प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय- पुण्य का कारोबारी चार रोटियों का मोल न दे पाया
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला. वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था. एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया. अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे.
व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं. वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं. आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके.
पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ. पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं.
व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे. उसे भूख लगी थी.नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए. उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई.
कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे. बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी. व्यापारी को दया आ गई. उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया.
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी. व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं. खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा.
व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है. सेठ व्यस्त था. उसने कहा कि शाम को आओ. दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है. उसका कौन सा पुण्य खरीदूं.सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी. उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है. उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है. वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है.
व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया. सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं.
व्यापारी हंसने लगा. उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!
सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है. मुझे वही पुण्य चाहिए. व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ. सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा.
चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया. दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे. पलड़ा हिला तक नहीं.
दूसरी पोटली मंगाई गई. फिर भी पलड़ा नहीं हिला.कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता. व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा. उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए.
जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थीं वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी.
घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे. इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया.
इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था. पति के जाते ही उसने थैली खोली.
उसकी आंखे फटी रह गईं. थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी. व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए?व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था. वह तरह-तरह की आशंकाओं से घिरा था.
व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात. पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी. उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे. व्यापारी हैरान रह गया. उसने जितनी मात्रा में कंकड़-पत्थर भरे थे वे सारे कंकड-पत्थर रत्न बन गए.
प्रभु की माया के बारे में देख-सोचकर उसकी आंखें छलछला आई. वह रोने लगा. पत्नी हैरान थी. समझ नहीं पा रही थी कि उसके पति को आखिर क्या हो गया है.
व्यापारी ने पत्नी को सारी बात बता दी. पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया.
दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे. व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे.ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है. परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो. अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं.
अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं.
इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलना चाहिए. आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हो सकते हैं. विपत्तिकाल में भी धर्म पर अडिग रहते हुए आपके पैरों में जितने कांटे चुभते हैं वे सब आपके लिए एक दिन आनंद का बिछौना बनेंगे.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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