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माता को प्रसन्न करने के लिए किस तिथि को चढ़ाएं कौन सा प्रसाद- श्रीविष्णु ने दिया यह विधान

माता को प्रसन्न करने के लिए किस तिथि को चढ़ाएं कौन सा प्रसाद- श्रीविष्णु ने दिया यह विधान

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मां जगदम्बे की प्रसन्नता के लिए सच्चे भाव से की गई पूजा ही काफी है पर पूजा के साथ प्रसाद चढाने में भी विधि-विधान का पालन हो जाए तो मनचाही सफलता मिलने में देर नहीं लगती.

एक समय नारद जी ने भगवान श्रीविष्णु से पूछा- हे भगवन! माता दुर्गा को किसी दिन विशेष को प्रसाद चढाने का भी कोई विधि विधान है, क्या? किस तरह के खास प्रसाद से कौन से विशेष फल मिलते हैं?

नारद के प्रश्न पर भगवान विष्णु ने बताया- हे नारद! मां जगद्म्बा की पूजा के लिए हर तिथि, हर वार और हर नक्षत्र का अलग अलग विधान है. इसको समझ कर पूजा की जाए तो मां प्रसन्न होती हैं. वैसे तो माँ भक्तों द्वारा भावपूर्वक अर्पित हर प्रसाद को स्वीकार करती हैं, फिर भी तिथिवार कुछ प्रसादों का विधान है जिसे अर्पण करने से वह विशेष प्रसन्न होती हैं.

पक्ष की 15 तिथियों में किस दिन क्या अर्पित करें-

प्रतिपदा या पहली तिथि को मां की पूजा गाय के घी से करनी चाहिए और इस घी को ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए. इससे पूजा करने वाला कभी रोगी नहीं होता.

द्वितीया को चीनी का भोग लगाएं. इससे आयु बढ़ती है.

तृतीया को माता के प्रसाद में दूध और दूध से बनी चीजें अर्पित करनी चाहिए. इससे विघ्नों का नाश होता है. यह दुःख दूर करता है.

चतुर्थी को भक्तिपूर्वक मालपुआ चढाने से मां जगदंबा विघ्न बाधा दूर करती हैं.

पंचमी के दिन यदि केले का भोग लगाया जाए तो बुद्धि बढती है.

षष्ठी के दिन मधु चढाने से सुंदरता निखरती है.

सप्तमी को गुड़ का भोग लगायेंगे तो चिंताओं से दूर रहेंगे.

यदि अष्टमी को नारियल का भोग मां जगदंबा को लगाया जाए तो पूजा करने वाला संताप से दूर रहता है.

नवमी को देवी दुर्गा को धान का लावा अर्पणकर के व्यक्ति परलोक में अपना सुख सुनिश्चित करा सकता है.

दशमी के दिन काला तिल चढाने से यमलोक का भय भाग जाता है.एकादशी के दिन दही का भोग लगाना चाहिए.

द्वादशी को चिवड़े का भोग लगाने से मां बहुत प्रसन्न होती हैं और भक्त पर अपना प्रेम बरसाती हैं.

त्रयोदशी के दिन चने का नैवेद्य अर्पण करने से संतान सुख प्राप्त होता है.

चतुर्दशी को सत्तू के भोग लगाएं तो मां के साथ भगवान शंकर भी प्रसन्न होते हैं.

पूर्णिमा के दिन मां को खीर का भोग लगाना चाहिए.

अमावस्या के दिन भी वही प्रसाद चढाने का विधान है जो पूर्णिमा के दिन चढाया जाता है.

जिन तिथियों में जो भोग चढाए जाते हैं उसी भोग से हवन भी करना चाहिए. इससे सभी तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं.

ध्यान रहे कि जो चढाया है उसका एक हिस्सा प्रसाद के रूप में लेकर बाकी ब्राह्मण को दान दे देना चाहिए.

नारदजी ने पूछा- प्रभु आपने तिथिवार चढ़ाए जाने वाले भोग की चर्चा की. अब मुझे दिवस के अनुसार माता की प्रसन्नता के लिए अर्पित किए जाने वाले प्रसाद के बारे में बताएं.श्रीविष्णु बोले- हे नारद! मां जगदंबे को रविवार को खीर और सोमवार को दूध चढाने का विधान है.

मंगलवार को केला चढाने से मां बहुत खुश होती हैं. इसी तरह बुधवार के दिन ताजे मक्खन का भोग उनको प्रिय है.

माता को यदि वृहस्पतिवार को खांड और शुक्रवार को चीनी अर्पित की जाये तो उत्तम है. शनिवार को गाय का घी चढाना चाहिए.

नारदजी ने पूछा- हे भगवन क्या विभिन्न मास और नक्षत्रों के अनुसार भी विशेष प्रसाद चढ़ाने का विधान है.

माता आदिशक्ति को वैशाख मास में गुड़ से बना भोग लगाना चाहिए,

जेठ महीने में शहद से भरा भोग लगाएं.

आषाढ में महुये के रस में भीगा हुआ भोग लगाना चाहिए.

सावन में दही तथा भाद्रपद में चीनी मिला भोग अच्छा फल देने वाला है.

आश्विन में खीर तो कार्तिक में दूध का भोग.

मार्गशीर्ष या अगहन में फेनी, पूस में दही में मिले उबले चावल चढ़ाएं.

माघ में गाय का घी और फागुन में नारियल का भोग लगाना उत्तम है.

इसके बाद नारदजी ने पूजा माता को कौन से वृक्ष प्रिय हैं. किन वृक्षों में उनका वास मानना चाहिए.श्रीविष्णुजी बोले- पीपल, बरगद,नीम, आम, कैथ, बेर, कटहल, मदार,करील और महुआ देवी के पेड़ हैं.

पाँच प्रकार के नैवेद्यों के साथ जो भक्त चैत महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया या फिर बारहों महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को महुए के पेड़ में भगवती के स्थित होने की भावना करके पूजा करेें और प्रसाद चढाएं तो माता जगदंबा शीघ्र प्रसन्न होती हैं.

हे नारद, इस प्रकार दिन, महीने नक्षत्र और योग तथा करण इत्यादि का ध्यान रखकर उचित प्रसाद और भोग के साथ मां जगदंबा की पूजा करने का विधान है.

इससे मां खूब प्रसन्न होती हैं और उसकी सारी कामनायें सिद्ध हो जाती हैं. बुद्धि निर्मल हो जाती है, नरक का भय नहीं रह जाता.

(स्रोत: देवी भागवत महापुराण, आठवां स्कंध)

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