सुतीक्ष्ण की गुरूदक्षिणा पूरी करने स्वयं उन तक आ पहुंचे श्रीराम

सुतीक्ष्ण की गुरूदक्षिणा पूरी करने स्वयं उन तक आ पहुंचे श्रीराम

sita ram hanuman
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सुतीक्ष्ण महर्षि अगस्त्य के शिष्य थे. गुरु-आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे. अध्ययन समाप्त होने पर एक दिन गुरूजी ने कहा- तुम्हारा अध्ययन समाप्त हुआ, अब तुम विदा हो सकते हो.

सुतीक्ष्ण ने कहा- गुरुदेव! मैं गुरुदक्षिणा के रूप में क्या दूं जो आपको प्रिय हो. आप मेरे लिए कुछ आज्ञा करें.

अगस्त्य ने कहा- तुमने मेरी बहुत सेवा की है. तुम्हारे जैसा श्रेष्ठ गुरुभक्त शिष्य मिलना भी एक बड़ी बात है. सेवा से बढकर कोई भी गुरुदक्षिणा नहीं, अत: जाओ, सुखपूर्वक रहो.

सुतीक्ष्ण ने आग्रहपूर्वक कहा- गुरुदेव! बिना गुरुदक्षिणा दिए शिष्य की विद्या फलीभूत नहीं होती. सेवा तो मेरा धर्म ही है. आप किसी अत्यंत प्रिय वस्तु के लिए आज्ञा अवश्य करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अगस्त्य ने कि इस निष्ठावान शिष्य की परीक्षा जरूर लेने चाहिए. उन्होंने कहा- सुतीक्ष्ण तुम गुरुदक्षिणा के रूप में मुझे सीतारामजी को साक्षात मेरे आश्रम में लाकर दो.

सुतीक्ष्ण गुरूजी के चरणों में प्रणाम करके जंगल की ओर चल दिया और वहां जाकर घोर तपस्या करने लगे. वह पूरे मन से गुरुमंत्र का जप, रामनाम के कीर्तन एवं ध्यान में मगन रहने लगे.

जैसे-जैसे समय बीतता गया. सुतीक्ष्ण के धैर्य, गुरु-वचन को पूरा करने के लिए निष्ठा और दृढ़ता में बढ़ोत्तरी होती चली गई. कुछ समय बाद भगवान श्रीराम सीता मैया और लक्ष्मणजी के साथ वहां पहुंचे जहां सुतीक्ष्ण ध्यानलीन बैठे थे.

रामनाम के ध्यान में डूबे सुतीक्ष्णजी के शरीर में तो अपनी आत्मा की जगह राम का नाम दौड़ रहा था. उनके शरीर का रुधिर रामनाम का हो गया था. प्रभु के ध्यान में खोए सुतीक्ष्णजी अचेतावस्था जैसी स्थिति में रहते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु श्रीराम आए. सुतीक्ष्णजी के शरीर को हिलाया-डुलाया परंतु वह तो अवचेतन हो गए थे. तब प्रभु ने सुतीक्ष्णजी के ह्रदय में अपना चतुर्भुजीरूप दिखाया. उसके चमत्कार से सुतीक्ष्णजी हड़बड़ाकर उठ बैठे.

आंखें खोलीं तो भगवान श्रीराम माता सीता और भैया लक्ष्मण के साथ साक्षात खड़े थे. सुतीक्ष्णजी को दुगनी प्रसन्नता थी. एक तो प्रभु के दर्शन मिले दूसरी गुरुदक्षिणा पूर्ण करने का समय आ गया.

उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया. भगवान ने उन्हें अविरल भक्ति का वरदान दिया. सुतीक्ष्ण गुरूजी को गुरुदक्षिणा देने हेतु सीतारामजी को लेकर गुरु-आश्रम की ओर चले.

सुतीक्ष्णजी ने प्रभु से कहा- प्रभु आप बाहर ही प्रतीक्षा करें. मैं गुरूजी को सूचना देकर लिवा लाता हूं. अगस्त्य के आश्रम द्वार पर श्रीरामजी एवं सीता माता आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े हो गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सुतीक्ष्ण ने गुरू के चरणों में दंडवत करके विनम्र भाव से कहा- गुरुदेव ! मैं गुरुदक्षिणा देने आया हूं. सीताराम जी द्वार पर खड़े आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

अगस्त्यजी प्रसन्न थे कि शिष्य परीक्षा की कसौटी में खरा उतर गया. अगस्त्य सुतीक्ष्ण को साथ लेकर बाहर आए और श्री रामचन्द्रजी व सीता माता का स्वागत तथा पूजन किया.

अगस्त्य ने सुतीक्ष्ण को आशीष देते कहा- सुतीक्ष्ण जो दृढ़ता, तत्परता और समर्पित ह्रदय से गुरु आज्ञा-पालन में लग जाता है, उसका संकल्प पूरा करने के लिए स्वयं भगवान भी सहयोगी बन जाते हैं.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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