जानिए वह कौन सा ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर एक विद्वान महर्षि और उनकी आठ पीढ़ियां नहीं दे पाईं

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वैदिक काल की बात है. एक महान ऋषि हुआ करते थे कक्षीवान. एक बार वह अपने ही समान विख्यात प्रियमेध ऋषि के पास गए और उनसे बोले- प्रियमेध, मेरी एक पहेली सुलझाओ. ऐसी कौन-सी चीज है जिसे जलाने पर तनिक भी रोशनी नहीं होती?
प्रियमेध ने बहुत सोचा पर वह पहेली नहीं सुलझा पाए. जिस चीज के भी बारे में सोचते उन्हें लगता कि उसको जलाने पर थोड़ी सी ही सही पर रोशनी तो पैदा होती ही है. पहेली के हल के उधेड़बुन में उनकी जिंदगी बीत चली.
प्रियमेध ऋषि का जब अंत समय आया तब उन्होंने कक्षीवान को बुला कर कहा- मुझे तुम्हारी पहेली का जवाब नहीं मिल पाया लेकिन आगे मेरे वंश में कोई ऐसा विद्वान जरूर जन्म लेगा, जो इसका जवाब देगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उनके मरने के बाद प्रियमेध के बेटे ने पहेली का हल सोचने का जिम्मा लिया. वह भी बूढा होकर मर गया लेकिन हल नहीं खोज पाया. इसी तरह प्रियमेध की एक के बाद एक कई पीढियां गुजरती गयीं, सभी कक्षिवान की पहेली का हल खोजते स्वर्गवासी होते रहे.
इस तरह प्रियमेध की आठ पीढियां पहेली का हल नहीं ढूंढ सकीं और धरती से विदा हो गईं पर कक्षीवान अपनी बुझाई पहेली का जवाब पाने के लिए जिंदा रहे. कक्षीवान के पास नेवले के चमड़े की एक बडी-सी थैली थी. थैली में पिप्पली, चावल जैसे अनाज भरे थे.
हर साल वे उसमें से एक-एक दाना निकालकर फेंक देते थे. जब तक थैली के सारे दाने न खत्म हो जायें तब तक का जीवन उन्हें हासिल था. इस समय कक्षीवान की उम्र 900 साल से ज्यादा की हो चुकी थी पर वे जीवित थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अब जब प्रियमेध की नौवीं पीढी में साकमश्व पैदा हुआ तो भी कक्षीवान की अनाज की थैली में दाने मौजूद थे. वे आज भी अपनी पहेली के उत्तर का इंतज़ार कर रहे थे.
साकमश्व विद्वान निकला पर उसे यह बात कलंक की तरह लगती कि उसके आठ पुरखे एक पहेली को सुलझाये बिना ही स्वर्ग सिधार गए, आज भी पहेली और उसे पूछने वाला जिंदा है.
सामकश्व ने निश्चय किया कि मैं अपने खानदान से इस कलंक को मिटाउंगा, इस पहेली को जरूर सुलझाऊंगा. वह इसके बारे में सोच ही रहा था कि उसी समय उसे एक `साम’ यानी सामवेद का श्लोक सूझा.
उसने वह साम यानी सामवेद का गाए जाने वाले श्लोक को उसके लिये निर्धारित लय में गाया और पहेली का उत्तर मिल गया. वह तुरन्त कक्षीवान के पास भागा. कक्षीवान ने सामकश्व को दौडकर आते देखा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वह बुद्धिमान थे. कक्षीवान सारा माजरा समझ गये. कक्षीवान ने सामकश्व को दूर से ही देख कर अपने शिष्य से कहा- मेरी यह थैली नदी में फेंक दो. मेरी पहेली सुलझाने वाला मनुष्य मुझे साफ दिखाई दे रहा है. अब पहेली के हल के इंतज़ार में जीना नहीं पड़ेगा.
सामकश्व कक्षीवान के करीब आकर बोला- जो मनुष्य केवल `ऋचा’ गाता है, `साम’ नहीं गाता, उसका गायन उस अग्नि जैसा है जिससे प्रकाश नहीं पैदा होता लेकिन जो ऋग्वेद की `ऋचा’ के ठीक बाद सामवेद के`साम’ भी गाता है, उसका गायन उस अग्नि-जैसा है, जिससे रोशनी भी पैदा होती है.
असल में साकमश्व के दिमाग में जब अचानक साम कौंधा था तो उसने तुरंत ही उसे गाया. संगीत सहित लयबद्ध गायन से उसे `साम’ के तेज का अहसास हुआ. उसकी समझ में आ गया कि संगीत के बिना रूखा सूखा मन्त्र पढने से कोई लाभ नहीं है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.साकमश्व ने कक्षीवान से कहा- यह मेरा उत्तर है. मेरे पिता का भी यही उत्तर है. ऐसा कहकर उसने अपने सभी आठ पूर्वजों के नाम ले कर उनका कलंक धो डाला.
सामकश्व की इस खोज के बाद कि बिना लय ताल संगीत के मंत्र पढना बेकार है यज्ञ में ऋग्वेद की ऋचाओं के साथ सामवेद के साम का भी गायन आरम्भ हुआ एवं काव्य को संगीत का साथ मिला. स्रोत: आदि पुराण
संपादनः राजन प्रकाश
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