“अवसर”, पहचान लें तो लाख का नहीं तो खाक का.
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.एक चित्रकार की बड़ी ख्याति थी. उसके चित्रों को दुनियाभर से लोग खरीदने आते थे लेकिन वह चित्र किसे बेचेगा इसका निर्णय भी बहुत सोच-विचारकर करता था.
चित्रकार अब बूढ़ा हो चला था. अब वह ज्यादा काम नहीं कर पाता था. उसने अब विश्राम का निर्णय लिया और अपनी बेहतरीन पेटिंग्स के साथ एक प्रदर्शनी लगाई.
लोगों को पता चला कि अब शायद कोई प्रदर्शनी न लगे तो लोगों की भीड़ उमड़ी. सब उसकी पेटिंग देखना और खरीदना चाहते थे पर वह बेचता सबको कहां था!
जिस हॉल में प्रदर्शनी लगी थी उसमें सौसे अधिक पेटिंग्स सजी थीं. प्रदर्शनी के आखिर में कोने में एक विचित्र पेटिंग लगी थी.
उसमें एक व्यक्ति का चित्र था. जिसके मुंह को पूरी तरह से बालों से ढंक दिया था. चेहरा तो ज्यादा नजर ही नहीं आता था. उसके पैरों में पंख बने थे और पेंटिंग का नाम दिया गया था- अवसर.
जिस प्रदर्शनी में एक से एक पेंटिग्स लगे हों वहां कोने में लगी ऐसी विचित्र पेंटिंग को कौन देखे. उधर ज्यादा लोग आते भी नहीं थे. आए भी तो सरसरी निगाह से देखा और चले गए.
एक किशोरावस्था की लड़की उस पेंटिग के पास आकर ठहर गई. उसने उसे गौर से देखा. कई बार देखा पर समझ नहीं पाई. उसका कौतूहल बढ़ता रहा. वह उस पेटिंग को देखकर समझने का प्रयास करती रही.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.
चित्रकार यह सब दूर से देख रहा था. वह वहां चला आया. लड़की ने पूछा- यह पेंटिंग कुछ अलग है. पर मुझे समझ नहीं आ रहा. आपने इसका नाम इतना सुंदर दिया है-अवसर. आखिर क्यों?
चित्रकार ने कहा- हां यह अवसर ही तो है.
लड़की ने पूछा- आप मेरे पास स्वयं आए इससे तो स्पष्ट है कि यह पेंटिंग बहुत खास है. इसमें आप कुछ विशेष कह रहे हैं. आपने अवसर का मुंह ढंक क्यों दिया है?
चित्रकार ने कहा- प्रदर्शनी की तरह अवसर हर मनुष्य के जीवन में आता है. कई बार आता है और उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है किंतु सामान्य मनुष्य उस अवसर को पहचान नहीं पाता. इसलिए वे जहां हैं वहीं पड़े रह जाते हैं.
जो अवसर को पहचान लेते हैं उसका उपयोग कर लेते हैं वे जीवन में कुछ विशेष कार्य कर जाते हैं. प्रदर्शनी के अंत में मैंने इसे रखा क्योंकि यहां तक सभी आएंगे नहीं, देखेंगे नहीं समझेंगे नहीं.
वास्तव में ये सबके लिए होते भी नहीं. तुम आईं, देखा और समझने का प्रयास करती रही तो मुझे लगा कि तुम्हें इसके बारे में बताना चाहिए.
लड़की बड़ी खुश हुई यह जानकर. उसने चित्रकार से पूछा- आपने कंधों की जगह इसके पैरों में पंख क्यों बनाए, कोई विशेष बात?
चित्रकार ने बताया- जो अवसर निकल गया वह कभी दोबारा नहीं आता. निकल चुके अवसर के लिए छटपटाना व्यर्थ है वैसे ही जैसे किसी को पैरों में पंख मिल जाएं तो भी वह उड़ नहीं सकता. सजग रहो और नए अवसर की प्रतीक्षा करो.
लड़की को सारी बातें समझ में आ गई थीं. उसके चेहरे की चमक बता ही थी कि उसने जीवन की किसी उलझन का रास्ता खोज लिया है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.
चित्रकार ने कहा- मैं अपने अनुभव से कहता हूं कि तुमने शायद किसी मुश्किल का हल पा लिया है. तुम्हारे हौसले ऐसे ही बढ़े रहें इसके लिए मैं यह तस्वीर तुम्हें भेंट करता हूं. तुम इसकी योग्य पात्र हो.
कितनी सुंदर बात है. अवसर हमारे जीवन में दस्तक देते हैं. हम उन्हें पहचान नहीं पाते. इसलिए जीवन में ऐसे मित्र और दूरदर्शी शुभचिंतक बनाइए जो आपको सही समय पर सही मार्गदर्शन दे सकें.
कुरुक्षेत्र में यदि श्रीकृष्ण न होते तो अर्जुन ने इतिहास में अमर होने का अवसर गंवा दिया होता. ऐसा नहीं है कि दोबारा युद्ध कभी होता ही नहीं क्योंकि दुर्योधन की दुष्टता उसे युद्ध के लिए किसी न किसी दिन विवश कर ही देती किसी छोटे युद्ध में दोनों में से कोई मारा ही जाता.
पर कुरुक्षेत्र के युद्ध में गांडीव का प्रयोग कर अर्जुन को धर्मरक्षक बनने का गौरव मिला.
किसी अऩ्य युद्ध में तो वह अपने सम्मान की लड़ाई लड़ता, मारता या स्वयं मर जाता. आवश्यक है कि आप श्रीकृष्ण की संगति में रहें. वीर तो भीष्म भी थे पर किस काम की वीरता!
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