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जहां सेवा करने का अवसर न मिले वह कैसा स्वर्ग? ऐसे परोपकारी थे हमारे ऋषि-महर्षि. महर्षि मुद्गल की कथा

जहां सेवा करने का अवसर न मिले वह कैसा स्वर्ग? ऐसे परोपकारी थे हमारे ऋषि-महर्षि. महर्षि मुद्गल की कथा

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कुरुक्षेत्र तीर्थ में रहने वाले महर्षि मुद्गल दो तरीके से अपने लिए भोजन जुटाते थे एक तो भिक्षा मांगकर, दूसरे किसानों द्वारा काटी जा चुकी फसल से खेत में गिरे दाने चुनकर.

वे पखवारे भर में जो भी अन्न इकट्ठा करते अमावस्या या पूर्णिमा को दान कर देते. खुद पूरा परिवर तीन दिन में एक बार खाता पर इतना होने पर भी अतिथि उनके दरवाजे से कभी भूखा न जाता.

महर्षि मुद्गल के अन्नदान की महिमा दूर-दूर तक फैली तो उसे सुनकर क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात दुर्वासा ने उनकी परीक्षा लेने की सोची. दुर्वासा पागलों जैसा भेष बनाए मुद्गलजी के आश्रम में पहुंचे और भोजन मांगने लगे.

मुद्गल ने अपने पास रखा सारा अन्न दुर्वासा के सामने रख दिया. दुर्वासा ने सब खा लिया और वहां से चले गए. तीन तीन दिन पर एक बार खाने वाले मुद्गल परिवार सहित भूखे रह गए पर अपनी तकलीफ दुर्वासा को महसूस न होने दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ दिन बाद दुर्वासा ऋषि फिर उसी वेश में आये और वैसा ही किया. अगली बार तो वे ठीक तीसरे दिन आये जब महर्षि मुद्गल के परिवार के भोजन का दिन होता था. इस तरह उन्होंने छह माह तक किया.

हर बार वे पुराने वेश में ही आते ताकि मुद्गल उन्हें मना कर दें पर महर्षि न तो चिंतित होते न दुखी, आदर भाव भी एक सा बना रहता. मना करने, खीझने और नाराज होने की तो बात ही अलग थी.

दुर्वासा ने ऐसा लगातार किया. हर बार उन्होंने मुद्गल का सारा अन्न खा लिया. मुद्गल भी उन्हें भोजन कराकर फिर अन्न के दाने चुनने, भीख मांगने और बचे समय में गणेश भजन में लग जाते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आखिरकार महर्षि दुर्वासा मुद्गल की अंतिम परीक्षा लेने के लिए छह हजार शिष्यों के साथ उनके आश्रम में पहुंचे. मुद्गल जी ने सभी का सत्कार किया और उन्हें आदर सहित बिठाया. भोजन भी कराया.

दुर्वासा प्रसन्न होकर बोले, महर्षि इस संसार में आपके समान अतिथि सेवा करने वाला, अन्न दानी कोई नहीं है. भूख मनुष्य के धर्म, ज्ञान व धैर्य को नष्ट कर देती है, किंतु आप पर उसका प्रभाव नहीं पड़ा. अत: आप शीघ्र ही स्वर्ग जाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ दिन बीते तो देवदूत उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए आए. महर्षि मुद्गल ने पूछा- क्या स्वर्ग में मैं भूखों की सेवा, अतिथियों का सत्कार और ईश्वर की भक्ति कर सकूंगा.

देवदूतों ने कहा- स्वर्ग में केवल सुख भोग सकेंगे, कर्म नहीं कर पाएंगे. मुद्गल जी बोले, आप वापस जाएं, मुझे अकेले सुख भोगने में कोई आनंद नहीं, बल्कि दूसरों को सुख पहुंचाने, सेवा और सत्कार करने में आनंद मिलता है.

मुद्गल ने कहा- भगवान की भक्ति करके मुझे जो संतोष मिलता है, वह स्वर्ग के सुखों में कैसे मिलेगा. स्वर्ग में देवताओं की आपस में लाग डांट है वहां संतोष कहां? असुरों के आक्रमण और पुण्य के पतन का भय मुझे अपना काम करने न देगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मुझे कर्मयोगी ही रहने दें, दूसरों के दुख कम करने की कोशिश में लगे रहने दें. देवदूत उस अनूठे कर्मयोगी के आगे सर झुक अकर लौट गए. बाद में जब भगवान धर्म ने साक्षात परीक्षा ली. वे उसमें भी सफल रहे तो उन्हें सपरिवार अपने साथ स्वर्ग ले गये.
स्रोत: मुद्गल पुराण

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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