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श्रीकृष्ण लौटे धाम, पटरानियां परेशानः व्रज की रज में खोजतीं फिरी विरह का ईलाज- श्रीकृष्ण भक्तिकथा

श्रीकृष्ण लौटे धाम, पटरानियां परेशानः व्रज की रज में खोजतीं फिरी विरह का ईलाज- श्रीकृष्ण भक्तिकथा


अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
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मित्रों, सावन का पावन माह आरंभ हो रहा है. इस महीने में शिवजी की विशेष आराधना और शिव महिमा का श्रवण करना चाहिए. हम भगवान भोलेनाथ को समर्पित एक एप्प बना रहे हैं.

एप्प का काम अपेक्षा के अनुसार कुछ कारणों से आझ पूरा नहीं हो पाया लेकिन दो-तीन दिनों में हम इसे आरंभ करने के लिए भरपूर प्रयास में जुटे हैं. इसमें हम आपको शिवजी के प्रत्येक स्वरूपों का परिचय, उनकी आराधना, सभी उपयोगी मंत्रों और शिवपुराण से परिचित होंगे.

इसके अलावा बहुत कुछ होगा इस एप्प में. थोड़े में कहूं तो भगवान भोलेनाथ की पूजा-आराधना और भक्ति के लिए आपको एक संपूर्ण और संतुष्टिदायक ऐसा एप्प मिलने वाला है जो आपको शिवभक्ति के रस में सराबोर करेगा. अभी पढ़ें व्रज की महिमा की एक कथा-

जब भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी लोक पर अपनी लीला समाप्त करके अपने धाम को चले गए तब भगवान की विरह-वेदना में उनकी सोलह हजार रानियाँ दुखी रहने लगीं.

उन्होंने अपने प्रियतम प्रभु की चतुर्थ पटरानी यमुनाजी को आनंदित देखा. वह विरह वेदना से शोकाकुल नहीं थी. इससे रानियों को आश्चर्य हुआ. उन्होंने सरलभाव से यमुनाजी से कारण पूछ ही लिया.

रानियों ने कहा – बहिन कालिंदी! हमारी तरह तुम भी श्रीकृष्ण की पत्नी हो. हम तो विरहाग्नि में जली जा रही हैं किन्तु तुम्हारी यह स्थिति नहीं है. तुम प्रसन्न हो, इसका क्या कारण है?

यमुनाजी ने कहा- बहनों, अपनी आत्मा में ही रमण करने के कारण हमारे प्रिय भगवान श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा हैं- श्रीराधाजी! मै दासी की भांति राधाजी की सेवा करती रहती हूं. उनकी सेवा का ही प्रभाव है कि विरह हमारा स्पर्श नहीं कर सकता.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

भगवान श्रीकृष्ण की जितनी भी रानियां हैं सब की सब श्रीराधाजी के ही अंश का विस्तार है. राधाकृष्ण एक हैं. उनका परस्पर संयोग है और उन दोनों का प्रेम ही वंशी है.

तुम सब का भी श्रीकृष्ण के साथ वियोग नहीं हुआ है क्योंकि यह संभव नहीं है. भगवान जिसे अपनाते हैं उसे कहां छोड़ते हैं? किन्तु तुम इस रहस्य को इस रूप में नहीं जानती हो इसलिए इतनी व्याकुल हो रही हो.

यमुनाजी आगे बोलीं- जब अक्रूरजी श्रीकृष्ण को मथुरा ले गए थे तब गोपियों को भी ऐसी ही विरह-वेदना महसूस हुई थी. वह भी वास्तविक विरह नहीं था. प्रभु से विरह कहां! वह तो विरह का आभास मात्र था.

ये बातों गोपियां तो जानती नहीं थीं. जब प्रभु के मित्र उद्धवजी व्रज में आए और उन्होंने समझाया तब गोपियां इस बात को समझीं. यदि तुम्हे भी उद्धवजी का सत्संग प्राप्त हो जाए तो तुम भी श्रीकृष्ण के साथ नित्य विहार का सुख प्राप्त कर लोगी.

रानियाँ बोली- सखी! तुम्हारा जीवन धन्य है क्योंकि तुम्हें कभी भी अपने प्राणनाथ के वियोग का दुःख नहीं भोगना पडता. अब ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे उद्धव जी से शीघ्र भेंट हो जाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

तब यमुनाजी बोलीं- जब भगवान अपने परमधाम को पधारे तब उद्धवजी भगवान की आज्ञा से बद्रिकाश्रम चले गए परन्तु व्रजभूमि को भी भगवान ने उद्धवजी को दे दिया था.

किन्तु वह फलभूमि यहां से भगवान के अन्तःर्धान होने के साथ ही लोगों की सांसारिक दृष्टि से परे जा चुकी है. इसलिए उद्धवजी यहां प्रत्यक्ष दिखायी नहीं देते. रानियों ने पूछा- ऐसा है तो फिर कैसे मिलेंगे हमें उद्धव जी?

यमुनाजी ने कहा- एक स्थान है जहां उद्धवजी का दर्शन हो सकता है. गोवर्धन पर्वत के निकट भगवान की लीला सहचरी गोपियों की विहार स्थली है वहां की लता अंकुर और बेलों के रूप में अवश्य ही उद्धव जी वहाँ निवास करते हैं.

लताओं के रूप में उनके वास करने का यही उद्देश्य है कि भगवान की प्रियतमा गोपियों की चरण रज उन पर पड़ती रहे. उद्धवजी के सम्बन्ध में एक बात निश्चित यह भी है कि उन्हें भगवान ने अपना उत्सव स्वरुप प्रदान किया है.

भगवान का उत्सव उद्धव जी का अंग है. इसलिए तुम सब व्रज में कुसुमसरोवर के पास ठहरो. भगवतभक्तों की मंडली एकत्र करके वाद्ययंत्र बजाकर भगवान की लीलाओं के भजन-कीर्तन करते उत्सव आरंभ करो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]

इस प्रकार जब तुम्हारे उत्सव की चर्चा होने लगेगी तो उस उत्सव का विस्तार होगा तब निश्चित ही उद्धवजी का दर्शन तुम्हें मिलेगा. तब रानियां व्रजनाभ और परीक्षितजी को लेकर व्रज में आईं.

यमुनाजी के बताए अनुसार गोवर्धन के निकट कुसुम सरोवर पर उत्सव श्रीकृष्ण कीर्तन आरंभ कर दिया. वहां रहने वाले सभी भक्तजन एकाग्र हो गए. उनकी दृष्टि कहीं और न जाती थी. तभी सबके देखते देखते वहां फैले हुए लताओं के समूह से प्रकट होकर उद्धवजी सबके सामने आये.

शरीर श्यामवर्ण, उसपर पीताम्बर शोभा पा रहा था. गले में वनमाला धारण किये हुए और मुख से बारबार गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का गान कर रहे थे. उद्धव जी के आगमन से उस कीर्तन की शोभा बहुत बढ़ गई.

उद्धवजी ने भगवान की रानियों को प्रभु की विरह वेदना से निकलने का मार्ग बताया. उन्होंने व्रजनाभ और परीक्षितजी को दिव्य वृंदावन और श्रीकृष्ण के उस स्थान से प्रेम के बारे बताया. तो रानियों के मन की वेदना मिटी और भजन में जुट गईं.

संकलनः संजय तनेजा

यह भक्ति कथा हमें गुड़गांव, हरियाणा से संजय तनेजाजी ने भेजी. संजयजी स्वरोजगार करते हैं और श्रीराधेकृष्ण के अनन्य भक्त हैं.

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