क्या श्राद्ध में पितर पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं? गरूड़ पुराण में सीता जी की कथा

क्या श्राद्ध में पितर पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं? गरूड़ पुराण में सीता जी की कथा

क्या श्राद्ध में पितर आते हैं? पितृलोक, पूर्वजों और पितृ पक्ष में पितर कैसे आते हैं, इसके बारे में सबसे प्रमाणिक और विस्तृत चर्चा गरुड़ पुराण में मिलती है. आज हम गरुड़ पुराण श्राद्ध रहस्य के माध्यम से जानेंगे कि शास्त्रों में इस बारे में क्या विधान बताया गया है.

यह बात तो सभी जानते हैं कि पितरों या मृतात्माओं की शांति और मोक्ष के लिए गरुड़ पुराण का पाठ कराया जाता है. शास्त्रों में मृत्यु के बाद की दशा, विभिन्न योनियों और कर्मफल की व्याख्या गरुड़ पुराण में ही विस्तार से की गई है.

क्या श्राद्ध में पितर आते हैं? जानिए गरुड़ पुराण और सीता जी की कथा
क्या श्राद्ध में पितर आते हैं? गरुड़ पुराण की कथा

आइए, आपको गरुड़ पुराण से जुड़ी सीता जी की श्राद्ध कथा सुनाते हैं, जो यह स्पष्ट करती है कि श्राद्ध में पितर भोजन कैसे करते हैं.

यहां पर गरूड़ पुराण से जुड़ी एक और शंका का समाधान करते चलें. बहुत से लोग ऐसा कहते है कि गरूड़ पुराण को घर में नहीं रखना चाहिए. ऐसी बात कहां से निकली ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता.

संभवतः किसी व्यक्ति ने घर में कभी गरूड़ पुराण रखा हो और संयोगवश उसके साथ कुछ अनिष्ट हुआ हो. इसके बाद ऐसी परंपरा चल पड़ी हो कि गरूड़ पुराण घर में न रखें. एक अन्य कारण भी हो सकता है.

ज्यादातर लोगों के नाग कुल देवता होते हैं. गरूड़ और नागों की शत्रुता है. इसलिए भी संभव है कि कुल देवता का सम्मान देने के लिए उस गरूड़ पुराण को न रखने को कहा गया हो जो गरूड़ पर आधारित है.  फिर भी यह सब गरूड़ पुराण को लेकर भ्रम ही है. कोई सही उत्तर अब तक मेरे ध्यान में नहीं आया है.

पुराण स्वयं ज्ञान और मोक्ष का मार्ग हैं, अतः इनका अध्ययन सदा कल्याणकारी होता है.

गरुड़ जी की शंकाः क्या श्राद्ध में पितर आते हैं?

भगवान श्रीकृष्ण से पक्षीराज गरुड़ ने पूछा- हे प्रभु! पृथ्वी पर लोग अपने मृत पितरों का श्राद्ध करते हैं. उनकी रुचि का भोजन ब्राह्मणों आदि को कराते हैं. पर क्या पितृ लोक से पृथ्वी पर आकर श्राद्ध में भोजन करते पितरों को किसी ने देखा भी है?

भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा— “हे गरुड़! तुम्हारी इस शंका का निवारण करने के लिए मैं तुम्हें पुष्कर तीर्थ में घटी देवी सीता की एक अलौकिक कथा सुनाता हूँ। सीता जी ने पुष्कर तीर्थ में अपने ससुर राजा दशरथ सहित तीन पीढ़ियों के पितरों को श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में साक्षात देखा था।”

सीताजी ने पुष्कर तीर्थ में अपने ससुर आदि तीन पितरों को श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में देखा था, वह कथा सुनो.

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पुष्कर तीर्थ में सीता जी की श्राद्ध कथा

गरूड़! यह तो तुम्हें ज्ञात ही है कि श्री राम अपने पिता दशरथ की आज्ञा के बाद वनगमन कर गये, साथ में सीता भी थीं. बाद में श्रीराम को यह पता लग चुका था कि उनके पिता उनके वियोग में शरीर त्याग चुके हैं.

जंगल-जंगल घूमते सीताजी के साथ श्रीराम ने पुष्कर तीर्थ की भी यात्रा की.

अब यह श्राद्ध का अवसर था ऐसे में पिता का श्राद्ध पुष्कर में हो इससे श्रेष्ठ क्या हो सकता था. तीर्थ में पहुंचकर उन्होंने श्राद्ध के तैयारियां आरंभ कीं.

श्रीराम ने स्वयं ही विभिन्न शाक, फल, एवं अन्य उचित खाद्य सामग्री एकत्र की. जानकी जी ने भोजन तैयार किया. सीता जी ने अत्यंत शुचिता और भक्ति भाव से भोजन तैयार किया.

श्रीराम ने ऋषियों और ब्राह्मणों को सम्मान सहित आमंत्रित किया.

श्राद्ध कर्म में दीक्षित श्रीराम की आज्ञा से स्वयं दीक्षित होकर सीताजी ने उस धर्म का सम्यक और उचित पालन किया. सारी तैयारियां संपन्न हो गयीं. अब श्राद्ध में आने वाले ऋषियों और ब्राह्मणों की प्रतीक्षा थी.

उस समय सूर्य आकाश मण्डल के मध्य पहुंच गए और कुतुप मुहूर्त (दिन का आठवां मुहूर्त अथवा दोपहर, जो श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है) हो गया. श्रीराम ने जिन ऋषियों को निमंत्रित किया था वे सभी आ गये थे.

श्रीराम ने सभी ऋषियों और ब्राह्मणों का स्वागत और आदर सत्कार किया तथा भोजन करने के लिये आग्रह किया.

ऋषियों और ब्राह्मणों को भोजन हेतु आसन ग्रहण करने के बाद जानकी अन्न परोसने के लिए वहाँ आयीं. उन्होंने कुछ भोजन बड़े ही भक्ति भाव से ऋषियों के समक्ष उनके पत्तों के बनी थाली परोसा. वे ब्राह्मणों के बीच भी गयीं.

ब्राह्मणों में साक्षात पितरों के दर्शन

अचानक ही जानकी भोजन करते ब्राह्मणों और ऋषियों के बीच से निकलीं और तुरंत वहां से दूर चली गयीं. सीता लताओं के मध्य छिपकर जा बैठी. यह क्रियाकलाप श्रीराम देख रहे थे.

सीता के इस कृत्य से श्रीराम कुछ चकित हो गए. फिर उन्होंने विचार किया- ब्राह्मणों को बिना भोजन कराए साध्वी सीता लज्जावश पीछे हट गयी होंगी.

सीता जी एकान्त में जा बैठी हैं.

फिर श्रीरामजी ने सोचा- अचानक इस कार्य का क्या कारण हो सकता है, अभी यह जानने का समय नहीं. जानकी से इस बात को जानने पहले मैं इन ब्राह्मणों को भोजन करा लूं, फिर उनसे बात कर कारण समझूंगा.

ऐसा विचारकर श्रीराम ने स्वयं उन ब्राह्मणों को भोजन कराया.

भोजन के बाद ऋषियों को विदा करते समय भी श्रीराम के मस्तिष्क में यह बात रह-रहकर कौंध रही थी कि सीता ने ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार क्यों किया?

ऋषियों के जाने के बाद श्रीराम लताओं के समीप गए और पूछा— “हे सीते! ब्राह्मणों को देखकर तुम लताओं की ओट में क्यों छिप गईं? ऋषियों और ब्राह्मणों को पितरों का साक्षात प्रतीक माना जाता है। तुम्हारे अचानक चले जाने से सेवा में व्यवधान आ सकता था। मुझे इसका कारण बताओ।”

श्री राम के ऐसा कहने पर सीता जी मुँह नीचे कर सामने खड़ी हो गयीं.

माता सीता का संकोच और रहस्योद्घाटन

क्या श्राद्ध में पितर आते हैं- सीता जी की कथा
क्या श्राद्ध में पितर आते हैं- सीता रहस्य कथा

श्रीराम के वचन सुनकर सीता जी ने विनीत भाव से सिर झुका लिया। उनके नेत्रों में आँसू आ गए और वे बोलीं—

“हे नाथ! मैंने वहाँ जो विस्मयकारी दृश्य देखा, वह सुनिए। जब मैं भोजन परोसने गई, तो उन ब्राह्मणों की पांत में मुझे दो दिव्य राजसी महापुरुष दिखाई दिए। वे बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थे। उन्हीं के बीच मैंने आपके पूज्य पिताश्री महाराज दशरथ के भी साक्षात दर्शन किए।

वह भी सभी तरह के राजसी वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थे. इसलिए मैं बिना बताए एकान्त में चली आय़ी थी. मुझे न केवल लज्जा का बोध हुआ वरन मेरे विचार में कुछ और भी अया तभी निर्णय लिया.

हे प्रभो! पेड़ों की छाल वल्कल और मृगचर्म धारण करके मैं अपने स्वसुर के सम्मुख कैसे जा सकती थी? मैं आपसे यह सत्य ही कह रही हूं. अपने हाथ से राजा को मैं वह भोजन कैसे दे सकती थी, जिसके दासों के भी दास कभी वैसा भोजन नहीं करते?

मिट्टी और पत्तों आदि से बने पात्रों में उस अन्न को रखकर मैं उन्हें कैसे देती?

मैं तो वही हूँ जो पहले सभी प्रकार के आभूषणों से सुशोभित रहती थी और आपके पिताश्री मुझे वैसी स्थिति में देख चुके थे. आज मैं इस अवस्था में उनके सामने कैसे जाती?

इससे उनके मन को भी क्षोभ होता. मैं उनको क्षोभ में कैसे देख सकती थी? क्या यह कहीं से उचित होता? इन सब कारणों से हुई लज्जा के कारण मैं वापस हो गयी और किसी की दृष्टि न पड़े इस लिए सघन लता गुल्मों में आ बैठी.

श्राद्ध का गूढ़ रहस्य

माता सीता की बात सुनकर श्रीराम भाव-विभोर हो गए। उधर कथा समाप्त कर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—

“हे गरुड़! इस प्रसंग से सिद्ध होता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध में पितृगण साक्षात उपस्थित होते हैं और वे भोजन ग्रहण करने वाले सुपात्र ब्राह्मणों के माध्यम से ही तृप्ति पाते हैं। पितर वायुरूप में आकर भोजन का सूक्ष्म सार ग्रहण करते हैं। इसलिए श्राद्ध काल में ब्राह्मणों के साथ-साथ कौआ, गाय और श्वान को भी आदरपूर्वक ग्रास देना चाहिए, क्योंकि न जाने किस रूप में पितृगण आकर अपना भाग स्वीकार कर लें।”

(गरूड़ पुराण की कथा)


क्या श्राद्ध में पितर आते हैं और भोजन कैसे करते हैं? जानने योग्य बातें

Q1. क्या श्राद्ध में पितर आते हैं?

उत्तर: हाँ, शास्त्रों और पुराणों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितर अपने वंशजों द्वारा दिए जाने वाले तर्पण और श्राद्ध को स्वीकार करने के लिए पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं। गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जब श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया जाता है, तो पितृगण किसी न किसी रूप में उपस्थित होते हैं।

Q2. श्राद्ध में पितर भोजन कैसे करते हैं?

उत्तर: पितर वायुरूप और सूक्ष्म देह में होते हैं, इसलिए वे हमारे भोजन का स्थूल भाग नहीं खाते, बल्कि उसकी सुगंध, सार और अर्पित की गई श्रद्धा-भावना को ग्रहण करते हैं। इसके अलावा, जब हम सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, तो गरुड़ पुराण के अनुसार पितृगण उन ब्राह्मणों के माध्यम से तृप्ति प्राप्त करते हैं।

Q3. सीता जी की श्राद्ध कथा क्या है?

उत्तर: जब श्रीराम वनवास के दौरान पुष्कर तीर्थ में अपने पिता दशरथ जी का श्राद्ध कर रहे थे, तब माता सीता भोजन परोसते समय अचानक लताओं की ओट में छिप गई थीं। बाद में उन्होंने बताया कि निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में उन्हें अपने पूज्य ससुर राजा दशरथ और पूर्वज साक्षात दिखाई दिए थे, जिसके संकोच और मर्यादावश वे एकान्त में चली गई थीं।

Q4. गरुड़ पुराण श्राद्ध रहस्य क्या बताता है?

उत्तर: गरुड़ पुराण में भगवान श्रीकृष्ण पक्षीराज गरुड़ को समझाते हैं कि श्रद्धा से दिया गया दान और अन्न सीधे पितरों तक पहुँचता है। गरुड़ पुराण का रहस्य यही सिखाता है कि श्राद्ध काल में ब्राह्मणों के साथ-साथ पशु-पक्षियों (कौआ, गाय, श्वान) को भी आदरपूर्वक ग्रास देना चाहिए, क्योंकि पितर किसी भी रूप में आ सकते हैं।

Q5. पितृ पक्ष में पितर कैसे आते हैं?

उत्तर: पितृ पक्ष के 16 दिनों में यमराज पितरों को अपने स्वजनों से मिलने की अनुमति देते हैं। पितर सूक्ष्म रूप (हवा/ऊर्जा) में अपने कुल के लोगों के पास पहुँचते हैं। जहाँ उनके नाम से जल, तिल और अन्न का तर्पण किया जाता है, वहाँ वे प्रसन्न होकर वंशजों को सुख, समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं।


क्या श्राद्ध में पितर आते हैं- आशा है यह कथा आपको पसंद आई होगी. आप अपने विचारों से हमें अवश्य अवगत कराएँ.

 

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