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भक्तवत्सल भगवान श्रीराम ने सारा पुण्य कर दिया पवनपुत्र के नाम

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भगवान श्रीराम समुद्र पर पुल बांध रहे थे तब उन्होंने सभी विध्नों का नाश करने के लिए गणेशजी की स्थापना कर नल के हाथों से नवग्रहों की नौ प्रतिमाएं स्थापित कराईं.

श्रीराम को रामेश्वरम में (जहां भूमि से सागर का संयोग होता है) अपने नाम पर एक शिवलिंग स्थापित करने की इच्छा हुई.

उन्होंने हनुमानजी को बुलाकर कहा- आप काशी चले जाइए और भगवान शंकर से मांगकर एक शिवलिंग ले आइए. लेकिन ध्यान रहे शुभ मुहूर्त बीतने न पाए.

हनुमानजी उड़े और क्षण भर में काशी पहुंच गए. शिवजी बोले- मैं खुद ही दक्षिण की ओर जाने की सोच रहा था क्योंकि विंध्याचल को नीचा करने के लिए अगस्त्यजी यहां से चले गए हैं लेकिन उन्हें मेरे बिना मन नहीं लग रहा. वह मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

शिवजी ने हनुमानजी की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा- हनुमान आप दो शिवलिंग लेकर जाइए. एक श्रीराम के नाम पर स्थापित करें और दूसरा अपने नाम पर स्थापित करें.

हनुमानजी भक्त शिरोमणि हैं. शिवजी के इस अंशावतार का उद्देश्य था प्रभु भक्ति की मिसाल कायम करना. उनके बराबर की भक्ति न किसी ने की न कोई कर सकता है.

शिवजी को आशा थी कि हनुमान एक ही शिवलिंग लेकर जाएंगे. वह श्रीराम की प्रतिष्ठा में अपनी प्रतिष्ठा देखते थे. श्रीराम ने भी उन्हें हमेशा भरपूर सम्मान दिया.

बजरंग बली हड़बड़ी में थे वह निर्णय नहीं कर पाए और दोनों शिवलिंग लेकर चले.

भगवान तो अंतर्दृष्टि से सब देख ही रहे थे. हनुमान जैसे यशस्वी के मन में अपनी महत्ता और तेज उड़ने के घमंड का अंत नहीं हुआ तो उनके तेज का नाश हो जाएगा.

सबसे प्रिय भक्त को किसी अनुचित से रोकने के लिए भगवान कड़वी दवाइयां देते ही हैं. सो उन्होंने हनुमानजी के आने से पहले सैकत(बालु से बना) लिंग स्थापित कर दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

हनुमानजी लौटे तो उन्हें पता चला कि प्रभु ने तो पहले ही शिवलिंग स्थापित करा दिया है. वह सोचने लगे- मुझसे व्यर्थ का श्रम कराकर यह कैसा व्यवहार हो रहा है.

वह नाराज होकर प्रभु के सामने पहुंचे और कहा- मेरी भक्ति का यह कैसा ईनाम मिल रहा है. काशी भेजकर शिवलिंग मंगाने और फिर दूसरा शिवलिंग स्थापित कराकर मेरा उपहास क्यों कराया आपने?

प्रभु भांप गए कि हनुमानजी अभी तक शिवजी और स्वयं उनके द्वारा संकेत में कही गई बात को समझ नहीं पा रहे हैं. वह मुस्कराने लगे. हनुमानजी का कष्ट और बढ़ गया.

श्रीराम ने कहा- आप सही कहते हैं. आप उस बालूकामय लिंग को उखाड़ दीजिए. मैं आपके द्वारा लाए शिवलिंगों को स्थापित कर देता हूं.

हनुमानजी खुश होकर शिवलिंग उखाड़ने चले. अपनी पूंछ में बांधकर उन्होंने शिवलिंग को पूरी ताकत से खींचा लेकिन उखड़ना तो दूर वह हिला भी नहीं.

हनुमानजी ने फिर जोर लगाया. शिवलिंग तो न हिला उनकी पूंछ जरूर टूट गई.हनुमानजी मूर्च्छित होकर गिर पड़े.

प्रभु ने उनके शरीर पर हाथ फेरकर स्वस्थ कर दिया. अब उनके मन का सारा गर्व चूर हो चुका था. बजरंगबली को सारी बात समझ में आ गई. उन्होंने प्रभु से क्षमा मांगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

भगवान श्रीराम ने कहा- आप संसार में मुझे सबसे प्रिय हैं. आपका अगर कोई प्रिय करता है तो वह मेरा ही प्रिय होता है. आपके मन में मुझसे अलग भाव आने ही नहीं चाहिए थे.

फिर श्रीराम ने हनुमानजी द्वारा लाए शिवलिंगो की स्थापना कराई और वरदान दिया- यदि कोई हनुमानजी द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग की पूजा न कर मेरे द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा करेगा तो उसकी पूजा व्यर्थ होगी.

हनुमानजी की पूंछ टूटी थी इसलिए प्रभु ने वहां हनुमानजी को छिन्न-पुच्छ(पूंछ), गुप्त पाद(पैर) रूप में गतगर्व(गर्वरहित) निवास करने को कहा.

भगवान श्रीराम ने बजरंगबली की छिन्न-पुच्छ, गुप्तपाद, गतगर्व मुद्रा की प्रतिमा स्थापित करा दी. वह आज भी रामेश्वरम में मौजूद है.

प्रभु ने अपने हिस्से की सारी पूजा भक्त के लिए सुरक्षित कर दी. हनुमानजी की सारी कथाएं जीवन की प्रैक्टिकैलिटी(व्यवहारिकता) का आदर्श स्थापित करती है. आप स्वयं कष्ट में हैं तो दूसरों पर दया करना शुरू कीजिए. यकीन मानिए आपके कष्ट प्रभु हर लेंगे.

जिन लोगों के अहंकार या ज्यादा उग्र होने के कारण काम बिगड़ जाते हैं उन्हें अपने घर में मंगलवार या शनिवार को हनुमानजी की ऐसी प्रतिमा या बड़ा चित्र जरूर लगाना चाहिए.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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