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श्री बटुक भैरव स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

श्री बटुक भैरव स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

।श्री बटुक भैरव स्तोत्र।
Batuk Bhairav Stotra

भगवान शिव के उग्र और कल्याणकारी स्वरूप बटुक भैरव की कृपा पाने के लिए बटुक भैरव स्तोत्र बेहद चमत्कारी और पवित्र पाठ माना जाता है। सनातन धर्म में बटुक भैरव को सुरक्षा, शत्रुओं के नाश और जीवन की हर प्रकार की बाधाओं व भय को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है।

बटुक भैरव कौन हैं

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बटुक भैरव को एक तेजोमय युवा बालक के रूप में चित्रित किया गया है—जिनका सांवला वर्ण, शरीर पर बाघ की खाल और गले में नागों का आभूषण उनकी अलौकिक शक्ति का प्रतीक है। वे स्वभाव से जितने चंचल और कृपालु हैं, उनकी शक्ति उतनी ही अपार और तीव्र है। जो भक्त साहस, आत्मविश्वास और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा चाहते हैं, वे इनकी शरण में आते हैं।

श्री बटुक भैरव स्तोत्रः हिंदी अर्थ सहित
श्री बटुक भैरव स्तोत्रः हिंदी अर्थ सहित

बटुक भैरव स्तोत्र पाठ के विशेष लाभ:

यदि जीवन में अड़चनें बढ़ गई हों, शत्रुओं का भय हो या किसी कार्य में बार-बार रुकावट आ रही हो, तो बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ अत्यंत फलदायी होता है। विशेषकर अष्टमी तिथि या शनिवार के दिन इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भैरव बाबा अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं और साधक के सभी कार्य सफल व सार्थक होने लगते हैं।

बटुक भैरव स्तोत्रः

ध्यानः

वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।
दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः॥

दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।
हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्॥

मूल-स्तोत्र

ॐ भैरवो भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट् ॥1॥

श्मशान-वासी मांसाशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।
रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः ॥2॥

कंकालः कालः-शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।
त्रि-नेत्रो बहु-नेत्रश्च, तथा पिंगल-लोचनः ॥3॥

शूल-पाणिः खड्ग-पाणिः, कंकाली धूम्र-लोचनः।
अभीरुर्भैरवी-नाथो, भूतपो योगिनी-पतिः ॥4॥

धनदोऽधन-हारी च, धन-वान् प्रतिभागवान्।
नागहारो नागकेशो, व्योमकेशः कपाल-भृत् ॥5॥

कालः कपालमाली च, कमनीयः कलानिधिः।
त्रि-नेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रि-शिखी च त्रि-लोक-भृत् ॥6॥

त्रिवृत्त-तनयो डिम्भः शान्तः शान्त-जन-प्रिय।
बटुको बटु-वेषश्च, खट्वांग-वर-धारकः ॥7॥

भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः।
धूर्तो दिगम्बरः शौरिर्हरिणः पाण्डु-लोचनः ॥8॥

प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शंकर-प्रिय-बान्धवः।
अष्ट-मूर्तिर्निधीशश्च, ज्ञान-चक्षुस्तपो-मयः ॥9॥

अष्टाधारः षडाधारः, सर्प-युक्तः शिखी-सखः।
भूधरो भूधराधीशो, भूपतिर्भूधरात्मजः ॥10॥

कपाल-धारी मुण्डी च, नाग-यज्ञोपवीत-वान्।
जृम्भणो मोहनः स्तम्भी, मारणः क्षोभणस्तथा ॥11॥

शुद्द-नीलाञ्जन-प्रख्य-देहः मुण्ड-विभूषणः।
बलि-भुग्बलि-भुङ्-नाथो, बालोबाल-पराक्रम ॥12॥

सर्वापत्-तारणो दुर्गो, दुष्ट-भूत-निषेवितः।
कामीकला-निधिःकान्तः, कामिनी-वश-कृद्वशी ॥13॥

जगद्-रक्षा-करोऽनन्तो, माया-मन्त्रौषधी-मयः।
सर्व-सिद्धि-प्रदो वैद्यः, प्रभ-विष्णुरितीव हि ॥14॥

 

श्री बटुक भैरव स्तोत्र हिंदी में

श्री बटुक भैरव स्तोत्र का हिंदी अर्थ भी भक्तों की सुविधा के लिए यहां दिया जा रहा है। संस्कृत में पाठ करने में असमर्थ हैं तो हिंदी में कर सकते हैं। पाठ के बाद क्षमा प्रार्थना अवश्य कर लें।
श्री बटुक भैरव स्तोत्र का हिंदी अर्थ सहित प्रभु शरणं ऐप के शिव शरणं मंत्र सेक्शन में भी दिया गया है। नियमित पाठ करना हो तो ऐप डाउनलोड कर लें। वहां से पाठ में सुविधा रहेगी।

प्रभु शरणं ऐप में विभिन्न देवी-देवताओं के करीब 200 मंत्र हैं और इनमें लगातार नए मंत्र जोड़े जा रहे हैं। इसके अलावा भी बहुत कुछ है। इस पोस्ट के अंत में प्रभु शरणं अभियान की जानकारी दी गई है।

श्री बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ शरू करने से पहले बटुक भैरव जी का ध्यान करेंः

ध्यानः

जो बालक के समान रूप वाले, स्फटिक मणि के समान निर्मल, जिनके बाल मुखमंडल पर सुशोभित हैं, जो विभिन्न प्रकार के नवीन मणियुक्त आभूषणों और पैरों में किंकिणी व नूपुर से सुसज्जित हैं। जिनका स्वरूप अत्यंत दीप्त, निर्मल मुख वाला, अत्यंत प्रसन्न और तीन नेत्रों वाला है। जो अपने दोनों हाथों में शूल और दण्ड धारण किए हुए हैं, ऐसे भगवान बटुक भैरव का मैं निरंतर ध्यान करता हूँ।

नीचे बटुक भैरव स्तोत्र के सभी 15 श्लोकों का हिंदी अनुवादः

  1. जो समस्त भूतों के नाथ (स्वामी), भूतात्मा, भूत-भावन (भूतो को उत्पन्न करने वाले), क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपाल, क्षेत्रदाता, क्षत्रिय और विराट स्वरूप हैं।

  2. जो श्मशान में निवास करने वाले, मांस का भक्षण करने वाले, खप्पर धारण करने वाले, मदन (कामदेव) का नाश करने वाले, रक्त और मदिरा का पान करने वाले, सिद्ध, सिद्धिदाता और सिद्धों द्वारा सेवित हैं।

  3. जो कंकाल रूप, काल के समान, सबके शमनकर्ता, कला और काष्ठा (समय के सूक्ष्म माप) रूप शरीर वाले, ज्ञानी, त्रिनेत्रधारी, बहुनेत्रधारी और पिंगल (भूरे/पीले) नेत्रों वाले हैं।

  4. जिनके हाथों में शूल और खड्ग है, जो कंकाली, धूम्रलोचन (धुएँ के रंग जैसे नेत्र वाले), अभय प्रदान करने वाले, भैरवी के नाथ, भूतों के स्वामी और योगिनियों के पति हैं।

  5. जो धन देने वाले और धन का हरण करने वाले, धनवान, प्रतिभाशाली, नागों को हार और केश के रूप में धारण करने वाले, आकाश जैसे बालों वाले और कपाल धारण करने वाले हैं।

  6. जो काल, कपालमाला धारण करने वाले, कमनीय (सुंदर), कलानिधि, त्रिनेत्र, प्रज्वलित नेत्रों वाले, त्रिशूल धारण करने वाले और तीनों लोकों का भरण-पोषण करने वाले हैं।

  7. जो त्रिवृत्त शरीर वाले, बालक रूप (डिम्भ), शांत, शांत स्वभाव के प्रिय, बटुक, बटुक (बालक) का वेश धारण करने वाले और खट्वांग (एक प्रकार का अस्त्र) श्रेष्ठ रूप में धारण करने वाले हैं।

  8. जो भूतों के अध्यक्ष, पशुपति, भिक्षुक, परिचारक, धूर्त, दिगंबर (वस्त्रहीन), शौरि (वीर), हरिण (हिरण जैसे चंचल) और पांडुर लोचन (सफेद या हल्के रंग के नेत्रों वाले) हैं।

  9. जो अत्यंत शांत, शांति प्रदान करने वाले, शुद्ध, भगवान शंकर के प्रिय बान्धव (मित्र), आठ मूर्तियों वाले, निधीश (निधियों के स्वामी), ज्ञान चक्षु और तपामय हैं।

  10. जो अष्टाधार, षडाधार, सर्पों से युक्त, शिखी (मयूर) के सखा, भूधर (पर्वत/पृथ्वी को धारण करने वाले), भूधराधीश, भूपति और भूधरात्मज हैं।

  11. जो कपालधारी, मुंड (मुंडित सिर वाले), नाग का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, जृम्भण (स्तब्ध करने वाले), मोहन, स्तंभन करने वाले, मारण और क्षोभण करने वाले हैं।

  12. जो शुद्ध नीलांजन (काजल) के समान प्रख्यात शरीर वाले, मुंडों से विभूषित, बलि (पूजा/भोग) ग्रहण करने वाले, बलिभोगियों के नाथ, बालक और बाल-पराक्रम वाले हैं।

  13. जो समस्त आपदाओं का निवारण करने वाले, दुर्ग (कठिन समय में रक्षक), दुष्ट भूतों द्वारा सेवित, कामकला के निधि, कान्त, और कामिनियों को वश में करने वाले वशी हैं।

  14. जो जगत की रक्षा करने वाले, अनंत, माया, मंत्र और औषधि रूप, समस्त सिद्धियों के प्रदाता, वैद्य और सर्वव्यापी हैं।

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