ननद-भाभी के बीच की नोकझोंक के सूत्रधार शिव-पार्वती हैं, पर क्यों?
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एक बार पार्वतीजी के मन में आया कि काश उनकी भी एक ननद होती तो उनका मन लगा रहता. परंतु भगवान शिव तो अजन्मे थे. उनका जन्म तो हुआ ही नहीं था तो माता-पिता और भाई-बहन का प्रश्न ही न था.
जाहिर है कोई बहन नहीं थी भोलेबाबा की. इसलिए पार्वतीजी मन की बात मन में रख कर बैठ गयी. शिव तो अन्तर्यामी हैं. उन्होंने पार्वतीजी के मन की समझ ली पर अंजान बनकर बार-बार पूछते रहे.
पार्वतीजी से उन्होंने कहा- तुम्हारे मन में कुछ चल तो रहा है. मन में मत रखो उसे बता दो शायद मैं निराकरण कर सकूं.
पार्वती ने मन मसोसकर कहा- काश उनकी भी कोई ननद होती जो उनसे हंसी ठिठोली करती.
भगवान शिव ने कहा- ननद तो आ जाएगी लेकिन क्या ननद के साथ आपकी निभेगी. कहीं उसके साथ झगड़ा-विवाद होने लगा तो क्या होगा.
पार्वती जी ने कहा- ननद से मेरी क्यों न बनेगी? मैं निभा लूंगी.
शिवजी बोले- वचन दो कि अगर मेरी बहन ने तुम्हारा भूले से भी अपमान कर दिया तो तुम उसे दंडित नहीं करोगी. पार्वती तुम सर्वसमर्थवान हो. मुझे तो भय है कि तुम्हारे कोप के कारण कहीं वह भस्म न हो जाए.
पार्वतीजी ने कहा- आप उसकी चिंता न करें, मैं घर-गृहस्थी में अब निपुण हो गई हूं. मैं उन्हें अपनी छोटी बहन समझकर निभा लूंगी कोई कोप न करूंगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बस फिर क्या था. भगवान शिव ने अपनी माया से एक देवी को उत्पन्न कर दिया. यह देवी बहुत ही मोटी थी.
पैरों में बड़ी-बड़ी मोटी-मोटी दरारें थीं. शरीर कुरूप. भगवान शिव ने कहा कि यही तुम्हारी ननद हैं. इनका नाम असावरी देवी है.
पार्वतीजी अपनी ननद को देखकर बड़ी खुश हुई. झटपट असावरी देवी के लिए भोजन बनाने लगीं.
असावरी देवी स्नान करके आईं और भोजन मांगने लगी. पार्वतीजी ने भोजन परोस दिया पर असावरी देवी भंडार में जो कुछ भी था सब चट कर गईं.
पार्वतीजी और महादेवजी के लिए खाने को कुछ भी नहीं बचा. इससे पार्वतीजी दुःखी हो गईं.
पार्वतीजी ने ननद को पहनने के लिए नए वस्त्र दिए लेकिन मोटी असावरी देवी के लिए वस्त्र छोटे पड़ गए.
पार्वतीजी परेशान हो गईं. पार्वतीजी को तो हंसी-ठिठोली के लिए ननद चाहिए थी.
ननद को मजाक सूझा और उन्होंने अपने पैरों की दरारों में पार्वती जी को छुपा लिया. पार्वतीजी का दम घुटने लगा.
महादेव ने जब असावरी देवी से पार्वती के बारे में पूछा तो असावरी देवी ने झूठ कह दिया कि वह नहीं जानती कि पार्वती कहां है. पार्वतीजी चाहती तो आ जातीं लेकिन ननद की ठिठोली समझकर दरारों में बैठी थीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जब असावरी देवी की बात उन्होंने सुनी तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया पर वचनबद्ध थीं इसलिए सहन करना पड़ा.
शिवजी ने कहा- बहन असावरी कहीं यह तुम्हारी को बदमाशी तो नहीं.
शिवजी की बात सुनकर असावरी देवी हंसने लगी और जमीन पर पांव पटक दिया. पैर की दरारों में दबी देवी पार्वती बाहर आ गिरीं.
पार्वतीजी ने शिवजी से कहा- हे स्वामी! भाभी होने के नाते मेरा एक और दायित्व मुझे स्मरण हो आया. ननद को जल्दी से ससुराल भेजने की कृपा करें.
शिवजी हंसने लगे. उन्होंने ठिठोली की- क्या हुआ ननद के प्रति प्रेम बहुत शीघ्र समाप्त हो गया. कुछ दिन और आनंद लो. अभी तो ननद की लीलाएं देखी ही कहां हैं!
पार्वतीजी बोल पड़ीं- नहीं, नहीं. मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने ननद की चाह की. इन्हें शीघ्र ही ससुराल भेजिए.
भगवान शिव ने अपनी माया समेटी और असावरी देवी को कैलाश से विदा कर दिया.
शिवजी बोले- पार्वती यह तो मेरी माया थी. आपमें संतुष्टि का भाव लुप्त हो रहा था. उसे दूर करने के लिए यह सब मैंने किया लेकिन इससे संसार में ननद-भाभी के बीच नोंक-झोंक की परंपरा शरू हो जाएगी.
कहते हैं इसी कारण ननद-भाभी में छोटी-बड़ी नोक-झोंक होती रहती है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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