निर्जला एकादशी व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत कथा
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है? कृपा करके इसका विस्तार से वर्णन कीजिए।”
भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! वर्षभर में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, परंतु इनमें ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी सबसे श्रेष्ठ और अत्यंत पुण्य देने वाली है। इसे ‘निर्जला एकादशी’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें जल तक का त्याग किया जाता है। इस एकमात्र एकादशी के व्रत से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है।”

भीमसेन और निर्जला एकादशी

पांडु पुत्र भीमसेन को भोजन के प्रति अत्यधिक भूख रहती थी। वे अन्य भाइयों—युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव—के साथ एकादशी का व्रत करना चाहते थे, परंतु भूख के कारण उपवास करना उनके लिए अत्यंत कठिन था।
इससे चिंतित होकर उन्होंने महर्षि वेदव्यास जी से पूछा, “हे पितामह! मेरे सभी भाई एकादशी का व्रत करते हैं, परंतु मुझसे भूखा नहीं रहा जाता। कृपा करके ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे बिना सभी एकादशियाँ किए भी मुझे उनका फल प्राप्त हो सके।”
वेदव्यास जी बोले, “हे भीम! यदि तुम एक ही व्रत करना चाहते हो, तो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी का निर्जल व्रत करो। इसमें अन्न तो क्या, जल का भी त्याग करना होता है।”
भीमसेन ने आश्चर्य से कहा, “हे महर्षे! मैं भूख से व्याकुल रहता हूँ, मेरे लिए जल के बिना रहना कैसे संभव होगा?”
तब वेदव्यास जी ने समझाया, “यदि तुम स्वर्गलोक की कामना करते हो और पापों से मुक्ति चाहते हो, तो इस एक दिन का निर्जल व्रत अवश्य करो। सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक जल का त्याग करना ही इसका नियम है। केवल आचमन के लिए थोड़ा जल लिया जा सकता है, अन्यथा नहीं।”
उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है और वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
यह सुनकर भीमसेन ने संकल्प लिया और जीवन में केवल इसी एक निर्जला एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करने लगे।
व्रत का माहात्म्य
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत ब्रह्महत्या, चोरी, मद्यपान, झूठ, गुरुद्रोह और अन्य सभी महापापों को भी समाप्त करने की शक्ति रखता है।
इस दिन किया गया स्नान, दान, जप और होम अक्षय फल देने वाला होता है। जो व्यक्ति इस दिन अन्न का सेवन करता है, वह शास्त्रों के अनुसार पाप का भागी होता है, जबकि उपवास करने वाला व्यक्ति भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करता है।
व्रत विधि
निर्जला एकादशी का व्रत दशमी से ही नियमों के साथ प्रारंभ होता है। दशमी के दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करना चाहिए।
एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु का संकल्पपूर्वक पूजन करें। दिनभर अन्न और जल का पूर्ण त्याग करें। भगवान केशव की पूजा पुष्प, तुलसी, धूप, दीप और फल से करें। रात्रि में जागरण और भजन-कीर्तन करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।
द्वादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें और ब्राह्मणों को जल, अन्न, वस्त्र, गौ, छाता, शय्या और दक्षिणा सहित दान देकर संतुष्ट करें। इसके बाद स्वयं भोजन करें।

निर्जला एकादशी का फल

शास्त्रों में कहा गया है कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को स्वर्ग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यह व्रत इतने पुण्य का फल देता है कि जैसे हजारों वर्षों की तपस्या और तीर्थयात्रा का फल एक साथ मिल गया हो।
जो व्यक्ति श्रद्धा से इस एकादशी का पालन करता है, वह अपने साथ-साथ अनेक पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। उसके पास यमदूत नहीं जाते, बल्कि अंत समय में विष्णुदूत उसे भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं।
कहा जाता है कि भीमसेन द्वारा किए गए इस व्रत के कारण यह एकादशी ‘भीमसेनी एकादशी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुई।
इस प्रकार निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत कठिन होते हुए भी अत्यंत फलदायी है। यह मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध कर अंततः भगवान श्रीहरि की परम कृपा प्रदान करता है।

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