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लक्ष्मी कब कर देती हैं किसी के घर और कोष का त्यागः स्वयं महालक्ष्मी ने इंद्र को बताया यह राज

लक्ष्मी कब कर देती हैं किसी के घर और कोष का त्यागः स्वयं महालक्ष्मी ने इंद्र को बताया यह राज

mata lakshmi

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा- पितामह, राजा का अर्थ होता है जिसके संरक्षण में प्रजा को अन्न, शिक्षा और सुरक्षा की कमी न हो. यदि राजा ने गुरूओं का पोषण कर लिया तो शिक्षा की कमी न होगी.

राजा के पास सैन्यबल को साथ रखने का सामर्थ्य हो तो सुरक्षा की कमी भी न होगी. यदि संपत्ति हो और इंद्र की कृपा बनी रहे तो कृषि कार्य भी हो जाएगा. जिन पर लक्ष्मीजी की कृपा रहती है इंद्र वहां होते ही हैं.

इस तरह देखें तो राजा के ऊपर लक्ष्मीजी की कृपा सदैव बनी रहनी परम आवश्यक है अन्यथा उसका साम्राज्य तुरंत नष्ट हो जाता है. पितामह किन सत्पुरुषों के यहां लक्ष्मीजी निवास करती हैं? यह ज्ञान मुझे दें.

भीष्म ने कहा- पुत्र इस विषय में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूं. तुम्हारे जैसा प्रश्न देवराज इंद्र ने स्वयं लक्ष्मीजी से ही किया था.

महालक्ष्मी ने इंद्र से इस बारे में जो ज्ञान दिया था, वह तुम्हारे लिए उपयोगी है. महालक्ष्मी ने इंद्र को यह रहस्य बता दिया था कि वह कहां स्थाई रूप से वास करती हैं और किस स्थान का त्याग कर देती है. उसे ध्यान से सुनो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

प्रहलाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र राजा बलि बड़े दान-पुण्य वाले राजा थे.

असुर कुल में उत्पन्न होने पर भी उनका संस्कार देवों जैसा था. वह परमार्थ में यज्ञ कराते. अतिथि सत्कार करते थे. इससे लक्ष्मीदेवी उनके महल और कोष में वास करती थीं.

राजा बलि के ऐश्वर्य के आगे देवता भी झुकते थे. बलि को इसका गर्व हो गया था. धन का गर्व आते ही महालक्ष्मी उस स्थान का त्याग करने के लिए बहाने तलाशना शुरू कर देती हैं.

बलि ने देवी को स्वयं इसके अवसर दे दिए. बलि पर मद हावी हुआ तो उन्होंने मांस-मदिरा का सेवन और ऋषियों का अपमान करना आरंभ कर दिया.

हे युधिष्ठिर, लक्ष्मी चंचला हैं. वह किसी एक व्यक्ति के वश में लंबे समय तक नहीं रहतीं. पलायन का कारण मिलते ही वह विदा होती हैं.

बलि की बुद्धिभ्रष्ट होते देख लक्ष्मी ने पलायन किया. इंद्र देवराज थे लेकिन बलि के ऐश्वर्य के आगे वह फीके थे. इंद्र भी बलि से दबते थे. इसलिए वह बलि के महल के आस-पास ही दृष्टि बनाए रखते थे.

इंद्र ने बलि के महल से एक परम तेजस्वी देवी को निकलते देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ. वह तत्काल उनके समक्ष पहुंचे और आदरपूर्वक पूछा- हे देवी, आप कौन हैं? दैत्यराज बलि को त्यागकर आप कहां जा रही हैं?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

लक्ष्मी देवी बोलीं- देव! मुझे न तो विरोचन जानते हैं न बलि. मुझे भूति, लक्ष्मी और श्री कहते हैं.

देवताओं को भी मेरे विषय पर ज्यादा ज्ञात नहीं. धाता-विधाता मुझे किसी कार्य में नियुक्त नहीं कर सकते लेकिन काल का आदेश मैं मानती हूं.

इस समय काल ने बलि को त्यागने के लिए प्रेरित किया है. मैं सत्य, दान, व्रत, तपस्या और धर्म में निवास करती हूं.

बलि इन सबसे युक्त थे तो मैं आनंदपूर्वक और गर्व से इनके महल और कोष में निवास करती थी. अब वह इनसे अलग हुए हैं.

बलि साधुजनों के हितैषी,सत्यवादी और जितेंद्रिय होते थे किंतु अब मोह में पड़कर वह अपना ही यजन करने लगे हैं. इसलिए मैं उनका त्याग करने को विवश हूं.

इंद्र ने कहा- देवी आपकी कृपा से ही बलि का प्रताप था. अब वह निस्तेज हो जाएंगे. आपको सदैव के लिए प्रसन्न रखने का क्या उपाय है.

लक्ष्मीजी बोलीं- देव मैं चंचला हूं, सदैव कहीं वास नहीं करती फिर भी मैं आपको यह बताउंगी कि मैं किस स्थान पर निवास करना पसंद करती हूं. मेरी बात को ध्यान से सुनना.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

देवी बोलीं- जो धैर्यवान हैं, अध्ययन, यज्ञ-योग करते हैं, गुरू, पितरों और अतिथियों का सत्कार करते हैं मैं उनके पास सदैव रहती हूं.

जो जितेंद्रिय, परोपकारी, श्रद्धालु, क्रोध को जीतने वाले और ईर्ष्यारहित हैं, मधुरभाषी, कृतज्ञ और लज्जाशील हैं, मैं उनके पास लंबे समय तक ठहरती हूं.

इंद्र ने पूछा- देवी,किन परिस्थितियों में आप अपने कृपापात्र का त्याग कर देती हैं?

लक्ष्मीजी बोलीं- जो बड़े-बूढ़े, विद्वानों पर व्यर्थ दोष निकालते हैं, बड़ों का सम्मान नहीं करते, निदिंत कर्म से धन उपार्जन करते हैं वह स्थान मुझे पसंद नहीं आता.

जहां पिता-पुत्र, पति-पत्नी आपस में क्लेश करते हैं, जो दूसरों का धन हड़पते हैं, जहां माता-पिता को संतान से अन्न की भीख मांगनी पड़ती है मैं उसका तत्काल त्याग करती हूं और दोबारा वापस भी नहीं आती.

जो कृतध्न हैं, नास्तिक हैं, पापी हैं, आलस्य, क्रोध, लोभ, शत्रुता और अभिमान आदि दोषों से घिरे रहते हैं, जो गुरुजनों और बड़ों की सेवा नहीं करते मैं उन्हें छोडकर चली जाती हूं.

मेरे जाने के बाद मेरी बहन ज्येष्ठा का निवास हो जाता है जो उसे दरिद्र बना देती हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

इंद्र मैं अपनी आठ सहयोगी देवियों के साथ किसी स्थान पर आती हूं और उन आठों के साथ ही उसका त्याग कर देती हूं.

अब मैं आशा, श्रद्धा, ऋति, शांति, विजित, सन्नति, क्षमा और वृति इन आठ देवियों के संग तुम्हारे पास वास करने आ रही हूं.

तुम उपरोक्त दोषों से मुक्त रहना अन्यथा तुम्हें भी त्याग दूंगी. मैंने अब तक असंख्य व्यक्तियों का त्याग किया है.

भीष्म पितामह ने कहा- युधिष्ठिर तुम पर भी बहुत सी आपदाएं आई हैं, भूलवश तुमने उपरोक्त दोषों का वरण किया था. द्युत क्रीडा सबसे बड़ा दोष था. अब तुम राजा बनोगे इसलिए इनका विशेष ध्यान रखना.

राजा हो या साधारण मनुष्य उसे लक्ष्मी की कृपा चाहिए. लक्ष्मी की कृपा सदैव चाहिए तो उसे अपने अंदर सद्गुणों का वास करना होगा. पूर्वजन्मों के कर्मों के प्रताप से कई बार लक्ष्मी दुराचारी के पास भी ठहरने को विवश रहती हैं जिस पर वह इतराता है.

परंतु उसे यह पता नहीं होता कि अगर उसके कर्म सुंदर होते तो वह राजा बनता. हे युधिष्ठिर, जैसे-जैसे उसके संचित पुण्यकर्म समाप्त होते हैं लक्ष्मी उसमें रोग, वासना, हिंसा आदि दुर्गुणों के लिए स्थान बनाती जाती हैं. इससे उस व्यक्ति का अंत बड़ा दुखद होता है.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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