श्रीरामचरितमानस माला, बालकांडः संत का स्वभाव तो पुष्प जैसा है, उसका भी कल्याण करते हैं जो उनका अहित सोचता है

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बालकांडः ब्राह्मण-संत समाज वंदना
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना।
मोह जनित संसय सब हरना॥
सुजन समाज सकल गुन खानी।
करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥
भावार्थः पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वंदना करता हूं, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरनेवाले हैं. फिर सब गुणों की खान संत समाज को प्रेम सहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूं.
साधु चरित सुभ चरित कपासू।
निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।
बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥
भावार्थः संतों का चरित्र कपास के जीवन के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है. कपास की डोडी नीरस होती है वैसे ही संत के चरित्र में विषयों के प्रति आसक्ति नहीं होती. संसार के भौतिक रस के प्रति उनका झुकाव नहीं होता और वे स्वभाव से नीरस होते हैं.
कपास उज्ज्वल होता है. संत का हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकार से रहित होता है. इसलिए वे विशद हैं. कपास में तंतु होते हैं जो एक दूसरे को बांधकर रखते हैं. उसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय हैं.
कपास की प्रकृति और संत की प्रवृति एक जैसी है. कपास लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर वस्त्र का रूप लेता है फिर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है.
सूत के धागे का स्वभाव है तो इतना सरल है कि वह सुई द्वारा किए गए छेद को भी अपना तन देकर ढंक देता है. उसी प्रकार संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्र रूपी दोषों को ढंकता है. इसी कारण उसे जगत में वंदनीय यश प्राप्त होता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मुद मंगलमय संत समाजू।
जो जग जंगम तीरथराजू॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा।
सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥
भावार्थः संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज है, जहाँ राम भक्तिरूपी गंगा की धारा हैं और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वती हैं.
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी।
करम कथा रबिनंदनि बरनी॥
हरि हर कथा बिराजति बेनी।
सुनत सकल मुद मंगल देनी॥
भावार्थः विधि और निषेध (यह करो और यह न करो) रूपी कर्मों की कथा कलियुग के पापों को हरनेवाली सूर्यपुत्री यमुना हैं और भगवान विष्णु और शंकर की कथाएं त्रिवेणी रूप से सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और कल्याणों को देनेवाली हैं.
बटु बिस्वास अचल निज धरमा।
तीरथराज समाज सुकरमा॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा।
सेवत सादर समन कलेसा॥
भावार्थः अपने धर्म में जो अटल विश्वास है, वह अक्षयवट है और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज है. वह हर जगह, हर समय सभी को सहज ही प्राप्त हो सकता है. उसके आदरपूर्वक सेवन से क्लेशों का अंत करने वाला है.
अकथ अलौकिक तीरथराऊ।
देह सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥
वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है एवं तत्काल फल देनेवाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दोहाः
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥ 2॥
भावार्थः जो मनुष्य इस संत समाजरूपी तीर्थराज का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यंत प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- चारों फल पा जाते हैं.
दोहाः
मज्जन फल पेखिअ ततकाला।
काक होहिं पिक बकउ मराला॥
सुनि आचरज करै जनि कोई।
सतसंगति महिमा नहिं गोई॥
भावार्थः इस तीर्थराज में स्नान का फल ऐसा है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस. यह सुनकर आश्चर्य न करें क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है.
बालमीक नारद घटजोनी।
निज निज मुखनि कही निज होनी॥
जलचर थलचर नभचर नाना।
जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
भावार्थः वाल्मीकि, नारद और अगस्त्य ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी यानी जीवन का वृत्तांत बताया है. जल में रहनेवाले, जमीन पर चलनेवाले और आकाश में विचरनेवाले, नाना प्रकार के जड़-चेतन जितने जीव इस जगत में हैं –
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
भावार्थः उनमें से जिसने जिस समय जहां कहीं भी जिस किसी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति और भलाई पाई है, वह सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिए. वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है.
बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला।
सोई फल सिधि सब साधन फूला॥
भावार्थः सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और राम की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं. सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है. सत्संग की सिद्धि ही फल है और सब साधन तो फूल है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सठ सुधरहिं सतसंगति पाई।
पारस परस कुधात सुहाई॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं।
फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
भावार्थः दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण हो जाता है. दैवयोग से यदि कभी सज्जन भी कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहां भी सांप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं.
अर्थात सांप के साथ जीवनभऱ रहने वाली मणि अपना चमकने का स्वभाव नहीं त्यागती और न ही सांप के संसर्ग से वह विषैली होती है. उसी तरह साधु भी दुष्टों की संगति में आने पर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, स्वयं अवगुण नहीं स्वीकारते.
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी॥
सो मो सन कहि जात न कैसें।
साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥
भावार्थः ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पंडितों की वाणी भी संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है. उसका वर्णन करने में मेरा संकोच भी वैसा ही सहज है जैसे किसी साग-तरकारी बेचनेवाले को मणियों के गुण बताने में संकोच होता है.
दोहा-
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ 3 (क)॥
भावार्थः मैं संतों को प्रणाम करता हूं, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अंजलि में रखे हुए सुंदर फूल हाथों को सुशोभित करने में भेदभाव नहीं करते.
फूल उन हाथों को भी सुगंधित करते हैं जिसने उन्हें डाल से तोड़ लिया और उन हाथों में भी सुगंध छोड़ते हैं जिन हाथों में वे टूटने के बाद जाते हैं. वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं.
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥
भावार्थः संत सरल हृदय और जगत के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जानकर मैं विनय करता हूँ, मेरी इस बाल-विनय को सुनकर कृपा करके श्री रामजी के चरणों में मुझे प्रीति दें॥
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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