June 15, 2026

योगिनी एकादशी व्रत कथा

योगिनी एकादशी व्रत कथा
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! मैंने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का माहात्म्य सुना है। अब कृपा करके आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम और उसका महत्व बताइए।”
भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘योगिनी एकादशी’ कहलाती है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली, इस लोक में सुख देने वाली और परलोक में मोक्ष प्रदान करने वाली अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि है।”

हेममाली की कथा
प्राचीन काल में स्वर्गलोक की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नामक राजा राज्य करता था। वह भगवान शिव का परम भक्त था और प्रतिदिन शिव पूजन करता था। उसके सेवा-कार्य में एक यक्ष माली था, जिसका नाम हेममाली था। उसका कार्य भगवान शिव के पूजन के लिए पुष्प लाना था।
हेममाली की अत्यंत सुंदर पत्नी थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया, परंतु पत्नी के मोह और कामभाव में इतना आसक्त हो गया कि वह समय पर पुष्प लेकर राजा कुबेर के पास नहीं पहुँचा और अपनी पत्नी के साथ रमण में लीन हो गया।
इधर राजा कुबेर उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। जब वह देर तक नहीं आया तो सेवकों से कारण पूछा गया। सेवकों ने बताया कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ भोग-विलास में लीन है।
यह सुनकर कुबेर अत्यंत क्रोधित हुए। जब हेममाली उपस्थित हुआ, तो राजा ने उसे शाप देते हुए कहा, “हे अधर्मी! तूने भगवान शिव की पूजा में विघ्न डाला है, इसलिए तू स्वर्ग से च्युत होकर मृत्युलोक में जा और कुष्ठ रोग से ग्रस्त होकर अत्यंत दुःख भोग।”
क्षण भर में हेममाली स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके शरीर में भयंकर कुष्ठ रोग हो गया और उसकी पत्नी भी उससे अलग हो गई। वह अत्यंत कष्टपूर्ण जीवन जीने लगा, भूख-प्यास से व्याकुल होकर जंगलों में भटकने लगा।
बहुत समय बाद भटकते-भटकते हेममाली महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँचा। वह अत्यंत दीन अवस्था में था और ऋषि के चरणों में गिर पड़ा।
महर्षि मार्कण्डेय ने करुणा से पूछा, “हे जीव! तूने ऐसा कौन-सा पाप किया है जिससे तेरी यह दशा हुई है?”
हेममाली ने अपने कर्मों की पूरी कथा सुनाई।
तब महर्षि बोले, “हे यक्ष! यदि तू आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करेगा, तो तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और तू अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेगा।”

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व्रत का प्रभाव
ऋषि के वचनों को सुनकर हेममाली ने पूर्ण श्रद्धा से योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसने नियमपूर्वक उपवास, भगवान विष्णु का पूजन, नाम-स्मरण और भक्ति भाव से साधना की।
इस व्रत के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए, उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया और वह पुनः अपने दिव्य यक्ष स्वरूप में लौट आया। बाद में वह अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा और स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।

योगिनी एकादशी का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसका फल अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान बताया गया है।
यह व्रत न केवल शारीरिक और मानसिक पापों का नाश करता है, बल्कि मनुष्य को मोह, आसक्ति और अधर्म के बंधनों से भी मुक्त करता है। इसके प्रभाव से प्राणी मृत्यु के बाद भटकने से बच जाता है और स्वर्ग या विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
व्रत विधि
योगिनी एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके शरीर पर तिल या मिट्टी का लेप करना शुभ माना गया है। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और घी का दीपक जलाकर भक्ति भाव से आराधना करनी चाहिए।
दिनभर उपवास रखते हुए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। रात्रि में जागरण और भजन-कीर्तन करना श्रेष्ठ है।
द्वादशी के दिन स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन और दान-दक्षिणा देकर ही स्वयं भोजन करना चाहिए। योगिनी एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का पालन करता है, उसके जीवन से दुःख, रोग और पाप समाप्त हो जाते हैं और अंततः उसे भगवान विष्णु की परम कृपा प्राप्त होती है।

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