तो इस कारण होती है धन की देवी लक्ष्मी के साथ बुद्धि के देवता गणेशजी की भी पूजा

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एक बार एक साधु ने लक्ष्मीजी की कठोर तपस्या की. असल में साधु नियम धरम वाले एकरस जीवन से ऊब गया था. साधु को इच्छा थी कि वह राजसी सुख भोग कर देखे. इसी चाहत से उसने लक्ष्मी जी को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर लिया.
लक्ष्मीजी ने खुश हो कर साधु को राजसुख का वरदान दे दिया. वरदान पाया साधु सीधे राजदरबार पहुंचा. साधु होने के चलते उसे राजा के पास पहुंचने में कोई दिक्क्त न हुई. राजा के करीब जा कर उसने राजा का राजमुकुट गिरा दिया.
यह बहुत बुरी और अपमानजनक बात थी. राजा क्रोध से कांपने लगा. अचानक वह उछल पड़ा और जोर से चीखा क्योंकि उसने उस राजमुकुट से एक सांप को निकलकर बाहर आते देखा था.
यह देखकर राजा का गुस्सा ठंडा पड गया. उसने बड़ी खुशी से साधु को उपहार वगैरह देकर अपना खास मंत्री बनने को कहा. साधु तुरंत मान गया और अगले ही दिन से वह राजसी सुख सुविधा भोगने वाला खास मंत्री बना दिया गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन जब राज दरबार सजा हुआ था, उस साधु ने चिल्ला कर कहा कि सब लोग तुरंत राजमहल से बाहर निकल जायें. उस साधु के चमत्कार से सभी वाकिफ ही थे सो सब बाहर निकल गये.
सभी लोग राजमहल से बाहर आ गए तो सबके बाद साधु उससे बाहर निकला. साधु का निकलना था कि राजमहल भरभरा कर गिर गया. इस घटना के बाद तो सारे राजकाज में साधु का दखल और नियंत्रण बढ गया.
अपने बढ़ती हैसियत के चलते साधु को बहुत घमंड हो गया और वह अपने को सर्वेसर्वा समझने लगा. अभिमान ने उसकी बुद्धि हर ली थी. अपना प्रभाव और हेकड़ी जताने के लिये वह ऊट-पटांग फैसले करने लगा.
राजमहल के मुख्य द्वार के ठीक सामने भगवान गणेश की एक बहुत भव्य मूर्ति स्थापित थी. अभिमान के चलते एक दिन साधु ने राजमहल के सामने स्थित गणेशजी की मूर्ति को वहां से हटवाने का आदेश दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.साधु का मानना था कि यह मूर्ति राजमहल की सुंदरता को ढक कर उसका सारा सौंदर्य नष्ट कर रही थी. साधु का कहना भर था कि गणेशजी की मूर्ति को वहाँ से हटा कर एक निर्जन स्थान पर रख दिया गया.
अपने इसी अति आत्मविश्वास और घमंड तथा चमत्कार और प्रभाव दिखाने के चक्कर में एक दिन साधु ने राजा से कहा कि उसके कुर्ते में सांप है, वह तत्काल कुर्ता उतार कर फेंक दें.
राजा ने साधु का चमत्कार पहले भी देख ही रखा था, उसने भरे दरबार में अपना कुर्ता उतार कर झटक दिया. आश्चर्य कि कुर्ते में से कोई सांप नहीं निकला.
राजा साधु के पहले किये चमत्कार और उपकार भूल गया. वह बहुत नाराज हुआ और उसने न सिर्फ साधु को मंत्री पद से हटा दिया बल्कि जेल में डलवा दिया.
राजसी सुख और प्रभाव को भोग चुके साधु को यह बात बुरी तरह खली. दुखी होकर उसने कारागार में ही रह कर लक्ष्मी की घनघोर तपस्या की. आखिरकार लक्ष्मीजी साधु पर एक बार फिर प्रसन्न हो ही गयीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लक्ष्मीजी ने साधु को स्वप्न में बताया कि उसने गणेशजी की मूर्ति को हटवाकर गणेशजी को नाराज कर दिया है. इसीलिए यह विपदा आई है. गणेशजी के नाराज होने से उसकी बुद्धि नष्ट हो गई. धन या लक्ष्मी के लिए बुद्धि बहुत ज़रूरी है.
लक्ष्मीजी ने साधु से यह भी कहा कि, तुम्हारी हरकत से जब तुम्हारे पास गणेशजी के कृपा से बुद्धि नहीं रही तो लक्ष्मीजी कैसे रह सकती थीं, वह भी चली गई. साधु का सपना टूटा तो उसे यह सब जान कर अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ.
साधु को अपनी गलती का अहसास हो गया. अब उसका घमंड जाता रहा. उसने पश्चाताप किया. उसका असर यह हुआ कि अगले ही दिन राजा खुद जेल आया और साधु से गलती के लिए क्षमा मांग कर फिर से मंत्री बना दिया.
साधु ने राजा से कहा- महाराज आप जनता को बताएं कि यदि वे सर्वदा और सर्वथा लक्ष्मीवान रहना चाहते हैं तो लक्ष्मीजी के साथ-साथ गणेशजीकीभी साधना करें.
लक्ष्मी घर में प्रवेश के साथ ही मन को चंचल करके परीक्षा लेती हैं. उन्हें तो विदा होने का कारण चाहिए. उस समय गणेशजी की कृपा से सदबुद्धि प्राप्त होती है और वह ऐसे उपाए बताते हैं जिससे लक्ष्मी के पैर चंचल न होने पाएं.
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. माता लक्ष्मी की कृपा से सारे वैभव प्राप्त हुए किंतु मैंने गणेशजी को नहीं पूजा और बुद्धि बिगड़ी फिर क्या हुआ वह जानते ही हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा को उसकी बात समझ में आ गई. उसने उन सभी स्थानों पर गणेशजी की प्रतिमा भी लगवाई जहां लक्ष्मीजी थीं. लक्ष्मीजी से पहले गणेशजी की पूजा आरंभ हुई. सारीप्रजा को भी यह बात बताई गई. कहते हैं तभी से लक्ष्मी के साथ गणेशजी की पूजा शुरू हुई.
लक्ष्मी-गणेश की पूजा साथ-साथ इस घटना के बाद हुई हो या न हो लेकिन यह तो सच है कि सुख से जीवन बिताने के लिये धन जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है उस धन के सही प्रयोग का ज्ञान, अन्यथा धन व्यर्थ है.
वह धन में प्रमाद, व्यस्न और समस्त ऐसे कर्मों की ओर प्रेरित करेगा जिससे धन और मान दोनों का नाश हो. मान-सम्मान मुद्रा से भी बड़ा धन है. (स्रोत: जनश्रुति)
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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