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ईश्वर की लीला समझने में चूक तो नहीं कर रहे

ईश्वर की लीला समझने में चूक तो नहीं कर रहे

हम ईश्वर की लीला को समझने में भूल करते हैं फिर सोचते हैं कि ईश्वर है ही नहीं. सब कपोल कल्पनाएं हैं. ईश्वर की लीला पर संदेह है तो इसे अंत तक पढ़ें, समझें. शायद संदेह बाकी न रहे.

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धार्मिक और ज्ञानप्रद कथाओं के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें.ईश्वर की कृपा एक शक्ति की तरह होती है. हर कोई उसे संभाल नहीं सकता जैसे दौलत और ताकत को सभी नहीं संभाल पाते. इसलिए भगवान को जिस पर कृपा करनी होती है, पहले उसे ठोक-बजाकर तैयार करते हैं. इसके बाद होती है उनकी कृपा. यही है- ईश्वर की लीला.

तो यदि सब कुछ अच्छा करने के बाद भी जब हमारे काम बिगड़ते जा रहे हों तब भी भरोसा मत छोड़िए. बल्कि यह समझिए कि शायद ईश्वर ने हमारे लिए कुछ बेहतर सोचा है. अच्छे कर्म कभी भी बेकार नहीं जाते, उनका फल मिलता ही है. अच्छे कर्मों करते हैं तो धैर्य भी रखिए. तत्काल फल की आशा में बेचैन न हों.ईश्वर चाहते हैं कि इसे आप उनके खजाने में कुछ दिन जमा रखें ताकि उसपर कुछ ब्याज बढ़ जाए और आपको ब्याज सहित लौटाएं. यह है ईश्वर की लीला. इस विषय पर बात करेंगे उससे पहले एक कथा सुनाना हूं. इससे बात समझने में सरलता हो जाएगी. धैर्य के साथ अंत तक पढ़िएगा.

यह एक बहुत पुरानी बात है. किसी नगर के समीप एक जंगल में तीन वृक्ष थे. वे तीनों अपने सुख-दुःख और सपनों के बारे में एक दूसरे से बातें किया करते थे.

एक दिन तीनों अपने सपने के बारे में चर्चा करने लगे.

पहले वृक्ष ने कहा- मैं खजाना रखने वाला बड़ा संदूक बनना चाहता हूं. मेरे भीतर हीरे-जवाहरात और दुनिया की सबसे कीमती निधियां भरी जाएं. मुझे बड़े कलात्मक तरीके से सजाया जाए. नक्काशीदार बेल-बूटे बनाए जाएं, दुनिया मेरी खूबसूरती को निहारे, ऐसा मेरा सपना है.

दूसरे वृक्ष ने कहा- मैं तो एक विशाल जलयान बनना चाहता हूं. बड़े-बड़े राजा मुझपर सवार होकर दूर देश की यात्राएं करें. मैं अथाह समंदर में हिलोरें लूं, मेरे भीतर सभी सुरक्षित महसूस करें और मेरी शक्ति पर सबको भरोसा हो, मैं यही चाहता हूं.

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अंत में तीसरे वृक्ष ने कहा- मैं तो इस जंगल का सबसे बड़ा और ऊंचा वृक्ष ही बनना चाहता हूं. लोग दूर से ही मुझे देखकर पहचान लें. वे मुझे देखकर ईश्वर का स्मरण करें और मेरी शाखाएं स्वर्ग तक पहुंचें. मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ वृक्ष ही बनना चाहता हूं.

ऐसे ही सपने देखते-देखते कई सारे साल गुज़र गए. उन्हें विश्वास था कि कभी न कभी दिन उनका सपना पूरा जरूर होगा. उन्हें ईश्वर की लीला की प्रतीक्षा थी.

एक दिन उस जंगल में कुछ लकड़हारे आए. उनमें से जब एक ने पहले वृक्ष को देखा तो अपने साथियों से कहा- इस वृक्ष को देखो. इसे बढ़ई को बेचने पर बहुत पैसे मिलेंगे. पैसे के लिए वे पहले वृक्ष को काटने लगे.आश्चर्य की बात या ईश्वर की लीला देखिए कि आरी चलाई जा रही है फिर भी वह वृक्ष बड़ा खुश था. उसका तो जैसे सपना पूरा होने वाला था. उसने सुना कि उसे बढ़ई को बेचने के लिए काटा जा रहा है तो उसे न जाने क्यों ऐसा यकीन हो गया कि बढ़ई उससे खजाने का बक्सा ही बनाएगा.

इसके बाद लकड़हारों ने दूसरे वृक्ष का मुआयना किया और आपस में चर्चा करके एक निष्कर्ष पर पहुंचे. लकड़हारों के लीडर ने कहा- यह वृक्ष भी लंबा और मजबूत है. मेरे ख्याल से ऐसे पेड़ जहाज के लिए सबसे अच्छे रहते हैं. इससे लंबा और मजबूत जहाज बनेगा. मैं इसे जहाज बनाने वालों को बेचूंगा, वहीं से अच्छे दाम मिलेंगे.

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दूसरा वृक्ष भी खुश था. ईश्वर की लीला देखिए उसका चाहा भी पूरा होने वाला था.

अब लकड़हारे तीसरे वृक्ष के पास आए. मुआयना करने लगे पर यह क्या जहां दूसरे वृक्ष खुश थे, वहीं उनका तीसरा मित्र तो  भयभीत हो गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वह दुखी इसलिए था क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे काट दिया गया तो उसका सपना पूरा नहीं हो पाएगा.

दल में से एक लकड़हारा बोला- इस वृक्ष से क्या बनेगा कुछ समझ नहीं आ रहा. किसे बेचा जाए इसका निर्णय भी नहीं कर पा रहे. वैसे मुझे कोई खास चीज बनानी नहीं है इसलिए इसे तो मैं ले लेता हूं. बाद में तय करेंगे कि इसका क्या करना है. बहरहाल इसे आज काट तो लेते ही हैं. कौन बार-बार आए.लकड़हारों ने तीसरे वृक्ष को भी काट डाला. ईश्वर की लीला देखिए उसे काटा क्यों इसका भी निर्णय नहीं हो सका. उसका क्या बनेगा इसका भी पता नहीं लेकिन काटा गया.

वृक्ष कटकर आए तो बाजार में बिके भी. ईश्वर की लीला देखिए पहले वृक्ष को एक बढ़ई ने खरीद लिया. उसने उससे पशुओं को चारा खिलानेवाला कठौता बनाया. कठौते को एक पशुगृह में रखकर उसमें भूसा भर दिया गया.

बेचारे वृक्ष ने तो इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी. वह क्या बनना चाहता था और क्या बन गया पर धैर्य रखिए, अभी कहानी खत्म नहीं हुई है. ईश्वर की लीला अभी शेष है.

वहीं दूसरे वृक्ष को काटकर बढ़ई ने उससे मछली पकड़नेवाली छोटी सी नौका बना दी गई. उसे पानी में तैरना था, सफर पर जाना था पर छोटी सी डोंगी नहीं बनना था. मछली मारने के काम न आना था. भव्य जलयान बनकर राजा-महाराजाओं को घुमाने का उस वृक्ष का सपना भी चूर-चूर हो गया.

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तीसरे वृक्ष के लिए तो काटने वाले ने भी कुछ तय नहीं किया था फिर उसके सपने पूरे होने की आशा स्वयं उसे ही न थी तो दूसरों को क्या होगी. उसे लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लिया गया. टुकड़ों को अंधेरी कोठरी में रखकर लोग भूल गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ समय तक ऐसे ही वह पड़ा रहा. ईश्वर की लीला की प्रतीक्षा में. उसके भी दिन खुले. एक दिन उस पशुशाला में एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया. स्त्री ने वहां एक बच्चे को जन्म दिया. वे बच्चे को चारा खिलाने वाले कठौते में सुलाने लगे.

कठौता अब पालने के काम आने लगा. पहले वृक्ष ने स्वयं को धन्य माना कि अब वह संसार की सबसे मूल्यवान निधि अर्थात एक शिशु को आसरा दे रहा था. वह इस सौभाग्य पर भी गर्व कर रहा था.समय बीतता गया और सालों बाद कुछ नवयुवक दूसरे वृक्ष से बनाई गई नौका में बैठकर मछली पकड़ने के लिए गए. उसी समय बड़े जोरों का तूफान उठा. नौका तथा उसमें बैठे युवकों को लगा कि अब कोई भी जीवित नहीं बचेगा.

एक युवक नौका में निश्चिंत सा सो रहा था. उसके साथियों ने उसे जगाया और तूफान के बारे में बताया. वह युवक उठा और उसने नौका में खड़े होकर उफनते समुद्र और झंझावाती हवाओं से कहा- “शांत हो जाओ” और तूफान थम गया.

यह देखकर दूसरे वृक्ष को लगा कि उसने दुनिया के परम ऐश्वर्यशाली सम्राट को सागर पार कराया है. ईश्वर की लीला से वह संतुष्ट और प्रसन्न था.

तीसरे वृक्ष के पास भी एक दिन कुछ लोग आये. ईश्वर की लीला देखिए, उन्होंने उसके दो टुकड़ों को जोड़ा और एक घायल आदमी के ऊपर लाद दिया. उस घायल व्यक्ति को कहा गया कि इसे खींचकर लिए चले. ठोकर खाते, गिरते-पड़ते वह आदमी घिसटता जा रहा था. उस आदमी के दर्द का लोग आनंद लेते रहे. सड़क पर तमाशा देखती भीड़ उसका अपमान करती रही.

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उस लकड़ी को खींचते रक्त में सने व्यक्ति जब रुके तब सैनिकों ने लकड़ी के सलीब पर उनके हाथों-पैरों में कीलें ठोंक दीं. उन्हें पहाड़ी की चोटी पर खड़ा कर दिया. वृक्ष स्वयं पर रो रहा था. ऐसे वीभत्स कृत्य में उसका उपयोग हो रहा है यह सोचकर वह दुखी था. वह बार-बार ईश्वर को कोस रहा था.

वह मन में कहता जाता- ईश्वर तो है ही नहीं, ईश्वर तो है नहीं. यदि होता तो ऐसा अत्याचार होता सहन न करता. मुझे इस पाप में भागीदार न बनाता. मैं कहां ईश्वर का अंश बनना चाहता था और कहां रक्त से सना हूं.

ईश्वर तो कहीं है नहीं. उसका कोई अस्तित्व नहीं. यह सब भ्रम है. झूठी बातें, कपोल कल्पनाएं. कुछ नहीं हैं ईश्वर.

उसके सपने टूटे थे इसलिए वह ईश्वर को कोस रहा था. जब हमारे सपने पूरे नहीं होते तो हम इसी तरह ईश्वर को कोसने लगते हैं. खैर, ईश्वर की लीला देखिए. दो दिनों के बाद रविवार को तीसरे वृक्ष को बोध हुआ कि उसने क्या पाया है. पहाड़ी पर वह स्वर्ग और ईश्वर के सबसे समीप पहुंच गया था क्योंकि उससे बनी सूली पर ईसा मसीह को चढ़ाया गया था.

यह कथा काल्पनिक ही है ऐसा ही मान लेते हैं पर तीन वृक्षों की इस कथा में बहुत बड़ा संदेश है जिसे हम समझ लें तो जीवन के सोचने-देखने का नजरिया बदल जाएगा.

प्रत्येक वृक्ष को वह मिल गया जिसकी उसने ख्वाहिश की थी लेकिन उस रूप में नहीं मिला जैसा वे चाहते थे. हम नहीं जानते कि ईश्वर ने हमारे लिए क्या सोचा है या ईश्वर का मार्ग हमारा मार्ग है या नहीं लेकिन उसका मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है.

यदि आप उस ईश्वर पर भरोसा बनाए रखते हुए सत्कर्म करते रहेंगे तो निश्चिंत रहिए- न तो आपका परिश्रम व्यर्थ जाने वाला है, न ही त्याग. बेचैनी साधारण मनुष्य का लक्षण है इसलिए वह बेचैनी में रहता है.  ईश्वर के आगे हाथ जोड़कर जो प्रार्थना की उसे पलक झपकते पूरा करा लेना चाहता है. ईश्वर को भी समय दीजिए. इसे और सरल तरीके से समझाता हूं.

आप अपने बच्चे को बहुत प्यार करते हैं. उसने आपसे आज ही एक नई कार की जिद कर दी. आप तैयार भी हैं समर्थवान भी पर आपको उस कार को घर तक ले आने में दो दिन तो लगेंगे ही न. आप शोरूम जाएंगे. पसंद की कार देखेंगे, रंग का विचार करेंगे औपचारिकताएं पूरी करेंगे तब तो घर ले आएंगे. हो सकता है कि एक दिन में ही हो जाए, हो सकता है चार दिन लग जाएं.

जैसे आपको कई औपचारिकताएं करनी होती हैं- ईश्वर भी समय लेते हैं विचारने के लिए आपके लिए क्या सही क्या गलत? ईश्वर की लीला का आनंद लीजिए. हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों का हिसाब भी तो उन्हें ही करना है. पूर्व के कर्मों से मुक्ति नहीं मिलेगी.

जो अच्छा हो रहा है वह ईश्वर की लीला है, उनकी कृपा है. जो बुरा हो रहा है वह हमारे कर्मों का दंड, इसे भोगना होगा. यही सोचकर जीवन को जीना सीख लीजिए. कभी ईश्वर विशेष दयालु होगा तो दंड में कमी कर देगा.

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