June 6, 2026

श्री लिंगाष्टकम्

॥ श्री लिंगाष्टकम् ॥

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिङ्गं निर्मलभासित शोभित लिङ्गम् ।
जन्मज दुःख विनाशक लिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥१॥

जिनकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवता करते हैं, जो निर्मल और कांति से सुशोभित हैं, जो जन्म-मरण (संसार) के दुखों का विनाश करने वाले हैं, उन सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।

देवमुनिप्रवरार्चितलिंगं कामदहं करुणाकरलिंगम् ।
रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥२॥

सर्वसुगंधिसुलेपितलिंगं बुद्धिविवर्धनकारणलिंगम् ।
सिद्धसुरासुरवंदितलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥३॥

कनकमहामणिभूषितलिंगं फणिपतिवेष्टितशोभितलिंगम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥४॥

कुंकुमचंदनलेपितलिंगं पंकजहारसुशोभितलिंगम् ।
संचितपापविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥५॥

देवगणार्चितसेवितलिंगं भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥६॥

अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं सर्वसमुद्भवकारणलिंगम् ।
अष्टदरिद्रविनाशनलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥७॥

सुरगुरुसुरवरपूजितलिंगं सुरवनपुष्पसदार्चितलिंगम् ।
परात्परं परमात्मकलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥८॥

॥ फलश्रुति ॥

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥९॥

॥ इति श्रीलिंगाष्टकस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

See also  शिवाष्टकम्
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