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भजन-कीर्तन, सत्संग में इतना जाते हैं फिर भी कष्ट नहीं मिटते! पढ़ें जरूर.

भजन-कीर्तन, सत्संग में इतना जाते हैं फिर भी कष्ट नहीं मिटते! पढ़ें जरूर.

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि कथा-प्रवचन, भजन-सत्संग में रमे लोगों में भी सारे छल-कपट प्रपंच भरे हैं, बल्कि उनमें तो कुछ ज्यादा ही है.

बात सनातन आस्था से जुड़ी है इसलिए इसे टाल देना ठीक नहीं. इसे समझने की जरूरत है क्योंकि अक्सर नादानी में सनातनी ही सनातन परंपराओं पर प्रश्न उठा देते हैं और तथाकथित धर्मनिरपेक्षों को मजे लेने का मौका मिल जाता है.

आपके मन में कथा-सत्संग,भजन-पूजन के प्रति शंका का भाव अगर एक मिनट के लिए भी कभी मन में आया हो तो इसे धैर्य से पढ़िएगा. इसी बहाने घर-घर की एक समस्या पर आज विचार कर लेंगे जो शायद आप भी झेल रहे हों.

किसी युवा ने मुझसे प्रश्न किया- मेरी पत्नी बड़ी धार्मिक विचार की हैं. पूजा-पाठ करती हैं. पास में एक भजन-सत्संग ग्रुप है उसमें नियमित तौर से जाती हैं.

माता-पिता भी धार्मिक स्वभाव के हैं. कीर्तन आदि में जितना संभव,उतना जाते हैं. धार्मिक चैनलों पर दिनभर कथा-प्रवचन सुनते रहते हैं. घर को बाहर से देखें तो लगेगा किसी आश्रम में ही हैं लेकिन अंदर का कलह ऐसा कि पूछिए मत.

मेरे पास समय नहीं है. ऑफिस के लिए आते-जाते समय आपकी लिखी कथाएं प्रभु शरणम् पर पढ़ लेता हूं. मंदिर के सामने से गुजरता हूं तो रूककर प्रणाम कर लेता हूं. समय भी नहीं है.सोशल मीडिया आदि में समय निकल जाता है.

पूरा परिवार कथा सत्संग में लगा है फिर भी घर युद्ध का मैदान बना हुआ है. आप कहते हैं कि सज्जनों के साथ मित्रता और सत्संग दोनों से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं. फिर मेरे घर में क्यों नहीं? सत्संग-भजन सब ढ़कोसले हैं.

बल्कि वहीं पर आकर लोग एक दूसरे के घर के झगड़ों को डिस्कस करते होंगे और आज झगड़े में नया क्या करना है- वह सीखते होंगे.

निराश व्यक्ति अंततः सारी झल्लाहट उसी पर निकालता है जहां से प्रतिरोध का स्वर नहीं आएगा. अक्सर धर्म-आध्यात्म को ही लोग कोसते हैं क्योंकि उससे उन्हें आशा सबसे अधिक होती है. पहले एक छोटी सी कथा सुनाता हूं.

राजा जनक बड़े ब्रह्मवेत्ता थे. उनके पास ज्ञानियों का जमावड़ा रहता था. एक ऋषि ने अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए जनक के पास भेजा. ऋषिपुत्र जनक के पास आया.

जनक पारखी थे, उस बालक के हाव-भाव से उसे पूरा समझ गए.

जनक ने महल में ही उसके रहने का प्रबंध कराया जो उसने स्वीकार लिया. अगले दिन जनक ने उससे आने का कारण पूछा.

ऋषिपुत्र ने कहा- महाराज मैंने सारे शास्त्र पढ़ लिए, संसार का ज्ञान प्राप्तकर लिया.

जनक ने पूछा- इस ज्ञान का क्या निचोड़ निकला, ऋषिपुत्र?

ऋषिपुत्र ने कहा- इस ज्ञान का यही निचोड़ समझा कि यह संसार मिथ्या है. दुख औऱ मृत्यु का सामना तो जीवन में सबको करना ही है. कुछ भी स्थिर नहीं है. ब्रह्म क्या है? मुझे ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा है. इसलिए आपको पास आया हूं.

एक बालक के मुख से ऐसी गंभीर-गंभीर बातें सुनकर महाराजा जनकजी समझ गए कि इसने शास्त्र पढ़ तो अच्छा लिया है, समझा नहीं है. जनकजी उसे उपदेश देने लगे.

तभी एक सेवक ने आकर कहा- महाराज महल में आग लग गई है.

जनक ने सेवक की बात सुनी और लापरवाही से टाल दी जैसे साधारण सी बात इस इतना क्या बल देना. वह उपदेश देने में लगे रहे.थोड़ी देर में वही सेवक फिर लौटा. वह पहले ले ज्यादा व्याकुल था.

उसने जनकजी को आग का पूरा ब्योरा दिया कि आग बढ़ती-बढ़ती महल में कहां तक पहुंच चुकी है, क्या-्क्या जलाकर खाक कर दिया है.

सेवक ने कहा- महाराज आग आपके अपने शयनकक्ष तक पहुंच चुकी है. प्रयास हो रहे हैं पर आग बुझती ही नहीं.

जनक ने कहा- यह चिंता की बात तो है परंतु तुम अभी जाओ. आग का क्या है, अपना प्रकोप दिखाएगी. मेरी प्रिय वस्तुए जला जाएगी पर यहां उससे ज्यादा आवश्यक कार्य हो रहा है.

यहां ब्रह्मज्ञान की चर्चा हो रही है. इसमें आग को बाधक नहीं बनना चाहिए. संसार मिथ्या है. आग को अपना काम करने दो, हमें अपना काम करने दो.

जनक स्थिरभाव से रहे और उस ऋषिकुमार को उपदेश देना जारी रखा.

सेवक बीच-बीच में बार-बार आता और विनम्रता से आग का ब्योरा देकर जाता. बार-बार आग की बात सुनकर ऋषिकुमार का ध्यान ब्रह्म उपदेश से हटकर आग की गति पर जा टिका.

जनकजी उसके सामने ब्रह्म व्याख्या कर रहे थे किंतु वह तो अंदाजा लगा रहा था कि आग अब कहां तक पहुंची होगी.

थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा और घबराते हुए बोला- महाराज, क्षमा करें. अब तो आग अतिथिगृह तक पहुंच गई है जहां ऋषिपुत्र ठहरे हैं.

इस पहले कि जनक कुछ उत्तर देते वह ऋषिपुत्र खड़ा हुआ और घबराते हुए बोला- महाराज मेरी तो लंगोट और धोती टंगी है, कक्ष में. मैं उसे उतार लाता हूं, कहीं जल न जाए. ब्रह्मचर्चा तो होती रहेगी.जनकजी बोले- ऋषिकुमार तुम कहते हो कि संसार के सारे शास्त्र पढ़कर समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है. क्या यही ज्ञान है? इसी के आधार पर संसार को मिथ्या कह रहे हो. तुम्हारा मोह तो खूंटी पर लटके साधारण वस्त्रों से लिपटा है.

मोह ही अज्ञान की वह रस्सी है जिसमें सारा ज्ञान उलझकर छटपटाता रह जाता है. कुछ प्राप्त करने के स्थान पर कुछ प्रदान करने की भावना से बिताया एक दिन प्राप्ति की इच्छा वाले सौ दिनों से ज्यादा सुखमय होता है. यही ब्रह्म सत्य है.

तो अब आते हैं बंधु की बात पर. मित्रवर! आपके परिजन तन से तो सत्संग में होते हैं पर मन उनका घर की खूंटी में टंगा रहता है.

उनके कानों ने बातें सुन तो लीं आनंदित भी हुए पर उसे आगे हृदय तक भेजा नहीं. इसलिए उनका सत्संग ऋषिपुत्र जैसा ही है जो लंगोट और धोती तक ही उलझा है.

आत्मा तक ज्ञान को पहुंचने ही नहीं दे रहे तो फिर वह आत्मा को निर्मल करेगा कैसे?

दोष सत्संग का नहीं है. न दोष सोशल मीडिया का है. दोष हमारा है कि हम वहां से लेकर क्या आ रहे हैं? बहुत से लोग मंदिरों में जाते हैं टाइमपास करने, कुछ जूते चुराने, कुछ मुफ्त का प्रसाद खाने और कुछ अभद्रता करने.

इसका अर्थ यह नहीं हो गया कि मंदिर इसका ही स्थान है. ज्यादातर लोग मंदिर मानसिक शांति और नई आशा की आस से जाते हैं और उन्हें वह मिलती भी है. जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तीन्हिं देखि तैसी.

अब आपकी भी बात कर लेते हैं. संभव है कि घर में य़ुद्ध की मुद्रा में रहने वाले लोग इतने ज्यादा हैं कि उन सेनानायकों के सामने आप शस्त्र उठाने की हिम्मत न कर पा रहे हों परंतु गति आपकी भी वही है.

आपने कहा कि बस जब मौका मिले चलते-फिरते पढ़ लेता हूं. मंदिर दिख गए तो प्रणाम कर लेता हूं, बाकी का खाली समय सोशल मीडिया में निकल जाता है.

यदि उन्हें सत्संग का लाभ नहीं हो रहा तो आपको भी फेसबुक, व्हॉटसएप्प का क्या लाभ हो रहा है कहना मुश्किल है.

आप अपनी जीवनचर्या का गहराई से अवलोकन करिएगा, आप पाएंगे कि जब से आप इन चीजों में ज्यादा समय देने लगे हैं आपका प्रोफेशनल जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. आपकी झल्लाहट बढ़ी होगी. ऑफिस में जो लोग आपके अजीज हुआ करते थे अब उनसे कट रहे हैं आप.

आप एक बार स्वयं प्रयास करके देखिए घर की व्यवस्था दुरुस्त करने का. सत्संग मंडली या टीवी पर प्रवचन दे रहे बाबा की जिम्मेदारी नहीं है आपका परिवार.

एक प्रयास आप स्वयं भी करके देखिए. शायद सत्संग में वे यही सीख कर आए हों कि घर का भर्ता यानी सबके लिए पेट भरने का प्रबंध करने वाला जो राह दिखाए उस पर चलना चाहिए. भर्ता तो उन्हें कोई राह ही नहीं दिखा रहा. झल्लाकर बस कह रहा है कि दिल करता है घर ही छोड़ दूं.

छोड़ने से नहीं जोड़ने की बात कहने से बनेगी बात.

-राजन प्रकाश

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