Advertisement728 × 90

दो पीढ़ियों के बीच बढ़ती खाई, कैसे हो भरपाई! बच्चे आपकी बात नहीं मानते?

दो पीढ़ियों के बीच बढ़ती खाई, कैसे हो भरपाई! बच्चे आपकी बात नहीं मानते?

Lord-Ganesha-and-Parvati-maa

पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रश्नावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें. आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. यहां शेयर करने योग्य अच्छी-अच्छी धार्मिक पोस्ट आती है जिसे आप मित्रों से शेयर कर सकते हैं.

इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.बहुत से लोगों के प्रश्न आ रहे हैं कि बच्चे सुनते नहीं है. वे हाथ से निकल रहे हैं. उन्हें कैसे समझाया जाए. जिन बच्चों के सहारे जीवन की आस थी अगर वही रास्ते पर नहीं रहे तो जीवन का क्या लाभ!

इसके दो कारण हो सकते हैं- पहला, आप उस भाषा में सुना नहीं पा रहे जिसमें बच्चे गंभीरता से सुन सकें और मानने को तैयार हों. दूसरा, आपने आशाओं की रस्सी बहुत कसकर बांध दी है. आज इसी विषय पर बात करते हैं.

एक बात आज किशोरावस्था में कदम रखते बच्चों के लिए.

किशोरावस्था एक ऐसी उम्र है जहां शरीर के साथ-साथ दिमाग भी विकास के चरम पर होता है. कद-काठी, बल-बुद्धि-आवेश सब तेजी से बढ़ रहे होंते. कभी आपने अपने घर में तोरी, घीये या मनीप्लांट जैसा कोई पौधा लगाया है जो लत्तर या बेल पर बढ़ता है?

लगाया हो तो याद करिए, उसे सबसे ज्यादा सहेजने की जरूरत तब हुई होगी जब वह तेजी से बढ़ रहा होगा. उसे आप उन रस्सियों पर रोज ठीक करते होंगे क्योंकि हर रात वह उन रस्सियों से दूर भागता होगा.

आप ऐसा क्यों करते हैं? क्योंकि आप जानते हैं कि अगर आज यह इन रस्सियों के सहारे नहीं चला तो कुछ ही दिन में जमीन पर गिरेगा और सड़-गल जाएगा. इसकी तरक्की तो तभी है जब यह रस्सियों को कसकर चले. तभी यह फल देगा नहीं तो गल जाएगा.

माता-पिता, घर के बड़े लोगों, गुरूजनों आदि की बात कभी बहुत चुभ जाए तो उनके प्रति विद्वेष रखने के स्थान पर कभी इस बात को याद कर लीजिएगा,यकीन मानिए ऐसे परिपक्व इंसान के रूप में आप आगे बढेंगे कि एक दिन आप लोगों को मोटिवेट कर सकें.

श्रेष्ठजनों के अनुभव पारस के समान हैं. उनके स्पर्श से ही आप सोना बनेंगे. आपको एक छोटी सी कथा सुनाता हूं.

यदि आप किशोरवय हैं या युवावस्था में हैं तो गौर से पढ़िएगा. यदि आपके बच्चे किशोरावस्था मैं हैं तो इसे समझने का प्रयास करिएगा. जेनेरेशेन गैप यानी दो पीढ़ियों के बीच के उम्र के फासले को खाई नहीं बनने देना चाहिए.

भगवान बुद्ध का ज्ञान इतना व्यवहारिक था कि बहुत से राजा-राजकुमार बुद्ध से जुड़ते जा रहे थे. राजकुमार अभय पर बुद्ध का प्रभाव तो काफी था पर राजपुत्र होने का अभिमान मन में ऐसे फांस की तरह बैठा था जो समय-समय पर उन्हें परेशान करता ही था.

श्रद्धा जब पूरी न हो तो वह कई बार भीतर ही भीतर कुलबुलाती ही है.

अभय ने सोचा कि आज बुद्ध को उनके ही ज्ञान में फंसाया जाए. अभय ने गौतम बुद्ध से प्रश्न किया- क्या श्रमण गौतम कभी किसी के प्रति कठोर वचन कहते हैं?

अभय ने सोच रखा था कि यदि बुद्ध कहें कि कि नहीं मैंने कभी किसी के प्रति कठोर वचन नहीं कहे तो वह उन्हें झूठा साबित कर देगा क्योंकि एक बार बुद्ध ने अभय के सामने देवदत्त को नरकगामी कहा था.

और यदि बुद्ध स्वीकारते हैं कि हां वह भी कठोर वचन कहते हैं तो उनसे सबके सम्मुख ही यह प्रश्न कर दूंगा कि जब आप कठोर शब्दों का प्रयोग करने से स्वयं को रोक नहीं पाते, तब दूसरों को ऐसा उपदेश कैसे देते हैं?

उसने बुद्ध को घेरने और उन्हें नीचा दिखाने की ठान रखी थी.बुद्ध ने अभय के प्रश्न का आशय जान लिया.

गौतम बुद्ध बोले- राजकुमार आपके इस प्रश्न का उत्तर न तो हां में दिया जा सकता है और न नहीं में. इसे अलग तरीके से समझाना होगा. अभय की गोद में उस समय उनका पुत्र बैठा खेल रहा था.

बुद्ध ने पूछा- राजकुमार, यदि आपकी या सेविका की नजर बचाकर अनजाने में यह बालक अपने मुख में कांच का एक टुकड़ा डाल ले, तब तुम क्या करोगे?’

अभय ने कहा- भंते मैं उसे निकालने का प्रयास करूंगा.

बुद्ध ने प्रश्न किया- यदि वह आसानी से न निकल सकता हो तो क्या करोगे, छोड़ दोगे या फिर भी कुछ करोगे?

अभय ने कहा- भंते छोड़ कैसे दूंगा. वह कांच तो इसके लिए हानिकारक है. उसे निकालना ही होगा. मैं बाएं हाथ से उसका सिर पकड़कर दाहिने हाथ की उंगली को टेढ़ा करके उसे निकालूंगा.

यह तो काफी बल प्रयोग जैसे हो जाएगा. उस बालक में मुख में कांच पहले से ही है. यदि इस कारण उसके मुख से खून निकलने लगे तो?- बुद्ध का अगला प्रश्न था.

अभय अधीर होकर बोला- तो भी मेरा यही प्रयास रहेगा कि वह कांच का टुकड़ा किसी न किसी तरह बाहर निकल आए. मैं उसे निकालकर रहूंगा.

पर ऐसा क्यों, तुम वह कांच का टुकड़ा इस बालक के मुख से निकालने के लिए इतना श्रम इतना हठ क्यों करोगे? ‘

अभय ने कहा- ‘इसलिए भंते क्योंकि यह मेरी संतान है. इसके प्रति मेरे मन में प्रेम है. किसी भी प्रकार से इसका अहित हो रहा हो तो मैं चुपचाप नहीं देख सकता. मैं उसे दूर करने का हर प्रकार से प्रयास करूंगा.बुद्ध बोले- राजकुमार, ठीक इसी तरह जिस वचन के बारे में मैं जानता हूं कि यह मिथ्या या अनर्थकारी है और उससे दूसरों के हृदय को ठेस पहुंचती है, तब मैं उसका कभी उच्चारण नहीं करता.

इसी तरह जो वचन सत्य और हितकारी होते हैं, भले ही वह दूसरों को अप्रिय लगते हों, फिर भी मैं उन्हें कहता हूं.

इसका कारण वही है, मेरे मन में सभी प्राणियों के प्रति अनुकंपा है. उसका हित किसी भी प्रकार हो इसका प्रयास करना ही चाहिए. यही मानव धर्म है.

जीवन आवागमन का दोतरफा मार्ग यानी two way traffic है. कोई भी मार्ग यह नहीं कह सकता कि दूसरे की उपयोगिता कम है. बच्चों की जितनी जिम्मेदारी है उतनी ही समझदारी बड़ों को भी दिखानी होगी.

आप परिवार के बड़े हैं तो कई बार आपको भी उस बेल के मन का भाव समझना होगा. यदि उस बेल में उत्साह ही न हो कि आपके द्वारा लगाई रस्सियों पर आपकी आशा से अधिक फैल जाए तो फिर रस्सियों पर ही बढ़कर ही कुछ हासिल नहीं कर लेगा.

उसकी ऊर्जा को दबाना नहीं है, वह ऊर्जा सही दिशा में रहे बस इसके लिए अलर्ट रहना है. आप जिस चीज को जितना दबाएंगे वह उतना ही ज्यादा उभरेगा, प्रतिरोध में उठेगा.

यही संसार का नियम है और इसी कारण दूरियां बढ़ती हैं. उम्र और अनुभव के साथ आपका हृदय भी बड़ा होना चाहिए.

क्या यह कथा उपयोगी लगी? बताइएगा जरूर,क्योंकि आपके फीडबैक से ही मुझे सुधार करने का, सीखने का अवसर मिलता है. संसार में एक विद्यार्थी की तरह आया हूं और विद्यार्थी की तरह ही विदा होना है. हर दिन सीखने का…
-राजन प्रकाश

प्रभु शरणम् की सारी कहानियां Android व iOS मोबाइल एप्प पे पब्लिश होती है। इनस्टॉल करने के लिए लिंक को क्लिक करें:
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. फेसबुक पेज लाइक करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा. https://www.facebook.com/PrabhuSharanam कथा पसंद आने पर हमारे फेसबुक पोस्ट से यह कथा जरुर शेयर करें.

धार्मिक चर्चा में भाग लेने के लिए हमारा फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें. https://www.facebook.com/groups/prabhusharnam

ये भी पढ़ें-
किसी को डराने वाले मैसेज भेजे या आपको ऐसा मैसेज मिला है? तो जरूर पढ़ें

आपका आत्मविश्वास किसी कारण हिला है तो इसे पढ़ें, संभव है आत्मविश्वास से भर जाएं आप.

“जरा सा पाप ही तो है, इतना क्या सोचना?”

आप मांसाहार करते हों या न करते हों, इस कथा को एकबार पढ़ें जरूर

भगवान मैं शर्मिंदा हूं, जो प्राप्त है, पर्याप्त है. मुझे और कुछ नहीं मांगना

error: Content is protected !!