भागवत कथाः उंगली पर धारण कर प्रभु ने दिया गोवर्धन को अतिशय सम्मान, टूट गया इंद्र का अभिमान

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भगवान श्रीकृष्ण की वृन्दावन में लीलाएं चल रही थीं. अपनी लीलाओं से प्रभु अनेक शापित जीवों का जो शापवश वृक्ष और राक्षस आदि बने थे उनका उद्धार कर रहे थे.
प्रभु गाएं चराते थे. वृंदावन के लोगों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन पशुधन था किंतु उसका वैसा सम्मान नहीं था जो होना चाहिए. प्रभु ने गोप-गोपियों को सदबुद्धि देने के लिए लीला रची.
गोप इन्द्र-यज्ञ की तैयारी कर रहे थे. श्रीकृष्ण ने नंदबाबा से पूछा कि यज्ञ क्यों किया जा रहा है. नंद बोले- इंद्र के कारण ही हमें जल और अन्न प्राप्त होता है. उन्हें प्रसन्न करना जरूरी है. वह कुपित हो गए तो बाढ़ या सुखाड़ हो सकता है.
इंद्र की कृपा से जो अन्न प्राप्त होता है वह हम उन्हें वापस भेंट कर देते हैं. जो शेष रहता है उसी से हम मनुष्यों को जीवनयापन की अनुमति है. मनुष्य की खेती और प्रयत्नों का फल देने वाले इंद्र ही हैं इसलिए उनकी उपासना जरूरी है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.श्रीकृष्ण बोले- पिताजी हमें अपने कर्म अच्छे रखने चाहिए. कर्म गति देह त्यागने के बाद भी हमारी आत्मा के साथ होती है. जो प्रत्यक्ष हमें जीवन दे रहा है उसकी उपेक्षा करके अप्रत्यक्ष की अर्चना तो अनुचित हैं. हमारे जीवन का आधार गोवर्धन और गोधन हैं. उनकी पूजा होनी चाहिए.
हम न तो किसी बड़े राज्य के स्वामी हैं. हमारे पास तो अपना घर भी नहीं. गोवर्धऩ पर्वत ने आसरा दिया है. हमारे गोधन के लिए भोजन भी गोवर्धन प्रदान करते हैं. इसलिए इंद्र यज्ञ के लिए जो सामग्री जुटाई गई है उससे गोवर्धन और गायों की पूजा करें.
प्रभु को इंद्र का अभिमान तोड़ना था. उनकी ओजस्वी वाणी से सभी सहमत हो गए और इंद्र के लिए यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन पूजा की तैयारी शुरू हुई. गोवर्धन महाराज की पूजा हुई. छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन का भोग लगाया गया.
भगवान श्रीकृष्ण गोपों को विश्वास दिलाने के लिए गिरिराज पर्वत के ऊपर दूसरे विशाल रूप में प्रकट हो गये और उनकी सामग्री खाने लगे. यह देख सभी ब्रजवासी बहुत प्रसन्न हो गए.
जब अभिमानी इन्द्र को पता लगा कि ब्रजवासी मेरी पूजा को बंद करके किसी पर्वत को पूज रहे हैं, तो वह बहुत क्रोधित हुए. तिलमिलाकर प्रलय करने वाले मेघों को ब्रज पर मूसलाधार पानी बरसाने की आज्ञा दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इन्द्र की से ब्रज मण्डल पर प्रचण्ड गड़गड़ाहट, मूसलाधार बारिश एवं भयंकर आँधी-तूफ़ान चलने लगा. लगता था कि अब ब्रज का विनाश हो जाएगा. ब्रजवासी दुखी और भयभीत थे और श्रीकृष्ण से बताया कि इंद्र को कोप से यह सब हो रहा है.
श्रीकृष्ण ने गोपों से कुटुंबजनों और गोधन के साथ गोवर्धन की शरण में चलने को कहा. उन्होंने हमारी पूजा स्वीकार की है ,वही रक्षा करेंगे. ब्रज मण्डल गोवर्धन के नीचे जमा हुआ तो श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में अपने बाएं हाथ की छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया.
श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र आदेश दिया कि पर्वत के ऊपर विराजो और सम्पूर्ण जल को सोख लो. इंद्र के आदेश पर सात दिनों तक प्रलय मेघ जल बरसाते रहे. श्रीकृष्ण ने सात दिन तक गिरिराज पर्वत को उठाये रखा.
सभी ब्रजवासी आनन्दपूर्वक उसकी छ्त्रछाया में सुरक्षित रहे. सुदर्शन ने ब्रजमंडल में जल का प्रवेश होने नहीं दिया इससे उनके घऱ सुरक्षित रहे. इन्द्र का अभिमान टूट चुका था. उन्होंने मेघों को रोका और प्रभु की स्तुति कर क्षमा मांगी.
धूप निकली तो श्रीकृष्ण ने सबको पर्वत की छतरी से बाहर निकल जाने को कहा. सबसे निकलने पर प्रभु ने पर्वत को वापस उनके स्थान पर रख दिया. ब्रजवासियों ने मंगलगान गाया और वृद्धों ने श्रीकृष्ण की आरती उतारी और आशीष दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक कथा में आता है जब श्रीराम समुद्र पर सेतु बांध रहे थे तब हनुमानजी गोवर्धन को लेकर सेतु बनाने के लिए उड़े. किंतु उन्हें आकाशवाणी हुई कि सेतु कार्य पूरा हो चुका है. हनुमानजी ने पर्वत को भूमि पर रख दिया.
गोवर्धन दुखी हो गए. उन्होंने कहा- मैं प्रभु के चरणों के स्पर्श सुख से वंचित रह गया. आखिर मैंने कौन सा पाप किया था? हनुमानजी ने श्रीराम को गोवर्धन का दुख कह सुनाया.
प्रभु ने हनुमानजी से कहा-गोवर्धन ने कोई पाप नहीं किया. मैं उसकी भक्तिभावना से प्रसन्न हूं इसलिए जब मैं श्रीकृष्ण अवतार लूंगा तो स्वयं गोवर्धन की पूजा करूंगा. प्रभु ने गोवर्धन को पूजनीय कर दिया.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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