गुरुभक्त जीत लेता है हारी हुई लड़ाई- ऋग्वेद की कथा

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंजो व्यक्ति अपने गुरु का भक्त होता है, उन पर पूरी आस्था रख उनके बताए रास्ते पर चलता है उसकी सहायता करने में देवता भी पीछे नहीं हटते. यदि शिष्य अपने सदगुरु के प्रति पूरा समर्पण,श्रद्धा और विश्वास रखे तो गुरु की कृपा क्या नहीं कर सकती.
पुराने समय की बात है. चायमान अभ्यवर्ती और संजय के पुत्र प्रस्तोक के राज्य अगल बगल थे. दोनों ही राजा बहुत धर्मात्मा और प्रजा का बहुत ख्याल रखने वाले थे. यहां यज्ञ-होम, जप-तप, पूजा पाठ चलते रहते, लोग सुखी संपन्न थे.
बाहरी आक्रमण रोकने के लिये दोनों राज्यों ने मिलकर संयुक्त सेना बना रखी थी, जिसकी कमान प्रस्तोक के हाथ में थी. दोनों राजाओं का प्रसिद्धि, राज्यों की बढत और यहां के लोगों का सुख, असुरों से देखा न गया.एक दिन असुरों ने इन पर आक्रमण कर दिया. दो राज्यों की एकजुट सेना होने के बावजूद असुर भारी पड़े. दोनों राजा हार गये. असुर बहुत सारा धन और तमाम कीमती और दुर्लभ चीजें उठा ले गए.
दोनों राजा इस हार से बहुत दुखी हुए. क्या किया जाए, किस तरह ताकतवर असुरों से बदला लिया जाए और अपनी धन दौलत के साथ गयी इज्जत कैसे लौटे? बहुत सोचा पर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.
सोचते-सोचते उन्हें ध्यान में आया कि कुलगुरु भरद्वाज ऋषि के पास जाकर उनसे प्रार्थना की जाए. वे जरूर कोई रास्ता बतायेंगे. गुरु चाह लेंगे, सहायता मिली तो हमारा मनोरथ ज़रूर पूरा होगा.
महाराज अभ्यवर्ती और प्रस्तोक अगले ही दिन गुरु भरद्वाज ऋषि के पास पहुँचे. पांयलागी और अभिवादन तथा हालचाल पूछने बताने के बाद दोनों ने अपने ऊपर पहली बार पड़े संकट से निकलने का कोई रास्ता न सूझने के बात बतायी.
दोनों ने कहा- गुरु जी असुरों ने हमें बुरी तरह से हराया और सारा धन लूटकर खजाना खाली कर दिया. आप तो जानते ही हैं हम सदा धर्म पर अड़िग रहते हैं. फिर भी हार गये.
दोनों नरेशों ने दुखी होते हुये कहा- बहुत सोचने के बाद हम इस फैसले पर पर पहुंचे हैं कि अब आप-जैसे गुरुजनों की कृपा के बिना इस समस्या का हल संभव नहीं. आप सहायक हों तभी हम अपने बली दुश्मनों को जीत सकते हैं.
ऋषि भरद्वाज ने कहा- आप लोग चिंता न करे, निश्चिंत हो कर घर जायें, मैं आप की इच्छा पूरी किए देता हूं. थोड़ा समय लगेगा. दोनों राजा ऋषि को प्रणाम कर वापस लौट गए.भरद्वाज ने अपने बेटे पायु को बुलाकर कहा कि इन दोनों राजाओं को ऐसा बना दो कि इनका दुश्मन इन्हें कभी हरा न पाये. मैं भी इंद्र देव से भी इन्हें सहायता देने के लिए प्रार्थना करूंगा.
अध्यावर्ती और प्रस्तोक अपने-अपने राज्यों में लौट आये पर वे बहुत बेचैन और खिन्न थे. असुरों ने जिस तरह से उनकी इज्जत धूल में मिला दी थी वह उनके दिल में तीर सा चुभ रहा था.
दोनों राजाओं को यह खटका भी लग रहता था कि असुर दुबारा आक्रमण न कर दे और इससे भी ज्यादा तबाही मचाकर बचा खुचा धन न लूट ले जाये. गुरु महर्षि भरद्वाज की बात पर उन्हें विश्वास था, पर चिंता दूर नहीं हो पा रही थी.
एक दिन इसी बारे में दोनों राजा मिल कर आपस में विचार कर रहे थे कि उन्हें एक ऋषि आते दिख पड़े. वह पायु ऋषि थे. प्रस्तोक प्रसन्न हुये. उनके मन में अपने घर पहली बार आये कुलगुरु पुत्र को भेंट देने की सूझी.शंबर युद्ध में दुश्मन से जीती और छुपा कर रखी ढेर सारी दौलत उनके कदमों में रख कर प्रस्तोक बोले, आपके पूज्य पिता ने भरोसा दिया था, हमें पूरा विश्वास है पर पापी मन को चैन नहीं है.
पायु ने कहा- घबराये नहीं. पिताजी ने इसीलिए मुझे आपके पास भेजा है. मैं कल सुबह मंत्रशक्ति से आपके अस्त्रों और आपको इतना दिव्य बना दूंगा कि आपकी हार सपने में भी मुमकिन नहीं होगी. अब आप लोग विजय यात्रा की तैयारी कीजिये.
पायु ऋषि के कहने पर दोनों राजा अपनी-अपनी रणनीति और योजना बनाने में लग गए. रातोंरात सेना तैयार कर दूसरे दिन दोनों सुबह ही राजा पायु के सामने थे.
ऋषि पायु ने गंगाजल और कुश लेकर ऋग्वेद के विजयप्रद सूक्त से, एक-एक अस्त्र को दिव्यास्त्र बना दिया. असल में वेद-ऋचा द्वारा स्तुति किए जाने के बाद सभी हथियार देवता सरीखे अजेय बन जाते हैं.
हथियारों को मंत्र की शक्ति देने के बाद पायु दोनों राजाओं को लेकर भरद्वाज के पास पहुंचे और काम पूरा हो जाने की सूचना दी. भरद्वाज ने राजाओं से कहा- अब आप लोग बेखौफ होकर दुश्मन पर चढ़ाई कर दें, आपकी विजय सुनिश्चित है.
मुझे पता है कि आपके शत्रु आपको हराने के बाद विश्राम कर रहे हैं. वे सोच भी नहीं सकते कि आप उनपर इतना शीघ्र आक्रमण कर सकते है. रणनीति कहती है कि यही आक्रमण का श्रेष्ठ समय है. अब तनिक भी देर न करें.
ऋषि भारद्वाज ने आगे कहा- एक बात और! हो सकता है कि असुर कड़ी टक्कर देने लग जायें तो उसकी भी व्यवस्था किए देता हूँ. देवराज इंद्र से अनुरोध करता हूँ कि अवसर पड़ने पर वे आपकी मदद के लिये मैदान में उतर पड़ें.
गुरु का आदेश लेकर अभ्यावर्ती और प्रस्तोक ने असुरों पर जोरदार हमला कर दिया. गुरु ने सच कहा था. सचमुच शत्रु विजय के नशे में मस्त पड़े हुये थे. इस अचानक के हमले ने उन्हें चक्कर में डाल दिया.पर कुछ ही समय में बलवान असुर सावधान हो गये, पूरा दम लगा कर जूझने लगे. आक्रमण का समाचार पा असुरों के दूसरे साथी भी अपनी-अपनी तैयारी के साथ कुछ ही समय में लड़ाई के मैदान में आ डटे.
असुरों को मजबूत होते देख भरद्वाज ऋषि देवराज इंद्र को याद किया, उन्होंने उनकी प्रार्थना की तो देवराज वहां पहुंच गये जहां असुरों से दोनों राजाओं की भयानक जंग जारी थी.
असुरों को अचानक ही तैयारी करनी पड़ी थी इसलिये उनके हथियारों के हमले चूकने लगे. उधर मंत्र से सिद्ध किये दिव्य हथियार अपना तेज दिखा ही रहे थे और जब स्वयं देवराज पहुंच गए तो फिर पूछना ही क्या?
असुरों का सफ़ाया हो गया. असुरों का वधकर देवराज ने उनकी सारी धन संपदा कब्जा कर राजाओं को सौंप दी. दोनों राजाओं ने कुलगुरु भरद्वाज एवं इंद्र का अभिवादन किया और दुश्मन से कब्जायी सारी संपत्ति का गुरु के चरणों में डाल कर चले गए. स्रोत: ऋग्वेद
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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