नवरात्रि व्रत के एक दिन का पुण्यफल भी इतना बड़ा होता हैः नवरात्र व्रत महात्म्य कथा

नवरात्रि व्रत के एक दिन का पुण्यफल भी इतना बड़ा होता हैः नवरात्र व्रत महात्म्य कथा

नवरात्रि व्रत कथा महात्म्यः एक दिन का व्रत भी है इतना फलदायी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि व्रत कथा (Navratri Vrat Katha) का श्रवण और पठन करने मात्र से साधक के जीवन के समस्त कष्ट, दरिद्रता और असाध्य रोग दूर हो जाते हैं। देवी भागवत और लोककथाओं में वर्णित एक दिन के नवरात्र व्रत के माहात्म्य की यह कथा बताती है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया मां जगदंबा का पूजन किस प्रकार असंभव को भी संभव बना देता है।

अनाथ ब्राह्मण और उनकी पुत्री सुमति

पीठत नामक एक पावन गांव में भगवती दुर्गा का अनन्य भक्त एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम अनाथ था। वह नित्य प्रति पूरी निष्ठा और वैदिक विधि-विधान से मां जगदंबा की आराधना करता था। अनाथ की सुमति नाम की एक रूपवती और विदुषी कन्या थी। सुमति बाल्यकाल से ही पिता के पूजन की तैयारी में हाथ बंटाती और नित्य देवी पूजा में शामिल होती थी।

एक दिन बालिका सुमति अपनी सहेलियों के संग खेलने में इतनी मग्न हो गई कि उसे समय का भान ही न रहा। खेल-खेल में वह संध्या पूजन के समय मंदिर नहीं पहुंच सकी। पिता को जब पूजन बेला में कन्या नहीं दिखी, तो वे घोर क्रोध में आ गए।

पिता का क्रोध और सुमति का कठोर विवाह

क्रोधित होकर अनाथ ने कहा— “सुमति! आज तूने भगवती के पूजन का तिरस्कार किया है। यदि तेरी यही मति रही, तो मैं तेरा विवाह किसी दरिद्र और कुष्ठ रोगी से कर दूंगा।”

पिता के ऐसे शापित वचन सुनकर सुमति अत्यंत दुखी हुई। उसने क्षमा मांगते हुए कहा— “पिताजी! बालपन की नादानी से मुझे समय का ध्यान नहीं रहा, इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। मां जगदंबा तो दयामयी हैं, वे मेरी इस भूल को अवश्य क्षमा करेंगी।”

किंतु अनाथ का क्रोध शांत न हुआ। उसने हठपूर्वक कहा कि वह अपने वचन से पीछे नहीं हटेगा। इस पर सुमति ने धर्मपूर्वक उत्तर दिया— “पिताजी! आपकी पुत्री होने के नाते मैं आपके अधीन हूं। आप जिससे चाहें मेरा विवाह कर दें, किंतु मेरे भाग्य में जो विधाता ने लिखा है, वही होगा।”

क्रोधवश ब्राह्मण अनाथ ने आगे चलकर सुमति का विवाह वास्तव में एक अत्यंत निर्धन और असाध्य कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति से कर दिया। सुमति ने इसे प्रभु की इच्छा और अपने पूर्वजन्मों का प्रारब्ध मानकर सहर्ष स्वीकार कर लिया।

जंगल में मां भगवती का दिव्य प्राकट्य

नवरात्रि व्रत कथा: जंगल में मां दुर्गा का प्राकट्य और सुमति को दर्शन
नवरात्रि व्रत कथाः जंगल में मां भगवती का दिव्य प्राकट्य और सुमति द्वारा पति के आरोग्य की प्रार्थना

विवाह के पश्चात जब पति-पत्नी के पास कोई आश्रय न था, तो उन्होंने अपनी पहली रात एक घने जंगल में अत्यंत कष्ट और पीड़ा के बीच बिताई। अपने कुष्ठरोगी पति की दयनीय दशा और शारीरिक पीड़ा देखकर सुमति का हृदय कराह उठा। उसने अश्रुपूरित नेत्रों से मां अंबे का स्मरण किया।

सुमति की अनन्य निष्ठा और पूर्व के भक्तिभाव से प्रसन्न होकर स्वयं आदिशक्ति मां जगदंबा दिव्य रूप में वहां प्रकट हो गईं। मां ने मधुर वाणी में कहा— “हे धर्मनिष्ठ सुमति! मैं तेरी सच्ची निष्ठा से अति प्रसन्न हूं। जो वरदान मांगना चाहती हो, मांग लो।”

माता के अलौकिक दर्शन पाकर सुमति भावविभोर हो गई। उसने हाथ जोड़कर पूछा— “हे करुणामयी मां! मुझ दीन-हीन पर आपकी यह अहैतुकी कृपा कैसे हुई? मेरे कौन से पुण्यकर्म हैं जिससे मुझे आपके साक्षात दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ?”

पूर्वजन्म का रहस्य और एक दिन के व्रत का पुण्य

भगवती मुस्कुराकर बोलीं— “पुत्री! मैं ही सृष्टि का मूल आदिशक्ति, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूं। इस जन्म की भक्ति के साथ-साथ तेरे पूर्वजन्म के कर्म भी अत्यंत पावन थे। पूर्वजन्म में तू एक केवट की धर्मपरायण और पतिव्रता पत्नी थी। एक बार तेरे पति पर चोरी का आरोप लगा और राजा के सैनिकों ने तुम दोनों को कारागार में डाल दिया।”

देवी मां ने आगे बताया— “कारागार में सैनिकों ने तुम्हें नौ दिनों तक केवल जल के अतिरिक्त कोई भोजन नहीं दिया। संयोग से वे दिन चैत्र/शारदीय नवरात्र के थे। भूखे-प्यासे रहकर तुम दोनों अनजाने में ही नौ दिनों तक मेरा ध्यान और स्तुति करते रहे। इस प्रकार तुम्हारा निष्काम नवरात्र व्रत पूर्ण हो गया था। उसी व्रत के प्रभाव से मैं आज तुझे मनवांछित फल देने आई हूं।”

पति का कुष्ठ रोग निवारण और सुखद जीवन

नवरात्रि व्रत कथा: एक दिन के व्रत के फल से सुमति के पति का रोग निवारण
मां भगवती की कृपा और नवरात्रि व्रत के पुण्यफल से आरोग्य प्राप्त करते सुमति के पति

सुमति ने करबद्ध होकर प्रार्थना की— “हे मां दुर्गा! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे निर्दोष पति को इस भयंकर कुष्ठ रोग से मुक्त कर पूर्ण स्वस्थ कर दीजिए।”

मां भगवती ने कहा— “पुत्री! तू अपने पूर्वजन्म के उस नौ दिनों के नवरात्र व्रत में से मात्र एक दिन के व्रत का पुण्यफल अपने पति को संकल्प करके दे दे।”

सुमति ने तत्काल मां की आज्ञा मानकर अपने एक दिन के व्रत का प्रभाव पति को समर्पित कर दिया। उस एक दिन के व्रतपुण्य का स्पर्श होते ही उसका पति क्षणभर में कुष्ठ रोग से मुक्त होकर अत्यंत सुंदर और कांतिवान हो गया।

भगवती ने दोनों को आशीर्वाद दिया, नवरात्र पूजन की संपूर्ण शास्त्रीय विधि समझाई और शीघ्र ही गुणवान पुत्र प्राप्त होने का वरदान देकर अंतर्धान हो गईं। इसके पश्चात सुमति के पति ने उद्यम से विपुल धन कमाया और समय आने पर उन्हें ‘उदालय’ नामक तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

बोलो सांचे दरबार की जय! जयकारा शेरावाली का!

(स्रोत: पौराणिक लोकश्रुति एवं देवी भागवत महात्म्य)


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