तप से प्रसन्न करके जब भक्त ने भोलेनाथ से मांग ली थी उनकी पत्नी ही दान में

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंआज आपके लिए लेकर आए हैं- गोकर्ण महाबलेश्वर की प्रचलित कथा. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा भी इससे काफी मिलती जुलती है.
रावण की माता कैकसी ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि पुलस्त्य की पत्नी थीं. वह प्रतिदिन लंका में समुद्र किनारे शिवजी की पूजा करती थी. कैकसी प्रतिदिन मिटटी का शिवलिंग बनातीं, उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर पूजा व अभिषेक करतीं. शिवलिंग समुद्र में उठने वाले ज्वार-भाटे में रोज बह जाता था.
रावण ने अपनी मां से शिवलिंग पूजने का कारण पूछा तो कैकसी ने बताया कि शिवलिंग पूजने से मरने के बाद शिवजी के साथ कैलाशवासी होने का सुख मिलता है. रावण ने माता से कहा कि आप कैलाशवासी होने के लिए इतना कष्ट उठा रही हैं. मैं कैलाश को ही यहां लेकर आता हूं.
अपनी माता की इच्छा पूरी करने के लिए रावण भगवान शिव की घोर तपस्या करने लगा. रावण की तपस्या से देवताओं खासतौर पर देवी पृथ्वी में खलबली मच गई कि कहीं वह शिवजी को सचमुच प्रसन्न करके कैलाश को लंका ने जाए. इससे पृथ्वी का भार संतुलन बिगड़ जाएगा.
नारद ने श्रीहरि विष्णु को सारी बात कह सुनाई. श्रीहरि ने नारद से कहा कि देवताओं को निश्चिंत रहने को कहो. समय आने पर वह रावण को भ्रमित करेंगे ताकि रावण को याद ही न रहे कि वह क्या मांगने के लिए तप कर रहा है.बहुत तप करने के बाद भी भगवान शिव प्रकट नहीं हुए तो शक्तिशाली रावण ने अपने हाथों से कैलाश को जोर-जोर से हिलाना शुरू किया. रावण के ऐसा करते ही सातों लोक हिलने लगे. पृथ्वी असंतुलित होने लगी.
पार्वतीजी ने शिवजी से कैलाश के हिलने का कारण पूछा तो शिवजी ने बताया कि “मेरे प्रिय भक्त रावण के प्रभाव से यह हो रहा है. घबराने की जरूरत नहीं.”
पार्वतीजी ने बताया कि आप इसे इतनी सहजता से न लें. सारे देवताओं में खलबली मची हुई है. वे अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पा रहे. इसलिए आप किसी भी हाल में कैलाश को यहां से न जाने दें. रावण ने कैलाश को उठा लिया था.
पार्वतीजी के ऐसा कहने पर शिवजी ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को दबाया और रावण का हाथ कैलाश के नीचे दब गया. रावण इस पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा था. उसने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्त्रोत्र गाना शुरू कर दिया.भोलेनाथ प्रसन्न हो गए. वह देवी पार्वती के साथ रावण के सामने प्रकट हुए. अब श्रीहरि ने अपनी माया फैलाई जिसके प्रभाव से रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई. वह शिवजी से कैलाश मांगने के बजाय जगदम्बा पार्वती पर मोहित हो गया और उसने भगवान शिव से देवी पार्वती को ही मांग लिया.
भोलेनाथ वचन में थे. उन्होंने भक्त को देवी पार्वती दान कर दी. लेकिन पार्वतीजी को ले जाने के लिए एक शर्त रखी कि रावण आगे-आगे चलेगा और पार्वती जी पीछे-पीछे आएंगी. रावण जब तक लंका नहीं पहुँचता, तब तक उसे पीछे मुडकर नहीं देखना होगा.
अगर उसने मुड़कर देखा तो देवी पार्वती वहीं स्थापित हो जाएंगी. रावण माया के प्रभाव में कैलाश की जगह पार्वतीजी को लेकर चला.संकट में फंसी देवी पार्वती ने अपने भाई श्रीहरि का स्मरण किया. श्री हरि ने नारद को कहा कि वह रावण के पास जाएं और उसे बातों में उलझाएं.
जब रावण गोकर्ण तक पहुँचा तो उसे नारद मिल गए. नारद ने मीठी-मीठी बातों में फंसाकर रावण को भ्रमित करना शुरू किया. उन्होंने रावण से पूछा कि तुम्हारे पीछे-पीछे चल रही यह कुरूप स्त्री कौन है?
रावण ने कहा कि आपको भ्रम हुआ है. वह जगत सुन्दरी जगदम्बा पार्वती हैं. मैंने वरदान में उन्हें प्राप्त किया है. नारद जोर से हंसे. उन्होंने कहा कि ज़रा पीछे मुड के तो देखो. तुम्हारे साथ छल हुआ है. देवी जगदंबा के स्थान पर कोई अन्य स्त्री तुम्हारे पीछे आ रही है.
रावण ने मुड के देखा. उस समय देवी ने भद्रकाली का रूप धारण किया हुआ था. जैसे ही रावण ने उन्हें देखा देवी भद्रकाली मूर्ति के रूप में गोकर्ण में स्थापित हो गईं. रावण विलाप करने लगा तो नारदजी ने बताया कि कि असली पार्वती ने पाताल में मायासुर की पुत्री मंदोदरी के रूप में जन्म लिया है.
रावण पाताल की ओर चल पड़ा. उसने मायासुर को युद्ध में हराकर उसकी बेटी मंदोदरी से विवाह किया. पत्नी को लेकर वह लंका पहुंचा. कैकसी ने पूछा कि यह किसे ले आए तो उसने सारी बात कह सुनाई.कैकसी ने कहा कि तुम जिस उद्देश्य के लिए गए थे उससे भटक गए. कैलाश लाने गए थे और पत्नी लेकर आए. देवों ने छल से तुम्हें भ्रमित किया है. एक बार फिर जाओ और इस बार विशेष सावधान रहना. यहां कैलाश के अलावा कुछ और मत लाना.
रावण ने फिर से घोर तपस्या शुरू की. पहले से भी कठिन तप किया. शिवजी को पता था कि वह क्या मांगने वाला है इसलिए वह प्रकट ही नहीं होते थे.रावण ने एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवजी को अर्पित करना शुरू किया.
भोलेनाथ पिघल गए और प्रकट हुए. रावण से वरदान मांगने को कहा. रावण ने उनसे अपनी माता के लिए कैलाश पर्वत मांगा. शिवजी ने कहा कि उसके लिए कैलाश ले जाने की क्या आवश्यकता. उन्होंने अपनी आत्मा से एक शिवलिंग उत्पन्न किया.
शिवजी ने कहा कि आत्मलिंग है. इसमें मेरी आत्मा बस गई है. मैं छोटे रूप में इसमें प्रवेश कर चुका हूं. इसे ले जाओ लेकिन ध्यान रहे लंका पहुंचने से पहले इसे नीचे मत रखना. तुम इसकी आराधना कर जब भी पुकारोगे मैं प्रकट हो जाउंगा. रावण खुश होकर आत्मलिंग लेकर चला.
रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए अपने सिर काट दिए थे और मस्तक की नसों को वीणा की तरह बजाकर शिवजी को प्रसन्न किया था. ऐसा रावण के अलावा और कोई नहीं कर सकता, देवता इस बात को समझते थे. उन्हें भय हुआ कि आत्मलिंग के रूप में अगर शिवजी उसके पास बसने लगेंगे तो रावण न जाने उन्हें किस विधि से कब प्रसन्न कर ले और क्या मांग ले.
देवताओं ने नारदजी को चिंता बताई. नारद ने इसका निवारण करने के लिए श्रीगणेशजी से सहायता मांगी. रावण जब गोकर्ण पहुंचा तब गणेशजी ने एक बालक के रूप में गाय चराने का बहाना करके अपनी लीला आरंभ की.उसी वक्त श्रीहरि ने सुदर्शन चक्र से सूर्य को ढक लिया. रावण को लगा कि सूर्यास्त हो गया है. उसने संध्या पूजा की चिंता हुई. वह बालक रुपी गणेश के पास गया और उनसे बोला कि मैं पूजा के लिए स्नान करने समुद्र में जा रहा हूं. तब तक थोड़ी देर ले लिए वह यह आत्मलिंग पकड़ कर रखें.
गणेशजी मान गए. उन्होंने कहा कि मैं बालक हूं ज्यादा देर नहीं ठहर पाउंगा. इसलिए जब वह थक जाएंगे तो तीन बार रावण को पुकारेंगे. अगर रावण नहीं पहुंचा तो वह आत्मलिंग नीचे रख देंगे. सहमत होकर रावण स्नान के लिए गया.
रावण जैसे ही समुद्र में पहुंचा गणेशजी ने तीन बार जल्दी-जल्दी रावण को पुकारा और आत्मलिंग नीचे रख दिया. क्रोधित रावण ने गणेशजी के मस्तक पर प्रहार किया. गणेशजी जमीन में कुछ धंस गए. रावण ने आत्मलिंग उठाने की बार-बार कोशिश की.
आत्मलिंग उखड़ा तो नहीं लेकिन उसके बल के कारण उसका आकार गोकर्ण(गाय के कान) जैसा हो गया. उस आत्मलिंग को गोकर्ण महाबलेश्वर कहते हैं. रावण ने गुस्से में भरकर आत्मलिंग के ऊपर सुसज्जित सामग्रियों को भी दूर-दूर फेंक दिया. वे सारे चार अलग-अलग स्थानों पर जाकर गिरे चार लिंग के रूप में स्थापित हो गए. (गोकर्ण की लोकप्रिय कथा)
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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