भगवान का नाम लेने से भी काम बन सकते हैं क्या? होता तो है बस तरीका वह होना चाहिए जो खरगोशों ने आजमाया

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हाथियों का राजा गजराज चतुर्दन्त बहुत निराश और परेशान था. पिछली साल की तरह इस बार भी बारिश न होने से जंगल और उसके आसपास के सभी तालाब पोखर सूख गये थे.
हाथियों को पीने और नहाने के चाहिये खूब पानी. गजराज को पता चला कि यहां से कुछ दूर तालाब है. यह सरोवर पाताल-गंगा के जल से बारहों महीने भरा रहता है. गजराज ने हाथियों से कहा हम सबको वहीं जाना चाहिए.
हाथियों का दल उस विशाल कुदरती तालाब तक पहुंचा. बहुत दिनों बाद पानी मिलने के कारण छोटे-बड़े सभी हाथी उस जलाशय में बैठे पूरे दिन पानी से खेलते रहे.
अंधेरा होने पर धूम मचाते भागते दौड़ते जंगल की ओर चले. जलाशय के चारों ओर खरगोशों के बहुतेरे बिल बने हुए थे. हाथियों के पैरों तले आकर खरगोशों के अधिकतर बिल तहस नहस हो गए कुचलकर खरगोश भी मर गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.खरगोशों के अस्तित्व पर संकट आ गया. खरगोशों ने सभा करके विचार किया कि कोई उपाय लगाकर हाथियों को यहां आने से रोकना होगा नहीं तो कुछ ही दिनों में हमारा समूल नाश हो जाएगा.
एक बुजुर्ग खरगोश ने कहा- शास्त्र कहते हैं कुल की रक्षा के लिए व्यक्ति, समाज और क्षेत्र का त्याग करना पड़े तो उसे बिना देर किए कर लेना चाहिए.
दूसरे ने कहा- शास्त्र यह भी कहते हैं कि जो अपनी पुरखों की भूमि की रक्षा का प्रयास भी नहीं करता उसका जीवन व्यर्थ है. बेशक हम हाथियों के समक्ष तुच्छ हैं किंतु हीनता कभी मन में नहीं होनी चाहिए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आपकी नीयत सही है तो ईश्वर मार्ग दिखाते हैं. हमें संघर्ष करना चाहिए, युक्ति लगानी चाहिए. जब हार जाएं तब इस स्थान को छोड़ने के बारे में सोचा जाए. खरगोशों की सभा में ज्ञानपूर्ण तर्क-वितर्क हुआ.
अंततः निष्कर्ष निकला कि कि पहले हाथियों को डराकर भगाने का कोई उपाय सोचा जाए. सम्भव है, उससे ही हमारा काम बन जाए और हाथी यह स्थान छोड़कर चल दें, नहीं तो फिर स्थान का त्याग किया जाएगा.
एक खरहे ने कहा- हमारा राजा विजयदत्त चंद्रमण्डल में रहता है. चन्द्रमा की ओर से कोई झूठा दूत बनाकर उस हाथियों के राजा के पास भेजा जाए जो उसको यह विश्वास दिलाये कि हम चन्द्रवंशी हैं.
उन्हें इस बात का भय दिखाया जाये कि हमारे राजा चन्द्रदेव उनके यहां आने की पर नाराज हैं, वे उनका नुकसान कर सकते हैं. हो सकता है कि इस पर विश्वास करके हाथियों का राजा अपनी प्रजा को लेकर यहां से दूर चला जाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सारे खरगोशों ने मिलकर लम्बकर्ण नामकर खरगोश को इस काम के लिए चुना. वह खरगोशों में सबसे चतुर माना जाता था. लम्बकर्ण चंद्रमा का दूत बनकर हाथियों के राजा के पास पहुंचा.
गजराज जहां आराम कर रहा था वहां लंबकर्ण एक ऊंची जगह पर चढ गया और भरसक बहुत ऊंची आवाज में बोला- दुष्ट गजराज! तुम इस तरह बेखटके चन्द्रमा के जलाशय में क्यों आया करते हो! अभी यहां से लौट जाओ और फिर कभी इधर मत आना.
गजराज ने चौंक कर पूछा, “तुम हो कौन?” लंबकर्ण बोला- मैं लंबकर्ण महाराज चन्द्रमा का दूत हूं. उन्होंने ने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है. आपको यह पता ही होगा कि दूत को अपराधी नहीं माना जाता.
गजराज ने कहा- “भाई लंबकर्ण! आप भगवान चन्द्रमा का सन्देश बताइए. लंबकर्ण बोला- कल तुमने अपने झुंड के साथ आकर अनेक खरगोशों के मार ड़ाला. राजा चंद्रमा ने कहा है कि यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो फिर कभी उस तालाब पर मत जाना.
गजराज ने कहा- संदेश तो ठीक पर भगवान चंद्रमा हैं कहां? जवाब में लंबकर्ण बोला- आपके झुंड ने जिन खरगोशों के बच्चों को कुचल दिया महाराज उनकी शोक सभा में आए हुए हैं और इसी सरोवर में मौजूद हैं.
गजराज बड़ा चकित हुआ और बोला- अगर ऐसी बात है तो तुम मुझे भगवान चंद्रमा के दर्शन करा दो, मैं उनको प्रणाम कर यहां से चला जाऊंगा. लंबकर्ण ने कहा वह ऐसा करा सकता है पर शर्त है कि गजराज को उसके साथ अकेले ही चलना होगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.गजराज जब लम्बकर्ण के साथ अकेले ही उस तालाब के निकट गया तो उसने पानी पर पड़ने वाले चन्द्रमा की परछाई को दिखाकर कहा- देखो, महाराज चन्द्रमा शोक में डूबे हुये, जल में समाधि लगाये बैठे हैं.
गजराज, बेहतर यही होगा कि चंद्रमा भगवान नाराज न हों इसलिये आप बिना कुछ कहे सुने बस उनको प्रणामकर शान्तिपूर्वक यहां से चले जाइए. आपकी आहट से उनकी समाधि भंग हो गई तो फिर उनका क्रोध और बढ़ जाएगा.
लंबकर्ण ने गजराज को पहले से ही इतना डरा रखा था कि उसकी बुद्धि काम नहीं कर पा रही थी. उसने चन्द्रमा को दूर से ही प्रणाम किया और फिर इस ओर न आने का वचन देकर अपने झुंड़ के साथ वहां से चला गया.
यह कथा एक संदेश है कि स्वयं को यदि किसी परेशानी के समक्ष तुच्छ समझेंगे तो उसका हल नहीं निकाल पाएंगे. अंतिम सांस तक संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए. यदि किसी भले कार्य के लिए सबकुछ बलिदान करना भी पड़े तो घाटे सौदा नहीं.
हमारा जीवन ऐसा खिलौना है जो उतना ही दौड़ेगा जितनी चाभी इसमें भगवान ने भरी है. क्या भरोसा वह किस दिन खत्म हो जाए. बस ऐसा करके जाएं कि जब आपके जीवन की चाबी रूके तो बहुत से नए लोग यह प्रेरणा लें कि उन्हें भी आपसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने का हौसला मिले.
यही जीवन का प्राप्य है, बाकी सब व्यर्थ की माया है. भगवान का नाम लेकर करते रहिए अपने काम, वह देख रहे हैं, परख रहे हैं. कुछ पल के लिए उदास करेंगे, हमेशा के लिए निराश नहीं. जैसे खरगोशों को मार्ग दिखा हमें भी दिखेगा, प्रयास तो करें.
संकलन व संपादन- राजन प्रकाश
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