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मामूली बातों पर आसमान सर पर उठा लेते हैं! पढ़ें आदत सुधर जाएगी.

मामूली बातों पर आसमान सर पर उठा लेते हैं! पढ़ें आदत सुधर जाएगी.

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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आपको अपने स्कूली जीवन की पहली परीक्षा याद है!

आपकी परीक्षा थी और पूरा परिवार दो दिनों से उत्साहित कम घबराया हुआ ज्यादा होगा. आपकी तो उस समय उम्र ही नहीं होगी जब परीक्षा की घबराहट को समझ सकें.

अपनी मां से पूछिएगा कि क्या-क्या हुआ था. उन्हें एक-एक अक्षर याद होंगे. अपने बोर्ड की पहली परीक्षा तो याद होगी. सारी तैयारियां पक्की थीं. आपको पता था कि कुछ रहा नहीं है पढ़ने को फिर भी एक घबराहट थी.कुछ इस तरह के विचार आए होंगे.

-न जाने ऐसा क्या पूछ दें मेरे से रह गया हो.
-जिस टॉपिक को सबसे कम पढ़ा है कहीं वही न पूछ दें.
-क्या पता जब लिखने लगूं तो हाथ कांपने लगें.
-सारे उत्तर पता हों पर कहीं दिमाग ही काम करना न बंद कर दें और लिख ही नहीं पाऊं….

इस तरह की न जाने कितनी आशंकाएं जिसमें से ज्यादातर बेवजह की. जब परीक्षा देकर निकल आए तो बहुत कुछ रिलैक्स. टेंशन एक बार फिर बढ़ी होगी जब रिजल्ट आने का दिन हो गया होगा.

फिर कुछ निराधार आशंकाएं आई होंगी-

-क्या पता मेरी कॉपी जिस टीचर के हाथ गई हो वह खडूस हो. नंबर देने में कंजूसी करता हो जबकि दोस्त की कॉपी रहमदिल के पास गई हो. सब तो यही कहेंगे कि उसकी मेहनत ज्यादा थी. वह ज्यादा होशियार है पर सच्चाई किसे पता!
– कहीं ऐसा न हो जिसके पास मेरी कॉपी हो उसका घर में झगड़ा हुआ हो. उसका मूड खराब हो और सारा गुस्सा मेरी कॉपी पर निकाल दे. मामूली गलतियां जिन्हें इग्नोर किया जा सकता है उसके भी नंबर काट ले.
-क्या पता जब मेरी ही कॉपी टीचर ने ली हो ठीक उसी समय वहां कुछ समस्या आ जाए, जैसे बिजली चली जाए या कुछ औऱ प्रॉब्लम हो जाए. टीचर मुझे ही मनहूस समझ लें और नंबर काट लें…. आदि, आदि..

बहुत सालों बाद जब आप फिर से उन बातों को सोचेंगे तो हंसी आएगी कि आप क्या-क्या सोचते थे. यदि ऐसा सचमुच महसूस होता है तभी ये पोस्ट आगे पढ़िएगा क्योंकि तभी आप इसे समझ पाएंगे.

जो कहानी सुनाने जा रहा हूं उसका लाभ ले पाएंगे, उसे किसी और को सुनाकर उसे बिखरने से बचा पाएंगे. यदि यह सब महसूस नहीं हुआ है तो फिर जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूं वह आपके दिमाग में सेट नहीं हो पाएगी.

विचारकर लीजिए तभी अगले पन्ने पर जाने का बटन दबाइए.जो बात कहने जा रहा हूं वह बात बहुत गहरी है. उसके माध्यम से ईश्वर की उस लीला की चर्चा करेंगे जिसे आप क्रूरता का नाम भी दे देते हैं.

इसी कथा के माध्यम से सनातन धर्म की कुछ परंपराओं पर भी बात करेंगे. लॉजिक के साथ समझने की कोशिश करेंगे परंपराओं के बारे में..

पहले कथा को आराम-आराम से पढ़ें. जो बात कहनी है वह इसके बाद होगी.

एक थका-मांदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए बैठ गया.

अचानक उसे सामने पत्थर का एक सुन्दर टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया. पत्थर चमकीला और आकर्षक था.

शिल्पकार उस पत्थर की सुंदरता देखकर इतना प्रभावित हुआ कि सारी थकान ग़ायब हो गयी. उसने सोचा कि इस सुंदर पत्थर से तो अपनी आराध्य देवी की सुन्दर प्रतिमा बनाऊंगा.

यह सोचकर उसने उस पत्थर के टुकड़े को उठा लिया.

थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा- मुझे मत मारो.

शिल्पकार एक पल को ठिठका. उसने कुछ विचारा और फिर दूसरे वार के लिए हथौड़ा उठाया तो वह वह पत्थर रोने-गिड़गिड़ाने लगा- मत मारो मुझे, मत मारो, मत मारो.

शिल्पकार मुस्कुराया और उसने उस पत्थर को छोड़ दिया. उसने पास ही पड़ा एक एक अन्य पत्थर का टुकड़ा उठाया, उसे परखा और फिर हथौड़ी से तराशने लगा.

पत्थर के यह टुकड़ा रोया-चिल्लाया नहीं, चुपचाप छेनी-हथौड़ी के वार सहता गया. देखते ही देखते शिल्पकार के जादू से उस पत्थर के टुकड़े में से देवी की एक प्रतिमा उभर आई.

उस प्रतिमा को वहीं पेड़ के नीचे रखकर शिल्पकार अपनी राह पकड़ आगे चला गया.

कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार को फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना पड़ा, जहां पिछली बार विश्राम किया था.

उस स्थान पर पहुंचा तो देखा कि जो मूर्ति उसने बनाई थी उसकी तो बड़ी श्रद्धा से पूजा-अर्चना हो रही है. भीड़ है, भजन आरती हो रही है, भक्तों की लाइऩ लगी है.वह भी उस लाइन में लग गया और उसके दर्शन का भी समय आया. उसने पास से देखा कि उसकी बनाई मूर्ति का कितना सत्कार हो रहा है, उसका भव्य शृंगार किया गया है. भेंटें अर्पित की गई हैं. सभी शीश नवा रहे हैं.

जो पत्थर का पहला टुकड़ा उसने उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था वह भी एक मंदिर में एक ओर पड़ा था.

लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ति पर चढ़ा रहे थे.

शिल्पकार ने मन ही मन सोचा- जीवन में कुछ बन पाने के लिए यदि शुरू में अपने जीवन के शिल्पकार (माता-पिता, शिक्षक, गुरु आदि) को पहचानकर, उनका सत्कार कर, कुछ कष्ट झेल लेने से व्यक्ति का जीवन बन जाता है और बाद में सारा संसार उसका सत्कार करता है.

परंतु जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं, उनका सत्कार कोई नहीं करता.

कथा काल्पनिक हो सकती है पर इसका सन्देश है एकदम चमकते हीरे जैसा. यह हम पर है कि हम उस हीरे की चमक में अपनी आँखें चौंधिया लें या हीरे की शीतलता को महसूस करें.

जो कष्ट जीवन में आ रहे हैं वे संभव है कि क्षणिक हों या फिर कुछ लंबे समय तक जीवन में जारी रह जाएं पर वहां धैर्य की आवश्यकता होती है जैसे उस पत्थर ने रखा जिससे तराशकर मूर्ति बनी.

यदि हम शुरू में ही घबराकर पीछे हट जायेंगे तो हम तराशे जाने से वंचित रह जायेंगे.

जो पत्थर तराशने की पीड़ा सह जाता है उसके सामने सभी शीश झुकाते हैं, जो उन आरम्भिक कष्टों से घबराकर पीछे हट जाते हैं उनपर तो नारियल ही फोड़े जाते हैं.

प्रभु पर विश्वास रखें और अपने प्रयास ज़ारी रखें. जब कभी हिम्मत डगमगाने लगे तो प्रभु शरणम् है न आपके मार्गदर्शन के लिए, आपके उत्साहवर्धन के लिए. आध्यात्म और धर्म का वास्तव में यही कार्य है.

हमें ईश्वर को कोसना नहीं चाहिए बल्कि आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या ईश्वर किसी बहाने, किसी रूप में आकर चेता रहे थे पर हमने अनसुना कर दिया.ईश्वर आपसे धूप बत्ती, पुष्प, मिठाई की आशा नहीं रखते. संसार के ये पदार्थ उन्होंने ही बनाए हैं, उनका उनको क्या सौंपना!!

हम जो ईश्वर को चढ़ाते हैं वास्तव में वह हमारे मन का भाव है जो भौतिक वस्तुओं के रूप में प्रकट होता है.

पर ईश्वर कुछ और मांग रहे हैं, वह चढ़ाइये उन्हें- दिन दूना, रात चौगुना फल मिलेगा. जीवों के प्रति दया, करुणा और परोपकार की भेंट मांग रहे हैं ईश्वर. यह भी अर्पित करके देख लीजिए, लाभ होना ही है.

इसे एक साधारण से उदाहरण से समझा रहा हूं जो खुद पर आजमाया है. आप भी आजमा सकते हैं.

नौकरी ऐसी थी कि रात को ही लौटना हुआ करता था. गली में कुत्ते बहुत तंग करते थे. एक बार दिन में पांच रूपए का बिस्कुट लिया और कुत्तों को खिला दिया.

उसके बाद से वे काटने नहीं दौड़े बल्कि प्रेम से दुम हिलाते पास आने लगे. न मुझे उनसे भय होता था न उन्हें मुझसे.

जिनसे भयभीत था वे एक प्रकार से मेरे प्रहरी बन गए. हमारे अंदर अच्छे गुणों का विकास कराने के लिए उसे धर्म से जोड़ दिया गया है.

आपने सुना होगा न कि शनिवार को कुत्ते को बिस्कुट खिला दो तो शनिदेव प्रसन्न होते हैं. शनि के प्रभाव से जीवन कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है कई बार. इसलिए ऐसे छोटे-छोटे टोटके बताए गए होंगे. जिन कुत्तों से भागना होता था और चोट की आशंका थी उससे मुक्ति मिल गई.

सनातन वैज्ञानिक धर्म है, वह अंधविश्वासी बनने को नहीं कहता. अपने लॉजिक पर चीजों को कसें, हृदय बड़ा करके सोचें तो बहुत सी मान्यताएं उपयोगी लगेंगी उन्हें मान लें. खैर, अपनी बात पर लौटता हूं. ईश्वर चाहते हैं कि हममें करूणा आए तो हमारे बहुत से बिगड़े काम बनते चले जाएं.

जो प्रयास कुत्ते पर असर कर गया वह इंसान के साथ कैसे नहीं काम आएगा? हम बहुत जल्दी राय बना लेते हैं किसी के प्रति. उपकार के बदले त्वरित परोपकार की आशा रख लेते हैं इसलिए यह निष्फल जाता है.

किसी कामवाली को एक साडी पर्व-त्योहार पर दे दी तो सोचने लगेंगे कि आज से इसे हमारे वश में हो जाना चाहिए. हम जो भी आदेश करें बस आंख मूंदकर मान ले. ज्यादा काम करा लें क्योंकि हमने साड़ी दी थी उसे अच्छी वाली.

प्रतिउपकार की आशा से किया कार्य उपकार नहीं होता, व्यावसायिक लेन-देन होता है. लेन-देन में नुकसान तो होते ही रहते हैं फिर क्यों कुपित होना. आपने अव्यवहारिक आशा रखी थी सो उसका नुकसान तो होना ही था.

यह बात क्यों बता रहा हूं!???

प्रभु शरणम् में बच्चों के चारित्रिक विकास की कथाओं की एक शृंखला चला रही है. उसके बाद पेरेंटस के बड़े मैसेज आ रहे हैं. उन्हें अपने बच्चों में बड़ी कमियां नजर आ रही हैं. यही हमारा स्वभाव है.हम स्वयं में कमी देख ही नहीं पाते.

अपनी आंखों से हम अपना चेहरा देख पाते हैं क्या? नहीं न. दर्पण की आवश्यकता होती ही है. इसलिए इस पोस्ट को दर्पण समझ लें. क्या पता बच्चों की शरारतों के रूप में ईश्वर आपके अंदर धैर्य, समझदारी और मुश्किलों का सामना करने के गुण विकसित कर रहे हों.

आपको आइना दिखा रहे हों कि बच्चे के समय में से जो भी समय की कटौती करके टीवी सीरियल और व्हॉट्सएप्प पर दिया उसका खामियाजा है ये. सोचिएगा गौर से. समय कीमती है, उसका इस्तेमाल आपको कैसे करना है.

मुझे समय-समय पर बताते भी रहें कि जो लिख रहा हूं क्या वह आपके लिए उपयोगी साबित हो रहा है या बात हजम नहीं हो रही. सुधार के लिए हमेशा तैयार हूं.

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