रावण के पक्ष से युद्ध करने आ गईं जगदंबाः श्रीराम का संकट
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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेहगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.भगवान श्रीराम की वानर सेना और रावण की राक्षस सेना के बीच युद्ध खिंचता चला जा रहा था.
श्रीराम के आघात से रावण युद्धभूमि में अचेत होकर गिर गया. चेतना लौटने पर उसने भगवती देवी की घोर स्तुति की और सहायता के लिए पुकारा.
देवी ने उसे एक बार वरदान दिया था कि जब वह संकट में फंस जाएगा और कातर होकर उनका स्मरण करेगा तो वह प्रकट होंगी. आज रावण के लिए उस वरदान का लाभ लेने का अवसर था.
देवी ने रावण को दर्शन दिए तो वह बिलख-बिलख कर रोने लगा. उसने देवी की हर प्रकार से स्तुति की और फिर प्रार्थना की कि आप मुझे अपनी शरण में ले लें.
भगवती ने उसकी सहायता का वचन दिया तो रावण ने उनसे कहा- हे माता यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी एक अभिलाषा पूर्ण कर दीजिए. मैं आपकी छत्रछाया में युद्ध करना चाहता हूं. आप मेरे रथ पर अपने आशीर्वाद के छत्र समान विद्यमान रहें. मैं बस आपसे यही आशीर्वाद चाहता हूं.
भगवती उसे वरदान दे चुकी थीं. इसलिए वह विवश थीं रावण का साथ देने के लिए.रावण देवी के साथ रथ पर सवार होकर युद्धभूमि में लौटा. माता की शक्तियों से संपन्न वह अजेय के भांति ललकार रहा था.
भगवान श्रीराम ने जब देखा कि स्वयं शक्ति उस रथ पर सवार हैं तो उन्होंने धनुष रखकर उन्हें प्रणाम किया. शिवा के रावण के रथ पर विराजमान होने से स्वयं श्रीराम भी चिंतित हो गए.
भगवान विभीषण से बोले- आज शिवा स्वयं रावण की रक्षा में आ गईं हैं. अब तो इसका वध असंभव है. अब क्या किया जाए?
श्रीरामजी की सेना में चिंता बढ़ गई. देवतागण भी इससे दुखी हो गए. भवानी की शक्ति से सुसज्जित रावण का वध श्रीराम नहीं करेंगे तो यह अवतार पूर्ण नहीं होगा. वे चिंतित होकर ब्रह्माजी के पास गए.
ब्रह्माजी ने कहा- गौरी देवी की आराधना की जाए और उन्हें प्रसन्न करके रावण के संहार का उपाय जान लिया जाए. श्रीराम को स्वयं भी देवी की आराधना करके विजय का आशीर्वाद लेना होगा.
इंद्र के साथ ब्रह्माजी श्रीराम के पास आए और उन्हें विधि के साथ देवी की आराधना करने की सलाह दी.
ब्रह्माजी ने उन्हें विस्तारपूर्वक देवी को प्रसन्न करने का विधि-विधान बताया.रात्रि के अंतिम प्रहर में श्रीराम ने स्नान करके चंडी देवी का अनुष्ठान आरंभ किया. उन्होंने मिट्टी से देवी की मूर्ति बनाई और ब्रह्माजी की बताई विधि से स्तुति की.
अनुष्ठान के बाद उत्सव हुआ जिसमें सारी वानर सेना ने नृत्य-गान से देवी की स्तुति की.श्रीराम ने पूजा तो की लेकिन उन्हें संतुष्टि नहीं मिली.
विभीषण से उन्होंने कहा- रावण ने देवी को प्रसन्न कर रखा है. हमारी इस पूजा से शायद वह प्रसन्न नहीं हुईं. कोई और राय दीजिए.
विभीषण ने कहा- प्रभु देवी को नीलकमल बहुत पसंद हैं. उन्हें प्रसन्न करने के लिए हमें 108 नील कमल अर्पण करना चाहिए. इससे देवी अवश्य प्रसन्न होंगी.
अब समस्या थी कि उस समय अचानक नील कमल कहां से आएंगे?
हनुमानजी ने कहा- संसार में नीलकमल जहां भी होगा, मैं उसे खोजकर अभी ले आता हूं. आपकी पूजा अवश्य पूरी होगी.
विभीषण ने कहा- मैं जिन नील कमल की बात कर रहा हूं वे देवीदह में ही मिलते हैं. वहां पहुंचने में दस वर्ष का समय लगता है.हनुमानजी ने कहा- आप चिंता न करें मैं अभी लेकर आता हूं. प्रभु के आशीर्वाद से मेरा सामर्थ्य और गति इतनी है कि दस वर्षका समय पलभर में पार कर लूं.
हनुमानजी को भेजकर श्रीराम ने दुर्गास्तुति आरंभ की. हनुमानजी अत्यंद वेग से 108 नीलकमल लेकर लौट भी आए. श्रीराम ने वे फूल देवी को अर्पित करने आरंभ कर दिए.
देवी ने प्रभु की परीक्षा लेने के लिए उनमें से एक कमल छिपा लिया. गिनती में एक कमल कम दिखा तो प्रभु श्रीराम ने कहा- हनुमानजी एक कमल कम हैं. लेकर आइए.
हनुमानजी ने कहा- प्रभु देवीदह में तो 108 कमल ही थे. मैं सारे लेता आया. मेरी गिनती पक्की थी. देवी ने ही कोई माया रची है आपकी परीक्षा लेने के लिए. श्रीराम ने युक्ति निकाली.
उन्होंने लक्ष्मणजी से कहा- तुम और मुझसे प्रेम रखने वाले सभी लोग मुझे कमलनयन कहते हो. अतः यदि मैं अपना एक नेत्र देवी को अर्पित कर दूं तो एक पुष्प की कमी पूरी हो जाएगी.श्रीराम ने अपना नेत्र निकालने के लिए एक बाण निकाला तभी देवी कात्यायनी वहां प्रकट हो गईं.
उन्होंने प्रभु के हाथ रोक दिए और कहा- त्रिभुवन के स्वामी आप यह क्यों कर रहे हैं. आपका संकल्प पूर्ण हुआ है. आपके नेत्रों की मुझे नहीं आपके भक्तों को आवश्यकता है.
श्रीराम ने कहा- आप मेरे लिए मातास्वरूपा हैं. इस संकट के क्षण में आपने जो पीड़ा दी वह एक माता के लिए उचित नहीं है. आपके कृपापात्र रावण से मेरा कोई निजी वैर नहीं. मैंने उसके सारे पाप क्षमा करके भूल सुधारने के सभी अवसर दिए.
आप से क्या छिपा, आप सर्वज्ञ हैं. आप स्वयं पापियों को दंड देती हैं. जानकी को मुक्ति दिलाने के लिए रावण का संहार आवश्यक है. मुझ पर कृपा करें और एक पापी को दंड देने में सहायक हों.
श्रीराम के वचन सुनकर कात्यायनी देवी ने कहा- हे कृपा सिंधु आप तीनों लोकों के स्वामी हैं. जानकी स्वयं पृथ्वी की अवतार हैं. आप तो स्वयं महादेव के आराध्य हैं. रावण में देवी सीता को रोकने का साहस कहां है!वह तो स्वयं आपका द्वारपाल और परमप्रिय सेवक रहा है इसलिए मुझे भी प्रिय है. शापवश वह आपको पहचान नहीं पा रहा किंतु उसे शापमुक्ति दिलाने के लिए उसका वध आवश्यक है. मैं अभी रावण का त्याग कर रही हूं.
इतना कहकर देवी विलुप्त हो गईं. भगवान श्रीराम ने दसवें दिन की पूजा करने के पश्चात देवी की प्रतिमा को जल में प्रवाहित कर दिया था. उसके बाद उन्होंने रावण का वध किया जिसे विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है.
भगवान श्रीराम ने पृथ्वी पर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की नवमी को अवतार लिया था. मां शक्ति के आराधना मास में भगवान के अवतार ग्रहण करने के दिन को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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