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श्रीहरि के शाप से घोड़ी बन गईं माता लक्ष्मी, शिवजी के वरदान से हुआ पुनः उद्धार

श्रीहरि के शाप से घोड़ी बन गईं माता लक्ष्मी, शिवजी के वरदान से हुआ पुनः उद्धार

laxmi vishnu
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक कल्प की बात है. लक्ष्मी देवी और विष्णुजी बैकुंठ में सृष्टि निर्माण के विषय में चर्चा कर रहे थे. किसी बात पर क्रोधित होकर श्रीहरि ने लक्ष्मीजी को घोड़ी बनकर पृथ्वी पर जाने का शाप दे दिया.

देवी बहुत दुखी थीं. वह प्रभु को प्रणामकर पृथ्वी पर चली गईं. भ्रमण करते हुए वह यमुना और तमसा नदी के संगप पर सुपर्णाक्ष नामक स्थान पर पहुंचीं. इसी स्थान पर कभी सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा ने घोड़ी के रूप में घोर तप किया था.

माता लक्ष्मी भी अश्वी के रूप में भगवान शिव का घोर तप करने लगीं. उनके कठिन तप से शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गए. शिवजी बोले- देवी मैं आपके मन की पीड़ा को जानता हूं.मैं वरदान देता हूं कि आपकी इच्छा पूर्ण करने को स्वयं श्रीहरि अश्व के रूप में यहां आएंगे. आप इस स्वरूप में ही उनके जैसे एक पुत्र की माता बनेंगी. आपका पुत्र एकबीर के नाम से जगत प्रसिद्ध होगा. फिर आप श्रीहरि के साथ बैकुंठ चली जाएंगी.

लक्ष्मीजी की सारी मनोकामना पूरी करके शिवजी अंतर्धान हो गए. कैलाश पहुंचकर भोलेनाथ ने अपने गण चित्ररूप को विष्णुलोक भेजा. शिवगण ने जाकर विष्णुजी को शिवजी का संदेश कह सुनाया.

शिवजी का वरदान पूरा करने के लिए विष्णुजी को आना ही था. वह स्वयं एक दिव्य अश्व का रूप लेकर आए. उन्होंने लक्ष्मीजी के साथ संसर्ग किया. समय आने पर शिवजी के वरदान अनुसार दोनों के एक पुत्र हुआ.

पुत्र होने के बाद विष्णुजी ने कहा- देवी ययाति के वंश में हरिवर्मा नामक एक राजा हैं. पुत्र के रूप में मेरा अंश पाने के लिए वह सौ वर्षों से घोर तप कर रहे हैं. मैंने यह पुत्र उनके लिए ही उत्पन्न किया है.भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी हरिवर्मा के पास पहुंचे और वरदान मांगने को कहा. हरिवर्मा बोला- भगवन आप तो सर्वज्ञ हैं. आपसे क्या छुपा. अपने जैसा एक तेजस्वी और वीरपुत्र प्रदान करें.

श्रीहरि बोले- तुम अभी सुपर्णाक्ष क्षेत्र में चले जाओ. वहां मेरा एक पुत्र तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है. स्वयं लक्ष्मीजी उसकी जननी हैं. उसकी उत्पति तुम्हारे लिए ही हुई है. उसे ग्रहण करो.

हरिवर्मा प्रसन्न हो गया. उसने भगवान के बताए मुताबिक पुत्र को प्राप्त किया. उसकी पत्नी पुत्र प्राप्त करके बहुत प्रसन्न हुई. धूमधाम से उसका जनमोत्सव मनाया गया.

हरिवर्मा को पता था कि उसका पुत्र स्वयं परमात्मा और देवी लक्ष्मी का अंश है. यानी इसके जोड़ का कोई भी बालक हो नहीं सकता. इसलिए उसने अपने पुत्र का नाम रखा एकवीर.एकवीर हरिवर्मा के बाद राजा बना. उसने शिवजी के वरदान के अनुसार प्रजापालन किया. वह सर्वश्रेष्ठ योद्धा, धर्मात्मा राजा और प्रजापालक था. एकवीर ने राजा रैभ्य की परम रूपवती पुत्री एकावली की कालकेतु दैत्य से रक्षा की थी.

उस संग्राम में दैत्यों का भारी विनाश हुआ था. यह कथा फिर कभी सुनाउंगा. (उपनिषद की कथा)

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