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इंद्र ने अभिमान में किया शिव अपमान, बृहस्पति ने दिलाया जीवनदानः कार्तिक माहात्म्य, नवां अध्याय

इंद्र ने अभिमान में किया शिव अपमान, बृहस्पति ने दिलाया जीवनदानः कार्तिक माहात्म्य, नवां अध्याय


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राजा पृथु ने पूछा- हे नारदजी आपने कार्तिक मास के व्रत में तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु का निवास बताकर उस स्थान की मिट्टी का पूजन बताया है. अब मैं तुलसीजी के माहात्म्य को सुनना चाहता हूं. तुलसी कहां और कैसे उत्पन्न हुई वह मुझसे कहिए.

नारद बोले- हे राजन एक बार देवगुरू बृहस्पति के साथ देवराज इंद्र कैलाश पर शिवजी के दर्शन को गए. शिवजी ने देवराज की परीक्षा लेने की सोची. उन्होंने एक जटाधारी दिगंबर का रूप धरा और मार्ग पर बैठ गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उस जटाजूट वेष में भी शिवजी बड़े आकर्षक लग रहे थे लेकिन इंद्र उन्हें पहचान नहीं पाए. उन्होंने उनका नाम और परिचय पूछा. जटाधारी दिगंबर ने कहा- मैं शिव का अनुचर हूं. आप अभी अंदर नहीं जा सकते क्योंकि शिवजी अपने स्थान पर नहीं हैं.

इंद्र ने पूछा- कहां गए हैं शिवजी. कई तरह के सवाल करने के बाद उन्होंने दिगंबर से रास्ते से किनारे हटने को कहा लेकिन दिगंबर ने उसे अनसुना कर दिया. वह कुछ सुनता ही न था जैसे. इंद्र बार-बार पूछते रहे पर वह चुप ही रहा.

इंद्र तो देवराज होने और स्वर्ग के ऐश्वर्य के स्वामी होने के अभिमान में चूर थे. उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने व्रज चला दिया. शिवजी ने व्रज समेत इंद्र का हाथ स्तंभित कर दिया. शिवजी क्रोध से तमतमाने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नेत्र विकराल रूप से लाल हो गए जैसे संसार जल उठा हो और उस अग्नि में सब भस्म हो जाएगा. बृहस्पति समझ गए कि अब यदि स्थिति को न संभाला गया तो इंद्र आज भस्म हो जाएंगे. वह शिवजी के चरणों में लोट गए.

उन्होंने इंद्र को भी खींचकर शिवजी के चरणों में लिटा दिया और क्षमा प्रार्थना करने लगे. उन्होंने प्रार्थना की- हे त्रिलोकीनाथ आप अपना क्रोध रोककर इंद्र को अभयदान दें. आपके क्रोध से सब जल जाएगा. आपकी कृपा से ही यह देवराज हैं, यह संसार है. इसकी व्यवस्था न बिगड़ने दें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बृहस्पति के वचन सुनकर महेश्वर बोले- मैं स्वयं को तो रोक लूं पर मेरे नेत्रों से निकले इस क्रोध को कैसे रोकूं? बृहस्पति ने याचना की- हे भक्तवत्सल आप तो शऱणागत की रक्षा किसी भी प्रकार से करते हैं. इंद्र आपके चरणों में पड़े हैं. इन्हें अभय दीजिए.

शिवजी बोले- तुम्हारी स्तुति से मैं प्रसन्न हूं. आज इंद्र समाप्त हो गया होता किंतु तुमने उसे जीवनदान दिलाया है इसलिए आज से तुम्हारा एक नाम जीव भी होगा. मेरे नेत्रों की अग्नि अब इंद्र को पीड़ित नहीं करेगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ऐसा कहकर शिवजी ने अपने माथे से निकले तेज को क्षीरसागर में डाल दिया फिर लीलाधारी भगवान अंतर्धान हो गए. इंद्र और बृहस्पति दोनों भयमुक्त होकर बहुत सुखी हुए.

कार्तिक महात्मय नौंवा अध्याय समाप्त. कथा जारी रहेगी.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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