June 6, 2026

नवग्रह स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

नवग्रह स्तोत्र

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित नवग्रह स्तोत्र ग्रहों के अशुभ प्रभावों को शांत करने तथा जीवन में सुख, समृद्धि, आरोग्य और मानसिक शांति प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र माना जाता है।

  • इसके पाठ से दुःस्वप्नों और मानसिक अशांति का नाश होता है।
  • आरोग्य, यश, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • ज्योतिषीय कष्टों और बाधाओं में राहत मिलती है।

१. सूर्य

श्लोक:
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥

अर्थ:
जपाकुसुम या गुड़हल के फूल के समान लाल कांति वाले, महर्षि कश्यप के पुत्र, महान तेजस्वी, अंधकार के शत्रु तथा समस्त पापों का नाश करने वाले दिवाकर सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।


२. चन्द्रमा

श्लोक:
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् ॥

अर्थ:
दही, शंख और हिम के समान श्वेत आभा वाले, क्षीरसागर से उत्पन्न, भगवान शिव के मुकुट के आभूषण बने सोमदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।


३. मंगल

श्लोक:
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ॥

अर्थ:
धरणी यानी पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बिजली के समान तेजस्वी, शक्ति संपन्न कुमारस्वरूप श्री मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।


४. बुध

श्लोक:
प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥

अर्थ:
जिनका रंग प्रियंगु की कली के समान श्यामल है, जिनका रूप अद्वितीय है, जो स्वभाव से अत्यंत शांत और उत्तम गुणों से परिपूर्ण हैं, उन बुध देव को मैं प्रणाम करता हूँ।


५. बृहस्पति

श्लोक:
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥

अर्थ:
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी कांति सोने के समान चमकदार है, जो साक्षात् बुद्धि के स्वरूप तथा तीनों लोकों में पूज्य हैं, ऐसे बृहस्पति देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

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६. शुक्र

श्लोक:
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥

अर्थ:
हिम, कुंद के फूल और कमल की डंडी के समान उज्ज्वल आभा वाले, दैत्यों के गुरु तथा समस्त शास्त्रों के अद्वितीय ज्ञाता भार्गव श्री शुक्राचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ।


७. शनि

श्लोक:
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥

अर्थ:
नीले अंजन के समान आभा वाले, सूर्यदेव के पुत्र, यमराज के अग्रज तथा छाया और सूर्य से उत्पन्न शनिदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।


८. राहु

श्लोक:
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥

अर्थ:
आधे शरीर वाले, अत्यंत पराक्रमी, सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगाने वाले तथा सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।


९. केतु

श्लोक:
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥

अर्थ:
पलाश के पुष्प के समान लाल आभा वाले, नक्षत्रों और ग्रहों में प्रमुख, उग्र एवं प्रभावशाली स्वरूप वाले केतु देव को मैं प्रणाम करता हूँ।


फलश्रुति

श्लोक:
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥

अर्थ:
महर्षि वेदव्यास के मुख से निकले हुए इस स्तोत्र का जो व्यक्ति दिन या रात्रि में एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, उसके जीवन की समस्त विघ्न-बाधाएँ शांत हो जाती हैं।

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