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महादेव ने किया त्रिपुरासुर संहार, देवों ने मनाया दीपावली त्योहार- देव दीपावली की कथा

महादेव ने किया त्रिपुरासुर संहार, देवों ने मनाया दीपावली त्योहार- देव दीपावली की कथा

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शिवपुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर देवताओं और पृथ्वी को मुक्त कराया था. तारकासुर को शिवजी अपने पुत्र के समान स्नेह करते थे लेकिन जब उसके पाप का घड़ा भर गया तो देवताओं के सेनापति शिवपुत्र कार्तिकेय को उसका संहार करना पड़ा.

तारकासुर के वध से क्रोधित उसके तीनों बेटों तारकाक्ष, कमलाक्ष और विंदुमाली ने कठोर तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर अमरता का वरदान माँगा. ब्रह्मदेव ने यह वर देने में असमर्थता जताई. तीनों हठ करने लगे. उन्होंने कहा कि हमें या तो यही वरदान दीजिए या फिर हम मान लें कि आपके दर्शन भी निष्फल होते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्माजी तो धर्मसंकट में पड़ गए. प्रसन्न होकर जिसे दर्शन दिए उसे निराश नहीं कर सकते यह विधान है. असुर जो वरदान मांग रहे थे वह दे नहीं सकते. विवश होक एक उपाय सुझाया-अमरत्व तो नहीं दे सकता पर क्यों न तुम अपनी मृत्यु की ऐसी शर्त रख लो जो अत्यन्त कठिन हो.

ब्रह्माजी के समझाने पर तीनों मान गए और माँगा– आप हमारे लिए तीन पुरों (किला) का निर्माण करें. हमारी मृत्यु तभी हो जब ये तीनों पुर अभिजित नक्षत्र में एक ही पंक्ति में आकर खड़े हो जाएं. कोई ऐसा देव या पुरुष जो अत्यन्त शांत अवस्था में ऐसे रथ पर सवार हो जिसकी कल्पना ही नहीं हुई हो. वह हम पर असंभव बाण यानी ऐसे बाण चलाए जिसे आपने बनाया ही न हो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्देव ने तारकाक्ष को स्वर्णपुरी, कमलाक्ष को रजतपुरी और विंदुमाली को लौहपुरी दी. तीन पुरों के स्वामी इन त्रिपुरासुरों को लगता था कि अपनी मृत्यु की जो शर्त रखी है वह पूरी हो ही नहीं सकती. इसलिए वे अमर हो चुके हैं.

इस मद में वे आतंक आतंक मचाने लगे. देवताओं को उनके लोकों से भगा दिया. देवगण भोलेनाथ की शरण में गए और अपनी दुर्दशा बताई. महादेव ने नेत्र बंद किए और अपनी अंतर्दृष्टि से देवताओं की दुर्दशा देखी तो उन्हें बड़ा कष्ट हुआ.

उस कष्ट से उनके आंखों से आंसू की बूंदे टपक पड़ीं जिसने वृक्ष का रूप धारण किया. वह वृक्ष रुद्राक्ष के नाम से जाना जाता है. महादेव ने देवों से कहा कि वे सब मिलकर त्रिपुरासुरों के वध का प्रयास करें. देवों का बल बढ़ाने के लिए शिवजी ने अपना आधा बल उन्हें दे दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लेकिन सब देव मिलकर भी सदाशिव के आधे बल को संभाल नहीं पा रहे थे. तब शिवजी ने स्वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्प लिया. सभी देवताओं ने अपना आधा बल महादेव को समर्पित किया.

त्रिपुरासरों के वध के लिए तीन कठिन शर्तें थीं- अविजित रथ, असंभव अस्त्र और अभिजित मुहूर्त में तीनों पुरों को एक पंक्ति में खड़ा करना था. अविजित रथ के लिए पृथ्वी रथ बनीं, सूर्य और चन्द्रमा उसके पहिए तथा ब्रह्मदेव सारथी बने.

असंभव अस्त्र के लिए भगवान श्रीविष्णु बाण बने, मेरु पर्वत धनुष और वासुकी उस धनुष की डोर बने. भोलेनाथ रथ पर सवार हुए, तब सभी देवताओं द्वारा सम्हाला हुआ वह रथ भी डगमगाने लगा. विष्णुजी बैल बनकर स्वयं रथ में जुत गए तब जाकर रथ संभला.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महादेव ने पाशुपत अस्त्र का संधान किया और तीनों पुरों को एकत्र होने का आदेश दिया. उस अमोघ बाण में विष्णुदेव के साथ, वायु, अग्नि और यम भी अपनी शक्तियों समेत सम्मिलित होकर सवार हुए. यह असंभव बाण था.

अविजित् नक्षत्र में उन तीनों पुरियों के एकत्रित होते ही महादेव ने बाण चलाया. तीनों पुर भस्म हो गए और उनके स्मावी त्रिपुरासुरों का संहार हुआ. वह कार्तिक पूर्णिया का दिन था. देवताओं ने हर्षोल्लास में शिव की नगरी काशी में शिवजी की पूजा की और पर्व मनाया जिसे देव दीपावली कहा जाता है.

(सौरपुराण, शिवपुराण और महाभारत के कर्णपर्व की कथा)

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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