नारद की भी जरूरत है.
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.एक बार सभी देवताओं की सभा हो रही थी. वे सभी नारदजी के बार-बार आने से परेशान थे.
उन्होंने सोचा- “नारद जी हम सबको परेशान करते रह्ते हैं. जब मन में आता है, आ जाते हैं. इधर उधर की बातों में हमारा समय खराब करते हैं. हमें किसी भी तरह इनसे छुटकारा पाना होगा.”
सभी देवताओं ने अपने अपने द्वारपाल से कहा- “नारद जी आएँ तो उन्हें अंदर न आने देना. किसी भी दशा में उन्हें अंदर प्रवेश न करने देना. कोई न कोई बहाना बनाकर उन्हें टाल देना.”
अगले दिन नारद जी शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे. नंदी ने भी उन्हें वहीं रोक दिया. नारदजी हैरान हो गए.
नंदी ने कहा- “हे देवर्षि! आप कही और जा कर वीणा बजाइए. भगवान शंकर से आप नहीं मिल पायेंगे.” यह सुनकर नारदजी सकपका गए.
जब नंदी ने उन्हें सारी बात बतायी तो वे क्रोध से आग-बबूला हो गए और सीधे क्षीरसागर विष्णु भगवान से शिकायत करने पहुंचे. नारदजी जैसे ही क्षीरसागर पहुंचे, गरूड ने उनका रास्ता रोक लिया.
नारदजी नई गरूड़ को बहुत समझाया, परंतु गरूड़ टस से मस नही हुये. हारकर वे वहां से वापस आ गए क्योंकि अब स्वर्ग लोक के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे.
अब नारद जी ने देवताओं से अपने अपमान का बदला लेने की सोची परन्तु उन्हें कोई रास्ता नही सूझ रहा था. एक दिन वे घूमते-घूमते काशी पहुंचे.वहां उन्हें पता चला कि यहां एक सन्त बड़े पहुंचे हुए महात्मा हैं. वे अपनी योग सिद्दी के बल पर सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं.
नारदजी तुरंत संत के पास पहुंचे और उनके चरण पकड़ लिए.
संत ने चकित हो कर कहा- “यह क्या करते हैं देवर्षि! आप पर ऐसा कौन सा दुःख आ पड़ा है?”
नारदजी बोले- “हे प्रभु! मुझ पर बहुत बड़ा दुःख आ पड़ा है. अब केवल आप ही मेरी सहयता क्र सकते हैं. मैं आपके चरण तभी छोड़ूँगा, जब आप मुझे मेरी सहायता का वचन देंगे.”
यह सुनकर संत संकट में पड़ गए.
कुछ देर सोचने के बाद बोले- “ मैं तो स्वयं देवताओं की कृपा का याचक हूँ. मै आपको क्या दे सकता हूँ? मेरे पास तीन अद्भुत पाषाण हैं जो देवताओं की कृपा से ही प्राप्त हुए हैं.
प्रत्येक पाषाण से एक मनोकामना पूरी हो सकती है. नारदजी आप चाहें तो उन्हें ले लें किन्तु इस बात का ध्यान रहे कि इस पत्थर का देवताओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. आप उन्हें इससे प्रभावित नहीं कर सकेंगे.”
इतना कह कर महात्माजी ने तीनों पाषाण नारदजी को दे दिए.देखने में वे तीनों साधारण पत्थर लगते थे. नारदजी ने उन्हें अपनी झोली में रख लिया. अचानक उनके मस्तिष्क में एक विचार आया.
वह नगर में पहुंचे तो एक घर से रोने की आवाजें आ रही थीं. नारदजी वहाँ पहुंचे. पूछने पर पता चला कि नगर का बड़ा सेठ मर गया है. उसके परिजन बिलख रहे हैं. उसके कृपापात्र भी रो रहे हैं.
नारदजी ने तुरंत एक सिद्ध पाषाण निकाला और कामना की- “नगर सेठ पूरे सौ साल जिए।”
इतना कहते ही सेठ तुरन्त आँखें मलता हुआ उठ बैठा. यह देख कर नारदजी वहां से खिसक गए. थोड़ी दूर चलने पर उन्हें एक बूढ़ा भिखारी मिला. उसके सारे शरीर में कोढ़ था.
नारदजी ने तुरन्त दूसरा पाषण निकाला और कामना की- “यह व्यक्ति स्वस्थ हो जाये और लखपति बनकर सौ वर्ष जिए.”
नारदजी के इतना कहते ही बूढ़े भिखारी की काया पलट गई. उसका कोढ़ ठीक हो गया और घर धन दौलत से भर गया. सभी लोग उसे देख कर हैरान ही गए.
थोड़ी ही देर में नारदजी गंगा तट पर पहुँचे. वहां पहुंच कर उन्होंने तीसरे पाषण को हाथ में लिया और बोले- मै चाहता हूं मुझे तीनों सिद्ध पाषाण वापस मिल जाएँ.”
इतना कहते ही तीनों सिद्ध पाषाण उनके हाथ में आ गए.अब नारदजी धरती पर घूम-घूमकर, उलटी-सीधी कामनाएं करने लगे. जिसकी मृत्यु आती उसे जीवित कर देते, जो निर्धन होता उसे अपार धन-दौलत दे देते. जो सन्तान हीन होता, उसे सन्तान दे देते.
इस प्रकार विधि का विधान उल्ट-पुलट होते देख देवताओ में खलबली मच गई.
ब्रह्मा, लक्ष्मी और यमराज क्रोध से तमतमाते हुए विष्णु जी के पास पहुंचे और बोले- “हे भगवान! पृथ्वी पर यह क्या हो रहा है? हमारे आदेशों का पालन पृथ्वी पर नहीं हो रहा है. यही होता रहा तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा. हमें कौन पूछेगा?”
उसी समय इंद्र वहां आये और बोले- “अब मै इंद्र नहीं रहना चाहता. बादल मेरा आदेश नहीं मानते. जहाँ कहता हूँ, वहाँ बरसते नहीं और जहाँ मना करता हूँ वहाँ बरस पड़ते हैं.”
शिवजी उस समय वहीं थे.
शिवजी बोले- “नारद का अपमान करके अच्छा नहीं किया. हमें उनसे पृथ्वी लोक के हाल-चाल मालूम हो जाते थे. अब उन्हें चंचल रहने का शाप है इसलिए भटकते रहते हैं पर इस तरह वह हमें सारी सूचनाएं भी तो देते हैं. एक नारद का होना भी आवश्यक है.”
शिवजी की बात सुनकर सभी देवता चुप हो गए. उन्हें क्या मालूम था कि ये सारी करतूतें नारद की ही हैं. फिर सभी देवताओं ने आपस में विचार करके तय किया कि वरुण और वायु जाकर नारद को खोजें और बुलाकर लाएं.दोनों देवता नारद की खोज करने भूलोक पहुंचे. वे बहुत दिनों तक नारद की खोज करते रहे. अंत में एक दिन नारदजी गंगा स्नान कर रहे थे, तभी वरुण देव ने उन्हें देख लिया. उन्होंने वायु को संकेत में समझा दिया.
वरुण देव के संकेत करते ही वायु देव तेजी से बहने लगे. गंगा किनारे पर नारदजी की वीणा रखी हुई थी. उनके स्पर्श से वीणा बज उठी.
नारदजी ने जब वीणा सुनी तो हैरान रह गए क्योंकि उन्होंने वीणा बजाना ही छोड़ रखा था.
वीणा की ध्वनि सुनकर नारदजी भागे-भागे किनारे पर आये. वहाँ उन्होंने देखा कि दोनों देवता मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैँ. उन्हें देख नारदजी बोले- “अरे आप कब आए? देवलोक के क्या हाल-चाल हैँ?”
वरुण देव और वायुदेव ने नम्रता पूर्वक कहा-”हे देवर्षि! आपके बिना देवलोक में सब सूना-सूना है। हम आपको लेने आए हैं.”
यह सुनकर नारदजी का क्रोध एकदम शांत हो गया. उन्होंने तीनों सिद्ध पाषाण गंगा में प्रवाहित कर दिए. फिर वे प्रसन्न होकर वायु और वरूण देव के साथ देवलोक की ओर चल दिए. (लोककथा)
संकलनः चंद्रकिरण
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