – केला, सेब, अनार, नारंगी, कोई मौसमी मीठा फल

  • सुपारी, पान, इलायची, लौंग

  • मौली (रक्षासूत्र), अगरबत्ती

  • पूजा करने वाले के लिए आसन, पंडित/पाठ करने वाले के लिए आसन

  • थाली, कटोरी, चम्मच, चावल/अक्षत रखने के लिए डिब्बी

  • दक्षिणा (यथासामर्थ्य), वस्त्र/फल आदि यदि ब्राह्मण को देना चाहें

जितना संभव हो उतना रखें; कमी हो जाए तो भी भाव प्रधान है, दिखावा नहीं।


श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजा विधि – स्टेप-बाय-स्टेप संपूर्ण मार्गदर्शन

यह सत्यनारायण जी की पूजा विधि इतनी सरल रखी गई है कि कोई भी भक्त या पंडित इसे देखकर पूरी पूजा कर सकता है। पुराणों में सूत जी के माध्यम से श्री सत्यनारायण व्रत कथा और इसकी विधि तथा महात्म्य आदि बताए गए हैं।

1. प्रारंभिक तैयारी

  1. घर/पूजा–स्थान की स्वच्छता करें।

  2. चौकी पर पीला/लाल वस्त्र बिछाकर उस पर भगवान सत्यनारायण का चित्र/मूर्ति रखें।

  3. मूर्ति के पास जल से भरा कलश रखकर उसमें गंगाजल, चावल, सुपारी, सिक्का डालकर ऊपर आम के पत्ते और नारियल रख दें, कलश पर मौली बाँधें और स्वस्तिक बनाएं।

2. शुद्धिकरण और संकल्प

  1. स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें, आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।

  2. संक्षिप्त शुद्धिकरण (गंगाजल छिड़कना, आचमन करना) कर लें।

  3. दाहिने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें – अपना नाम, गोत्र (यदि ज्ञात हो), स्थान, तिथि, व्रत का कारण बोलकर: “मैं श्री सत्यनारायण भगवान की प्रसन्नता के लिए व्रत–पूजन एवं कथा–श्रवण का संकल्प करता/करती हूँ।”

  4. जल नीचे या पात्र में छोड़ दें।

3. गणेश, नवग्रह, कुलदेवता स्मरण

  1. संक्षेप में श्री गणेश, नवग्रह, कुलदेवता और गृह–देवता का स्मरण करें, मन ही मन या छोटे मंत्रों से पूजन करें (जैसे – “ॐ गं गणपतये नमः”, “ॐ सूर्याय नमः” आदि)।

4. श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन (सरल षोडशोपचार)

  1. भगवान के चरणों में जल अर्पित करें (पाद्य), हाथ धोने हेतु जल, आचमन, स्नान (यदि संभव हो तो थोड़ा पंचामृत और फिर जल) कराएँ – मन ही मन प्रार्थना करते हुए।

  2. भगवान को वस्त्र (यदि हो), चंदन, रोली–कुमकुम, अक्षत, फूल अर्पित करें।

  3. धूप, दीप जलाकर भगवान के सम्मुख रखें।

  4. नैवेद्य रूप में हलवा/शिरा, फल, मिठाई आदि प्रस्तुत करें, मन ही मन प्रार्थना करें – “हे भगवान, भक्तभाव से यह अल्प नैवेद्य स्वीकार करें।”

  5. अंत में आरती के लिए दीप तैयार रख दें।

5. श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ

  1. अब संकल्पित व्यक्ति/पंडित–जी या घर का कोई सदस्य बैठकर पूरी सत्यनारायण व्रत कथा शांत भाव से पढ़े/सुनाए (नीचे दी जा रही है)।

  2. प्रत्येक अध्याय के अंत में “श्री सत्यनारायण भगवान की जय!” बोलकर सभी मिलकर नमस्कार करें।

कथा के बाद आरती, प्रसाद वितरण, आशीर्वाद ग्रहण – यह क्रम अंत में आएगा।


श्री सत्यनारायण व्रत कथा – पाँचों अध्याय (सरल हिंदी में)

महत्वपूर्ण: यह कथा पारंपरिक कथानकों पर आधारित सरल भाषा में संपूर्ण वर्णन है, ताकि सामान्य भक्त भी आसानी से पढ़/समझ सके। यदि कोई पंडित शास्त्रीय पोथी से मूल पाठ करना चाहे, तो वह अपनी पोथी साथ रखें; फिर भी, यह टेक्स्ट अपने आप में पूरी कथा की निरंतरता और भाव रखता है।


श्री सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय – नारदजी को भगवान का उपदेश

सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्णः पहला अध्याय
सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्णः पहला अध्याय

एक समय की बात है। नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि अठ्ठासी हज़ार ऋषि मुनि एकत्र होकर सत्संग कर रहे थे। वे सब चिंतित थे कि कलियुग में मनुष्यों में न तो वैदिक ज्ञान रहेगा, न ही बड़ी तपस्या करने की शक्ति। ऐसे में साधारण गृहस्थ मनुष्य कैसे भगवान की भक्ति करके अपना कल्याण कर पाएँगे?

सभी मुनि सूतजी के चरणों में नतमस्तक हुए और बोले – “हे सूतजी! आप पुराणों के मर्मज्ञ हैं। कृपा करके ऐसी कोई सरल साधना बताइए जिससे कलियुग के पाप से ग्रस्त, वेदविद्या से रहित, अशक्त मनुष्य भी थोड़े प्रयास में पुण्य और भगवान की कृपा पा सके। हम ऐसी कथा सुनना चाहते हैं, जो सबका कल्याण कर सके।”

ऋषिगणों ने सूतजी महाराज से आग्रह किया- ‘हे मुनिश्रेष्ठ! व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को किस व्रत से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है? कृपया हमें विस्तार से बताएं।’

सूतजी बोले – “प्राचीन काल में भगवान विष्णु स्वयं नर–नारायण रूप में प्रकट हुए और नारदजी ने भी उनसे यही प्रश्न किया था। उन्हीं के उत्तर में यह सत्यनारायण व्रत प्रकट हुआ।”

सूतजी आगे बोले- ‘हे मुनियो! तब भगवान नारायण ने जो उत्तर दिया था, वही कथा मैं आपको सुनाता हूँ। ध्यान से सुनिए।

एक समय की बात है, योगीराज नारद जी दूसरों के हित की इच्छा लिए अनेकों लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुँचे। यहाँ उन्होंने अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेकों दुखों से पीड़ित देखा।

उनका दुःख देख नारद जी सोचने लगे कि कैसा यत्न किया जाए जिसके करने से निश्चित रुप से मानव के दुखों का अंत हो जाए। इसी विचार पर मनन करते हुए वह विष्णुलोक में गए। वहाँ वह देवों के ईश भगवान् नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे, गले में वरमाला पहने हुए थे।

स्तुति करते हुए नारद जी बोले – हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुःख को दूर करने वाले, आपको मेरा नमस्कार है।

नारद जी की स्तुति सुन विष्णु भगवान बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए पधारे हैं? उसे नि:संकोच कहो। इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुःख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़े प्रयास से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते हैं।

श्रीहरि बोले – हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूँ उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूँ। श्रीसत्यनारायण भगवान का यह व्रत अच्छी तरह विधानपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यहाँ सुख भोग कर, मरने पर मोक्ष पाता है।

श्रीहरि के वचन सुन नारद जी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएँ।

नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले – दुःख व शोक को दूर करने वाला यह व्रत सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला है। मानव को भक्ति व श्रद्धा के साथ शाम को श्रीसत्यनारायण की पूजा धर्म परायण होकर ब्राह्मणों व बंधुओं के साथ करनी चाहिए। भक्ति भाव से ही नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें। गेहूँ के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर तथा गुड़ लेकर व सभी भक्षण योग्य पदार्थो को मिलाकर भगवान का भोग लगाएँ।

ब्राह्मणों सहित बंधु-बाँधवों को भी भोजन कराएँ, उसके बाद स्वयं भोजन करें। भजन, कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं। इस तरह से सत्यनारायण भगवान का यह व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ निश्चित रुप से पूरी होती हैं। इस कलि काल अर्थात कलियुग में मृत्युलोक में मोक्ष का यही एक सरल उपाय बताया गया है।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का प्रथम अध्याय संपूर्ण॥


श्री सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय: निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारा की कथा

श्री सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्णः दूसरा अध्याय
श्री सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्णः दूसरा अध्याय

सूत जी बोले – हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूँ, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा – हे विप्र! नित्य दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूँ घूमते हो?

दीन ब्राह्मण बोला – मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूँ। हे भगवान ! यदि आप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए। वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं इसलिए तुम उनका पूजन करो। इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए। ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूँगा। यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नींद नहीं आई। वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया। उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। जिससे उसने बंधु-बाँधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया।

भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया। उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा। इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा।

सूत जी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा। हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूँ?

ऋषि बोले – हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है।

सूत जी बोले – हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वह सब सुनो!

एक समय वही विप्र धन व ऐश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बाँधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और लकड़ियाँ बाहर रखकर अंदर ब्राह्मण के घर में गया।

प्यास से दुखी वह लकड़हारा उनको व्रत करते देख विप्र को नमस्कार कर पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे हैं तथा इसे करने से क्या फल मिलेगा? कृपया मुझे भी बताएँ।

ब्राह्मण ने कहा कि सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी कृपा से ही मेरे घर में धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है।

विप्र से सत्यनारायण व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया। लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूँगा। मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियाँ रख उस नगर में बेचने गया जहाँ धनी लोग ज्यादा रहते थे। उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है।

बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूँ का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियाँ लेकर अपने घर गया। वहाँ उसने अपने बंधु-बाँधवों को बुलाकर विधि विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय संपूर्ण ॥


श्री सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्यायः राजा उल्कामुख, साधु वैश्य और उसकी पुत्री कलावती की कथा

Satyanarayan Vrat katha all 5 chapters, vidhi
सत्यनारायण व्रत कथा तीसरा अध्याय

सूतजी बोले: हे श्रेष्ठ मुनियों, अब आगे की कथा कहता हूँ। पहले समय में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता और निर्धनों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली तथा सती साध्वी थी।

भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनो ने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार करने के लिए बहुत सा धन भी था। राजा को व्रत करते देखकर वह विनय के साथ पूछने लगा: हे राजन ! भक्तिभाव से पूर्ण होकर आप यह क्या कर रहे हैं? मैं सुनने की इच्छा रखता हूँ तो आप मुझे बताएँ।

राजा बोला: हे साधु! अपने बंधु-बाँधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए एक महाशक्तिमान श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूँ।

राजा के वचन सुन साधु आदर से बोला: हे राजन ! मुझे इस व्रत का सारा विधान कहिए। आपके कथनानुसार मैं भी इस व्रत को करुँगा। मेरी भी संतान नहीं है और इस व्रत को करने से निश्चित रुप से मुझे संतान की प्राप्ति होगी। राजा से व्रत का सारा विधान सुन, व्यापार से निवृत हो वह अपने घर गया।

साधु वैश्य ने अपनी पत्नी को संतान देने वाले इस व्रत का वर्णन कह सुनाया और कहा कि जब मेरी संतान होगी तब मैं इस व्रत को करुँगा। साधु ने इस तरह के वचन अपनी पत्नी लीलावती से कहे। एक दिन लीलावती पति के साथ आनन्दित हो सांसारिक धर्म में प्रवृत होकर सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई।

दसवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। दिनोंदिन वह ऐसे बढ़ने लगी जैसे कि शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है। माता-पिता ने अपनी कन्या का नाम कलावती रखा।

एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने सत्यनारायण भगवान के जिस व्रत को करने का संकल्प किया था उसे करने का समय आ गया है, आप इस व्रत को करिये।

साधु बोला कि हे प्रिये! इस व्रत को मैं उसके विवाह पर करुँगा। इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह नगर को चला गया। कलावती पिता के घर में रह दिनों दिन बड़ी होने लगी। साधु ने एक बार नगर में अपनी कन्या को सखियों के साथ देखा तो तुरंत ही दूत को बुलाया और कहा कि मेरी कन्या के योग्य वर देख कर आओ।

साधु की बात सुनकर दूत कंचन नगर में पहुंचा और वहाँ देखभाल कर लड़की के सुयोग्य वाणिक पुत्र को ले आया। सुयोग्य लड़के को देख साधु ने बंधु-बाँधवों को बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया लेकिन दुर्भाग्य की बात ये कि साधु ने अभी भी श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया।

इस पर श्री भगवान क्रोधित हो गए और श्राप दिया कि साधु को अत्यधिक दुःख मिले। अपने कार्य में कुशल साधु बनिया जमाई को लेकर समुद्र के पास स्थित होकर रत्नासारपुर नगर में गया। वहाँ जाकर दामाद-ससुर दोनों मिलकर चन्द्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे।

एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भाग रहा था। उसने राजा के सिपाहियों को अपना पीछा करते देख चुराया हुआ धन वहाँ रख दिया जहाँ साधु अपने जमाई के साथ ठहरा हुआ था।

राजा के सिपाहियों ने साधु वैश्य के पास राजा का धन पड़ा देखा तो वह ससुर-जमाई दोनों को बाँधकर प्रसन्नता से राजा के पास ले गए और कहा कि उन दोनों चोरों को हम पकड़ लाये हैं, आप आगे की कार्यवाही की आज्ञा दें।

राजा की आज्ञा से उन दोनों को कठिन कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन भी उनसे छीन लिया गया। श्रीसत्यनारायण भगवान के श्राप से साधु की पत्नी भी बहुत दुःखी हुई। घर में जो धन रखा था उसे चोर चुरा ले गए। शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा व भूख प्यास से अति दुःखी हो अन्न की चिन्ता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई।

वहाँ उसने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा फिर कथा भी सुनी वह प्रसाद ग्रहण कर रात को घर वापिस आई। माता ने कलावती से पूछा कि हे पुत्री! अब तक तुम कहाँ थी़? तेरे मन में क्या है?

कलावती ने अपनी माता से कहा: हे माता ! मैंने एक ब्राह्मण के घर में श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है। हमें भी विधि-विधान से श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ कराना चाहिए।

कन्या के वचन सुन लीलावती भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी। लीलावती ने परिवार व बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और उनसे वर माँगा कि मेरे पति तथा जमाई शीघ्र घर आ जाएँ। साथ ही यह भी प्रार्थना की कि हम सब का अपराध क्षमा करें।

श्रीसत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए और राजा चन्द्रकेतु को सपने में दर्शन देकर कहा: हे राजन! तुम उन दोनो वैश्यों को छोड़ दो और तुमने उनका जो धन लिया है उसे वापिस कर दो। अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारा धन, राज्य व संतान सभी को नष्ट कर दूँगा। राजा को यह सब कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

प्रात:काल सभा में राजा ने अपना सपना सुनाया फिर बोले कि बणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाओ।दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया।

राजा मीठी वाणी में बोला: हे महानुभावों! भाग्यवश ऐसा कठिन दुःख तुम्हें प्राप्त हुआ है लेकिन अब तुम्हें कोई भय नहीं है। ऐसा कह राजा ने उन दोनों को नए वस्त्राभूषण भी पहनाए और जितना धन उनका लिया था उससे दुगुना धन वापिस कर दिया। दोनो वैश्य अपने घर को चल दिए।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तृतीय अध्याय संपूर्ण॥


श्री सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय: साधु वैश्य की परीक्षा और नाव का डूबना

सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्ण, विधि, महात्म्य, फल सबकुछ एक स्थान पर
सत्यनारायण व्रत कथाः चौथा अध्याय

सूतजी बोले: वैश्य ने मंगलाचार कर अपनी यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल दिए। उनके थोड़ी दूर जाने पर एक दण्डी वेशधारी श्रीसत्यनारायण ने उनसे पूछा: हे साधु तेरी नाव में क्या है?

अभिमानी वणिक हंसता हुआ बोला: हे दण्डी! आप क्यों पूछते हो? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल व पत्ते भरे हुए हैं।

वैश्य के कठोर वचन सुन भगवान बोले: तुम्हारा वचन सत्य हो! दण्डी ऐसे वचन कह वहाँ से दूर चले गए। कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए। दण्डी के जाने के बाद साधु वैश्य ने नित्य क्रिया के पश्चात नाव को ऊँची उठते देखकर अचंभा माना और नाव में बेल-पत्ते आदि देख वह मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा।

मूर्छा खुलने पर वह अत्यंत शोक में डूब गया तब उसका दामाद बोला कि आप शोक ना मनाएँ, यह दण्डी का शाप है इसलिए हमें उनकी शरण में जाना चाहिए तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी।

दामाद की बात सुनकर वह दण्डी के पास पहुँचा और अत्यंत भक्तिभाव से नमस्कार करके बोला: मैंने आपसे जो जो असत्य वचन कहे थे उनके लिए मुझे क्षमा दें, ऐसा कहकर महान शोकातुर हो रोने लगा।

तब दण्डी भगवान बोले: हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से बार-बार तुम्हें दुःख प्राप्त हुआ है। तू मेरी पूजा से विमुख हुआ।

साधु बोला: हे भगवान! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जानते, तब मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए, अब मैं सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा करो और पहले के समान नौका में धन भर दें।

साधु वैश्य के भक्तिपूर्वक वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। ससुर-जमाई जब नाव पर आए तो नाव धन से भरी हुई थी फिर वहीं अपने अन्य साथियों के साथ भगवान का पूजन और सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ कर अपने नगर को चल दिए।

जब नगर के नजदीक पहुँचे तो दूत को घर पर खबर करने के लिए भेज दिया। दूत साधु की पत्नी को प्रणाम कर कहता है कि मालिक अपने दामाद सहित नगर के निकट आ गए हैं।

दूत की बात सुन साधु की पत्नी लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपनी पुत्री कलावती से कहा कि मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आजा।

माता के ऐसे वचन सुन कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़ अपने पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा के कारण श्रीसत्यनारायण भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित उसके पति को पानी में डुबो दिया।

कलावती अपने पति को वहाँ न पाकर रोती हुई जमीन पर गिर गई। नौका को डूबा हुआ देख व कन्या को रोता देख साधु दुःखी होकर बोला कि हे प्रभु! मुझसे तथा मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करें।

साधु के दीन वचन सुनकर श्रीसत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और आकाशवाणी हुई: हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटती है तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा।

ऐसी आकाशवाणी सुन कलावती घर पहुंचकर प्रसाद ग्रहण करती है और फिर आकर अपने पति के दर्शन करती है। उसके बाद साधु अपने बंधु-बाँधवों सहित श्रीसत्यनारायण भगवान का विधि-विधान से पूजन करता है। तथा इस लोक मे सुख भोग, वह अंत में स्वर्ग को जाता है।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय संपूर्ण॥


श्री सत्यनारायण व्रत कथा पंचम अध्याय: राजा तुंगध्वज की कथा

सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्ण विधि
सत्यनारायण व्रत कथा महात्म्य और फल

सूतजी बोले: हे ऋषियों ! मैं और भी एक कथा सुनाता हूँ, उसे भी ध्यानपूर्वक सुनो!

प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भी भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत ही दुख सान किया। एक बार वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा।

अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में नहीं गया और ना ही उसने भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और प्रसाद को वहीं छोड़ वह अपने नगर को चला गया।

जब वह नगर में पहुंचा तो वहाँ सबकुछ तहस-नहस हुआ पाया तो वह शीघ्र ही समझ गया कि यह सब भगवान ने ही किया है। वह दुबारा ग्वालों के पास पहुंचा और विधि पूर्वक पूजा कर के प्रसाद खाया तो श्रीसत्यनारायण भगवान की कृपा से सब कुछ पहले जैसा हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगने के बाद मरणोपरांत उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।

जो मनुष्य परम दुर्लभ इस व्रत को करेगा तो भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी हो जाता है और भयमुक्त हो जीवन जीता है। संतान हीन मनुष्य को संतान सुख मिलता है और सारे मनोरथ पूर्ण होने पर मानव अंतकाल में बैकुंठधाम को जाता है।

सूतजी बोले: जिन्होंने पहले इस व्रत को किया है अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूँ। वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष की प्राप्ति की। लकड़हारे ने अगले जन्म में निषाद बनकर मोक्ष प्राप्त किया।

उल्कामुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को गए। साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष पाया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भगवान में भक्तियुक्त हो कर्म कर मोक्ष पाया।

॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय संपूर्ण॥

सत्यनारायण जी की आरती


श्री सत्यनारायण व्रत कथा का महात्म्य

सूतजी बोले – “हे मुनियो! इस प्रकार सत्यनारायण भगवान अपने भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं और अंत में कृपालु होकर उन्हें संभाल भी लेते हैं। गरीब ब्राह्मण, साधु बनिया, उसकी पत्नी–पुत्री, राजा–प्रजा – सबने जब सच्चे मन से व्रत किया, कथा सुनी और प्रसाद बाँटा, तब उनके जीवन में सुख–समृद्धि आई, दुःख दूर हुए और उनके मन में भक्ति स्थिर हुई।

जो भक्त श्री सत्यनारायण व्रत कथा को नियमित रूप से, या अपने सामर्थ्य के अनुसार समय–समय पर करता है, उसके घर में:

  • दरिद्रता दूर होती है,

  • परिवारिक कलह कम होता है,

  • कार्यों में बाधाएँ घटती हैं,

  • और सबसे बढ़कर, मन को शांति और स्थिरता मिलती है।

यह व्रत केवल धन–दौलत के लिए नहीं, बल्कि सत्य, संकल्प, कृतज्ञता और भक्तिभाव की साधना है।

जो व्यक्ति श्रद्धा से सत्यनारायण व्रत कथा सुनता और सुनाता है, भगवान उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। जो अपनी भूलों पर पछताकर पुनः सही मार्ग पर लौटने का संकल्प करता है, उसे भगवान कभी नहीं त्यागते।

इस प्रकार सूतजी ने नैमिषारण्य के मुनियों को सत्यनारायण व्रत की महिमा, विधि और कथा सुनाई। सभी मुनि प्रसन्न हुए और बोले – ‘धन्य हैं सत्यनारायण भगवान, जो कलियुग में भी इतनी सरल साधना से हम सबका कल्याण करते हैं।’”


सत्यनारायण व्रत कथा के लाभ और महात्म्य – आज के जीवन के लिए संदेश

  • यह व्रत हमें याद दिलाता है कि वचन का पालन और सत्यनिष्ठा कितना बड़ा धर्म है।

  • कठिन समय में भी ईश्वर पर भरोसा रखना, और सुविधा के समय में भी उन्हें न भूलना – यही इस व्रत का मूल संदेश है।

  • परिवार सहित बैठकर कथा सुनने से घर का वातावरण बदलता है, बच्चों के मन में भी धर्म और भक्ति की नींव पड़ती है।

  • यह व्रत सिर्फ “डर के कारण” नहीं, बल्कि “कृतज्ञता के कारण” भी किया जा सकता है – कोई कार्य सफल हो जाए, कोई संकट टल जाए, तो धन्यवाद के रूप में सत्यनारायण व्रत करना बहुत सुंदर भाव है।


सत्यनारायण व्रत कथा और पूजा के बाद क्या करें?

  • कथा पूर्ण होने के बाद भगवान की आरती करें। “श्री सत्यनारायण भगवान की आरती का लिंक यहीं नीचे हैः

    सत्यनारायण जी की आरती

  • प्रसाद भाव से ग्रहण करें और परिवार, मित्र, पड़ोसियों में बाँटें।

  • ब्राह्मण/पंडित को यथासामर्थ्य दक्षिणा, वस्त्र, भोजन आदि दें।

  • यदि मन में लगे कि कोई वचन भूल गए हों या भूल हुई हो, तो वहीं सच्चे मन से क्षमा माँग लें – भगवान करुणामय हैं।


निष्कर्ष – प्रभु शरणम् की ओर से एक छोटी सी प्रार्थना

श्री सत्यनारायण व्रत कथा सुनने, आरती-पूजन, प्रसाद आदि ग्रहण करने के बाद भविष्य पुराण में वर्णित इस व्रत का महात्म्य भी पढ़ना चाहिए। यह महात्म्य कथा पूजा विधि का हिस्सा नहीं है लेकिन भगवान का महात्म्य सुनना तो पुण्यकारी है ही। घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों को यह महात्म्य कथा आप सस्वर पाठ करते हुए सुना सकते हैं।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा महात्म्यः राजा चंद्रचूड की कहानी

यदि श्री सत्यनारायण व्रत कथा की यह संपूर्ण पोस्ट आपको उपयोगी लगे और लगे कि इससे एक भी घर में सत्यनारायण व्रत सही विधि से हो जाए, तो इसे आगे दूसरों के साथ भी साझा कीजिए।

प्रभु शरणम् का उद्देश्य यही है कि जो भक्त यहाँ आए, उसे ईश्वर–भक्ति, पूजा–विधि और कथा–भावार्थ – सब एक ही स्थान पर मिल जाए।


(संकलन व संपादन: राजन प्रकाश)

( डिस्कलेमरः यह पोस्ट पुराणों में वर्णित कथाओं के आधार पर तैयार की गई है। इस पोस्ट का उद्देश्य सिर्फ एक जानकारी देना है। इसका उद्देश्य कोई गलत जानकारी देना या अंधविश्वास फैलाना नहीं हैं। पोस्ट में बताएं किसी भी परामर्श पर अमल करने से पहले विषय के विशेषज्ञ से परामर्श लें।)

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