दैत्य जलंधर का प्रकोप, देवता भागे छोड़कर देवलोकः कार्तिक माहात्म्य, ग्यारहवां अध्याय

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नारदजी ने कहा- एक बार जलंधर अपनी असुरसभा में बैठा था तभी वहां दैत्यगुरू शुक्राचार्य पधारे. जलंधर ने आगे बढ़कर उनका सम्मान किया और पूजा के बाद उचित आसन दिया.
जलंधर ने शुक्राचार्य से प्रश्न किया- हे गुरूवर असुरों में परम बलशाली राहू का शीश किसने काटा था, वह बात मुझे विस्तार से जानने की इच्छा है. शुक्राचार्य ने उसे हिरण्यकश्यपु, प्रहलाद आदि दैत्य राजाओं के बारे में संक्षेप में बताकर अमृतमंथन की कथा सुनाई.
राहू ने देवताओं का रूप धरकर अमृत पीने का प्रयास किया तो इंद्र का पक्ष लेने वाले पक्षपाती श्रीविष्णु ने उसका सर काट दिया. यह सुनकर जलंधर आगबबूला हो गया. उसने अपने दूत धस्मर को बुलाया और इंद्र को संदेश भिजवाया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.धस्मर ने इंद्र की सभा में स्वामी का संदेश दिया- हे देवताधम तुमने समुद्र को क्यों मथा और मेरे पिता के सभी रत्नों को हड़प लिया. यह तूने अच्छा नहीं किया. सभी रत्नों और देवों के संग मेरी शरण में आ जा अन्यथा तेरा राज्य ध्वंस हो जाएगा.
इंद्र बहुत विस्मित हुए और कहा- पहले सागर ने मेरे भय से सब पर्वतों को अपनी कुक्षि में क्यों स्थान दिया और मेरे शत्रु दैत्यों की क्यों रक्षा की? इसी कारण मैंने उनके सारे रत्न ले लिए हैं. मुझ से द्रोह रखने वाला कभी सुखी नहीं रह सकता.
इंद्र का संदेश दूत ने जलंधर को जाकर सुना दिया. उसका क्रोध कई गुणा बढ़ गया और उसने देवताओं को जीतने का प्रण किया. देवताओं से द्रोह रखने वाले सभी बाहुबलियों को संदेश भिजवाए गए. सभी अपनी सेना लेकर जमा होने लगे. देवों-असुरों में भीषण संग्राम छिड़ा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जल्दी ही जलंधर ने इंद्र के नंदन कानन तक में अपनी सेना उतार दी. देवता भी मुकाबले के लिए आकर डटे. दोनों पक्षों के आचार्य अपने-अपने पक्ष के वीरों को जीवित करने लगे. जलंधर क्रोधित हुआ कि जब मृत संजीवनी विद्या सिर्फ शुक्राचार्य के पास है तो देवता कैसे जीवित हो जाते हैं.
शुक्राचार्य ने बताया कि देवगुरू बृहस्पति द्रोणागिरी से औषधि लेकर देवों को जीवित कर देते हैं. इससे जलंधर बहुत क्रुद्ध हो गया. शुक्राचार्य ने कहा- क्रोधित न हो यदि शक्ति है तो द्रोणागिरी को उखाड़कर समुद्र में फेंक दो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जलंधर तोसाक्षात शिवजी का तेज था फिर बल की क्या कमी होती. उसने द्रोणागिरी को जड़ से उखाडकर समुद्र में फेंक दिया और फिर आकर युद्ध करने लगा. बृहस्पति औषधि के लिए द्रोणागिरी आए तो वहां पर्वत था ही नहीं.
वह भयभीत होकर देवों के पास गए और कहा कि जितना जल्द हो सके इस युद्ध को रोक दो क्योंकि अब तुम लोग असुरों को हरा नहीं पाओगे. शुक्राचार्य असुरों को जीवित कर देंगे और अब मेरे पास औषधि है नहीं अतः एक दिन सभी देवता नष्ट हो जाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इंद्र ने अभिमान में शिवजी का अपमान किया था, यह उसी मूर्खता का परिणाम है. यह सुनकर देवता मैदान छोड़कर भाग गए. सिंधुपुत्र निर्भय होकर अमरावती में प्रवेश कर गया और देवता इधर-उधर छिपने का स्थान खोजने लगे.
ग्यारहवां अध्याय समाप्त. कथा जारी रहेगी.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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