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यह घटना साबित हो सकती थी सनातन परंपरा पर एक बड़ा कलंकः वेद की कथा

यह घटना साबित हो सकती थी सनातन परंपरा पर एक बड़ा कलंकः वेद की कथा

shivji

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सतयुग में एक बार पृथ्वी पर बारह वर्ष तक वर्षा नहीं हुईं. इस कारण घोऱ अकाल पड़ा. लोग भूखों मरने लगे. सप्तर्षियों भी अकाल के कारण दुखी होकर इधर-उधर भटक रहे थे.

भटकते-भटकते वे राजा वृषदार्भि की राजधानी पहुंचे. राजा धनी तो था किंतु बड़ा क्रूर और अभिमानी था. सप्तर्षियों को राजा की प्रवृति के बारे में पूरी जानकारी थी.

राजा उनके स्वागत में आया. प्रणाम करके बोला- मेरा सौभाग्य है कि आप पधारे हैं. सातों ऋषियों के एक साथ दर्शन का सौभाग्य अभी तक न मिला था. आप मेरे आतिथि बनें और दान ग्रहण करें.

सप्तर्षियों समझ गए कि पृथ्वी पर अकाल पड़ा है लेकिन यह राजा कुटिलता से बताना चाहता है कि उसके पास पर्याप्त संग्रह है. उसके पुण्य प्रताप से किसी चीज की कमी नहीं है और हम कुछ पाने की इच्छा से आए हैं.

ऋषियों ने कहा- हम आपकी बातों से प्रसन्न हैं लेकिन आपका दान ग्रहण नहीं कर सकते. राजा का दिया दान ऊपर से तो शहद जैसा होता है किंतु उसका परिणाम विष जैसा होता है.

आप यह धन किसी ऐसे व्यक्ति को दीजिए जिसे इसकी बहुत ज्यादा आश्यकता हो. ऋषि बिना दान लिए चले गए. ऋषियों ने प्रत्यक्ष दान नहीं लिया तो राजा ने सेवकों से गूलर के फलों में सोना भरवाकर ऋषियों की राह में रखवा दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महर्षि अत्रि ने एक गूलर उठाया. उसका वजन देखकर वह समझ गए कि इसमें क्या है. उन्होंने फल जमीन पर फेंका और चले. किसी ने एक भी फल न छुआ. राजा के सेवक यह देखकर हैरान थे.

राजा अब चिढ़ गया. ऋषियों की भावना को उसने अपमान समझा और बदला लेने को उतारू हुआ. ऋषिगण चलते-चलते पुष्कर तीर्थ पहुंच गए. वहां एक बड़ा तालाब कमलपुष्पों से भरा था.

ऋषियों की भेंट एक संन्यासी से हुई. उसने अपना नाम शुनःशख बताया. शुनःशख ने तालाब के पास आने का कारण पूछा तो ऋषियों ने कहा-उन्हें बहुत भूख लगी है. खाने को कुछ है नहीं इसलिए वे कमलनाल खाकर रह लेंगे.

वे सरोवर की ओर बढ़े को शुनःशख भी साथ हो लिया. सरोवर में प्रवेश का एक ही रास्ता था. दरवाजे पर एक स्त्री खड़ी थी जिसके कारण रास्ता बाधित हो रहा था.

ऋषियों ने पूछा- आप कौन हैं और यहां क्यों खड़ी हैं? स्त्री बोली- मेरा नाम जानने की आवश्यकता नहीं, बस इतना जानें कि मैं इस सरोवर की रक्षक हूं.

ऋषियों ने कहा- हम भूख से व्याकुल हैं. यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो हम कुछ मृणाल यानी कमलनाल उखाड़ लें. स्त्री ने कहा- एक शर्त है. एक-एक आदमी आगे आकर अपना नाम, स्वभाव और परिचय बताए तब सरोवर में प्रवेश कर सकता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ऋषियों को समझ में आ गया कि यह स्त्री कोई राक्षसी है और किसी बुरी नीयत से यहां खड़ी है. फिर भी भूख से व्याकुल होकर उन्होंने एक-एक करके अपना नाम बताकर सरोवर में प्रवेश आरंभ किया.

सबसे पहले अत्रि आए. उन्होंने कहा- पाप से बचाने वाले को अत्रि कहते हैं. पाप रूपी मृत्यु से बचाने वाला मैं अत्रि हूं. राक्षसी को कुछ समय न आया उसने उन्हें प्रवेश की आज्ञा दे दी.

फिर कश्यप आए. कश्यप ने कहा- कश्यप नाम है शरीर का. जो शरीर का पालन करता है उसे भी कश्यप समझो. काश के फूल की भांति उज्जवल होने के कारण काश्य भी समझो.

इस तरह शुनःसख की भी बारी आई. शुनःशेख ने कहा- जिस तरह इन महर्षियों ने अपना परिचय दिया वैसा मैं नहीं दे सकता क्योंकि इनके आगे मेरा कोई परिचय ही नहीं हो सकता.

मेरा नाम शुनःसख है अर्थात धर्मात्माओं का मित्र. धर्मात्माओं को कष्ट देने वाले को मैं दंडित करता हूं. स्त्री को कुछ समझ न आया. उसने शुनःसख से फिर नाम और परिचय पूछा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शुनःसख ने कहा- एक बार में नाम स्मरण नहीं कर सकती. भूख से पीड़ित लोगों की पीड़ा बढ़ा रही हो. लो इसका दंड भुगतो. शुनःसख ने अपने हाथ के त्रिदंड से स्त्री पर प्रहार किया.

वह पीड़ा से छटपटाकर अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आई और प्राण त्याग दिए. जब ऋषियों ने शुनःसख को अस्त्र से युक्त देखा तो उन्हें आश्चर्य और क्रोध दोनो हुआ.

शुनःसख तुरंत अपने रूप में प्रकट हुआ. वह इंद्र थे. ऋषियों को प्रणामकर इंद्र ने कहा- मैं आपकी रक्षा के लिए यहां आया था. राजा वृषादर्भि ने आपको मारने के लिए राक्षसी को भेजा था.

आपने भूख से व्याकुल होने के बावजूद भी राजा वृषादर्भि जैसे अन्यायी का दन स्वीकार नहीं किया. अब संसार के सभी दुर्लभ पदार्थ आपको स्वतः ही अपनी इच्छाभर से प्राप्त होंगे.

इंद्र ने कहा- आपने अपने त्याग से पृथ्वी को मिला अकाल के दंड का मोचन कर दिया है. अब यह अकाल तुरंत ही समाप्त हो जाएगा. (वेद की कथा)

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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