समुद्र में क्यों नहीं आती कभी बाढ? समुद्री आग की पौराणिक कथा

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सारी नदियां समुद्र में मिलती हैं फिर भी समुद्र का तल एक सा बना रहता है. इसके पीछे कारण हैं बड़वानल यानी समुद्र के जल में लगी आग. घोडे के मुख और अग्नि के मिले-जुले रूप वाले ऋषि और्व.
कार्तवीर्य के पिता कृतवीर्य बहुत उदार राजा थे. वे हमेशा अपनी प्रजा और दूसरों का ख्याल रखते. भृगुवंशियों यानी भार्गव ब्राह्मणों की विशेष सेवा करते, भरपूर धन देते क्योंकि ये इनके पुरोहित हुआ करते थे.
कृतवीर्य ने इतना दान किया कि जब वे मरे तो उनके बेटों के लिए खजाना खाली था. अब राज-काज कैसे चलता! वैसे भी बेटे कृतवीर्य की तरह दानी और दयालु न थे. उन्होंने भार्गवों से कहा कि वे उनकी धन देकर मदद करें.
दान भी कोई वापस देता है. भार्गवों ने टका सा जवाब दे दिया. यही नहीं उन्होंने उनका मजाक भी बनाया. हारकर कृतवीर्य के वंशजों ने हथियार उठा लिया और संपन्न भार्गवों को लूटने लगे. इस लूट से आपसी शत्रुता बढी, भयानक हिंसा फैली.
निहत्थे भार्गव ब्राह्मण हर ओर बुरी तरह काटे जाने लगे. भार्गवों के आश्रम जंगलों में थे. एक भार्गव स्त्री लुटेरे हत्यारों से बचकर आश्रम से निकल जंगल में भाग आयी. यह ऋषि च्यवन जिन्हें ऊर्व भी कहते थे उनकी पत्नी आरुषी थीं. आरुषी गर्भवती थीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कहते हैं कि आरुषी इतनी तेजस्विनी थीं कि उनकी रक्षा के लिए स्वयं देवराज इंद्र उनके पीछे-पीछे चल रहे थे. आने वाले खतरे से डरी हुई आरूषी बेतहाशा भाग रही थी कि एक पेड़ की डाल से उनके पेट पर गहरी चोट लग गयी.
चोट लगने से आरुषी बेहोश हो गयीं. उन्होंने समय पूर्व ही एक बालक को जन्म दे दिया. विपत्ति में देवयोग से पास में स्थित एक आश्रम में उन्हें शरण मिल गयी और वहां उनकी सेवा टहल हो सकी.
आरुषि ने अपने बेटे का नाम और्व रखा. थोड़ा बड़ा होने पर उसने अपनी माता से उनकी इस दुर्गति का कारण पूछा तो आरुषि ने सब बता दिया. तभी से और्व रुषि के मन मेँ क्षत्रियोँ, क्षत्रपों के लिये कट्टर वैरभाव का जन्म हुआ.
किशोरावस्था पार करते-करते और्व ने अपने समुदाय के ऊपर अत्याचारों की इतनी कथा सुनी कि उसने यह फैसला कर लिया कि वह इसका बदला ज़रूर लेगा. और्व ने इसके लिए घोर तप करना शुरू कर दिया.
और्व का तप किसी देवी देवता या किसी तरह के वरदान को लेकर नहीं बल्कि क्रोध और प्रतिशोध को लेकर था जिसे वह अपने पूरे शरीर और व्यक्तित्व में समेट लेना चाहते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.और्व का तप जब समाप्त हुआ तब तक और्व क्रोधाग्नि का स्वरूप बन चुके थे. लोग उन्हें अग्नि का मानव रूप कहते थे. आखिर एक दिन अपने गुस्से की आग से उन्होंने पृथ्वी को भस्म करने की ठान ली.
देवताओं को लगा कि और्व में ऐसी ताकत है कि वह ऐसा कर सकते हैं. वह बहुत घबराये पर तब तक और्व के पूर्वजोँ ने उन्हें ऐसा न करने का उपदेश दिया. और्व मान गये पर इस शरीरधारी अग्नि को देख कर देव, दानव, मानव सभी दहल गये.
सब मिलकर पितृलोक गए और वहां पर जाकर पितरों से कहा. और्व तो चलते फिरते ज्वालामुखी हैं, उनके भीतर बदले का लावा खलबला रह है, यदि वह फट पडे तो सब मारे जायेंगे आप उन्हें अपने क्रोध को समुद्र में डालने को कहें.
पितरों ने सबकी बात पर गौर किया और और्व को आदेश दिया कि तुम्हारा क्रोध तुम्हारे पास रहना समाज के लिए खतरनाक है, इसे सागर में समाहित कर दो. और्व ने पितरों के आदेश का पालन किया. शान्त होने पर अपना क्रोधानल सागर को दे दिया.
इधर कृतवीर्य के वंशजों ने लूटपाट कर धन और बल बढाया और अयोध्या पर आक्रमण कर उसे उसे जीत लिया. अयोध्या के राजा बाहु ने भागकर अपनी पत्नी के साथ उसी आश्रम में शरण ली जहां और्व रहते थे.
बाहु अपमान, दुःख और निराशा के चलते जल्द ही मर गए तो उनकी पत्नी भी उनके साथ सती होने के लिए तैयार हुईं. कालिंदी तब गर्भवती थीं और उनकी सौत ने उनको धीमा जहर दे रखा था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.और्व ने कालिंदी से कहा कि सती मत हो. गर्भ में पलने वाले शिशु की हत्या मत करो. यह पुत्र प्रतापी होगा और अपने कुल की मान मर्यादा लौटा लाएगा. कालिंदी मान गयीं. उनको बेटा हुआ.
कालिंदी के बेटे का नाम रखा गया सगर. सगर मतलब विषसहित. बालक को और्व ने ही शिक्षा दीक्षा दी. आग उगलने वाले हथियारों के चलाने में तो उसका कोई जोड़ ही न था.
सगर जब बड़े हुए तो न केवल उन्होंने वापस अपना राज्य अयोध्या जीता बल्कि कृतवीर्य के वारिस हैहयवंशियों को इस तरह पराजित किया कि वे बहुत बरसों तक सर उठाने के लायक न रहे.
उधर और्व की उम्र निकलती जा रही थी. ऋषि मित्रों ने कहा कि तुम्हें गृहस्थी बसानी चाहिए, संतान पैदा कर वंश चलाना चाहिए. और्व ने जब यह बात अनसुनी कर दी तो उन्होंने अपना अनुरोध बार बार दुहराया.
और्व ने आजिज आकर जवाब दिया कि मैं विवाहकर संतान पैदा कर सकता हूं पर मेरी संतानें साक्षात आग ही होंगी. दूसरों को भस्म करके अपन पेट भरेंगी. मेरा रक्त, वीर्य सब अग्निमय है. यकीन न हो तो यह देखो.
ऐसा कहकर उन्होंने शरीर पर प्रहार किया. एक भयंकर आवाज गूंजी. बहुत भूखा हूं, बाहर आने दो, संसार को अपने में समाकर भूख मिटाने दो. यही आवाज बार बार गूंजने लगे. यह आवाज ऐसी भयानक थी कि ब्रह्माजी तक ने सुनी.
ब्रह्माजी तत्काल और्व के सामने प्रकट हुये और बोले- मैं तुम्हें उचित स्थान देता हूं. तुम्हारा मुख अश्व जैसा होगा जिससे शरीर की अग्नि बाहर निकलती रहेगी. उस अग्नि को संभालने की क्षमता समुद्र के अलावा किसी और में नहीं. इसलिए तुम समुद्र में रहो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्माजी ने कहा- मैं तुम्हें यह वरदान देता हूं कि जब इस कल्प का अंत आयेगा. जलप्रलय होगा तब तुम्हें मेरी समूची सृष्टि को भस्म करने का मनचाहा अवसर भी मिलेगा.
तब से ऋषि और्व बड़वानल बन समुद्र में रहते हैं और अपनी ज्वाला से उसका अतिरिक्त पानी भाप बन अकर उड़ाते रहते हैं. इसी कारण समुद्र के जल का तल एक सा बना रहता है और बाढ नहीं आती.
कल्प के अंत में जब और्व यानी बड़वानल समुद्र से निकल समूचे संसार को भस्म करेंगे तो एक तरफ यह आग होगी तो दूसरी तरफ समुद्र में बडवानल न होने से उसका जलस्तर अचानक बढेगा, जल प्रलय आ जायेगा.
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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